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दतिया उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा की अग्निपरीक्षा, क्या बदली हुई छवि करा पाएगी वापसी?

Datia by-election
दतिया विधानसभा उपचुनाव का ऐलान होते ही सबसे ज्यादा निगाहें भाजपा के कद्दावर नेता और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा पर टिक गई हैं। दतिया उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा का बीजेपी उम्मीदवार बनाना लगभग तय है और नरोत्तम मिश्रा ने उम्मीदवारी का आधिकारिक एलान के पहले ही अपना चुनाव प्रचार शुरु कर चुके है। नरोत्तम मिश्रा इस बार कुछ अलग ढ़ंग से चुनाव प्रचार करते हुए अपने मंच से अपने भाषणों में अपने में सुधार करने की बात कह रहे है। इतना ही नहीं वह अपने आचार-विचार और व्यवहार में परिवर्तन लाने की बात कह रहे है।
 
2023 की हार से सबक,नरोत्तम का बदला अंदाज-15 साल तक दतिया की राजनीति के निर्विवाद केंद्र रहे नरोत्तम मिश्रा के सामने अब केवल चुनाव जीतने की चुनौती नहीं है, बल्कि 2023 की हार के बाद बनी अपनी राजनीतिक छवि को बदलने की भी परीक्षा है। 2008, 2013 और 2018 में दतिया से जीत की हैट्रिक लगाने वाले बीजेपी के दिग्गज नेता नरोत्तम मिश्रा 2023 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के राजेंद्र भारती से 7,742 वोटों से  हार गए थे। यह इस बात का इशारा है कि नरोत्तम मिश्रा के खिलाफ नाराजगी केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं थी, बल्कि शहर के मतदाताओं ने भी उनसे दूरी बनाई।
2023 के विधानसभा चुनाव में करारी हार से सबक लेते हुए उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा बेहद सरल, सहज होने के बाद अपने व्यवहार में भी बदलाव का साफ संकेत दे रहे है।  राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2023 की हार ने नरोत्तम मिश्रा को अपनी राजनीतिक शैली पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया। लंबे समय तक सत्ता में रहने से पैदा हुई एंटी इनकंबेंसी,स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी, कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित रहने की छवि और विभिन्न सामाजिक वर्गों में बढ़ती दूरी 2023 के चुनाव में नरोत्तम मिश्रा के लिए बेहद नुकसानदेह साबित हुई।
 
उपचुनाव की  तारीखों के एलान के बाद नरोत्तम मिश्रा अब अपनी सभाओं में अपने में सुधार की बात कह रहे है। नरोत्तम कह रहे है कि "हम सुधारवादी है और अपने में सुधार करेंगे। हमारी कोई भी गलती है,हम सुधार करेंगे। हम अपने कार्य में, व्यवहार में, विचार में और आचरण में सब में परिवर्तन लाएंगे और झुककर आपके सामने आएंगे। आप घर पर भी आओगी तो आप बैठोगे हम खड़े रहेंगे"। 
 
2023 की हार के बाद से ही नरोत्तम मिश्रा ने अपने राजनीतिक व्यवहार में बदलाव का संदेश देना शुरू किया है। अब वे लगातार कार्यकर्ताओं और आम लोगों के बीच जाकर संवाद बढ़ा रहे हैं। पुराने भाजपा नेताओं के घर पहुंचना, नाराज कार्यकर्ताओं से व्यक्तिगत मुलाकात करना, सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी, विभिन्न समाजों के सम्मेलन आयोजित करना और घर-घर संपर्क अभियान चलाना उनकी नई रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। चुनाव की तारीखों के ऐलान के बाद डबरा स्थित उनके निवास पर बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं का जुटना भी इस बात का संकेत माना जा रहा है कि मिश्रा चुनावी तैयारियों में पूरी तरह सक्रिय हैं।
2023 की हार क्यों बनी सबसे बड़ा झटका?- 2023 के विधानसभा चुनाव में बतौर गृहमंत्री दतिया चुनाव में उतरने वाले नरोत्तम मिश्रा की हार की एक नहीं कई  वजह थी। राजनीतिक विश्लेषकों और पार्टी स्थानीय कार्यकर्ताओं के अनुसार चुनाव में नरोत्तम मिश्रा का ओवर कॉन्फिडेंस उनकी हार की सबसे बड़ी वजह रहा। वहीं लगातार 15 साल एक सीट से विधायक रहने के कारण नरोत्तम मिश्रा के खिलाफ क्षेत्र में एंटी इनकंबेंसी बढ़ी। उन पर आरोप लगे कि पंचायत और नगर निकाय चुनावों में उन्होंने सीधा दखल दिया, जिसका असर यह हुआ है कि पार्टी संगठन का ही एक वर्ग उनसे  नाराज हो गया था।
 
इसके अलावा विरोधियों के प्रति आक्रामक रवैये, कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित रहने की छवि और स्थानीय नेताओं की उपेक्षा जैसे मुद्दों की भी चर्चा रही। कई क्षेत्रों, विशेषकर ग्रामीण इलाकों में, भाजपा को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला।स्थानीय राजनीति में यह धारणा भी बनी कि विभिन्न सामाजिक वर्गों, खासकर एससी, ओबीसी, कुशवाह, यादव और जाटव समाज के बीच भाजपा को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया। इसी सामाजिक समीकरण ने चुनाव परिणाम को प्रभावित किया।

जातीय समीकरण साधने की कोशिश- 2023 का विधानसभा चुनाव हारने के बाद नरोत्तम मिश्रा ने अपनी राजनीतिक रणनीति में बदलाव किया। उन्होंने सामाजिक और जातीय समीकरणों पर विशेष ध्यान देना शुरू किया। जातीय समीकरण को साधने के लिए उन्होंने कुशवाह वर्ग से आने  वाले रघुवीर कुशवाह को भाजपा जिला अध्यक्ष बनवाया। इसके साथ जाने को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना गया। उपचुनाव की आहट शुरु होते  ही नरोत्तम मिश्रा लगातार विभिन्न समाजों के सम्मेलन आयोजित कर रहे हैं। गुर्जर समाज सहित अलग-अलग वर्गों के बीच संवाद बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। साथ ही पुराने भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं के घर जाकर व्यक्तिगत संपर्क भी बढ़ाया गया है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मिश्रा अपने पारंपरिक प्रभाव वाले शहरी क्षेत्रों और बसई बेल्ट पर भी विशेष फोकस कर रहे हैं, जहां से उन्हें पहले बढ़त मिलती रही है।
 
दतिया विधानसभा में उपचुनाव में मुद्दा केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं है। यह उपचुनाव बीजेपी के दिग्गज नेता नरोत्तम मिश्रा की राजनीतिक अस्तित्व की अग्निपरीक्षा है। यदि उनकी बदली हुई कार्यशैली और संवाद की राजनीति मतदाताओं को प्रभावित करती है, तो यह चुनाव उनकी राजनीतिक वापसी की कहानी लिख सकता है। लेकिन यदि पुरानी नाराजगी और एंटी इनकंबेंसी का असर कायम रहा, तो दतिया उपचुनाव उनके राजनीतिक करियर की सबसे कठिन परीक्षा साबित हो सकता है।
लेखक के बारे में
विकास सिंह
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