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श्रावण मास में ब्रजमंडल में रहती है हिंडोले, रासलीला और घटा उत्सव की धूम

शनिवार,जुलाई 24, 2021
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हिन्दू कैलेंडर अनुसार श्रावण और भाद्रपद 'वर्षा ऋतु' के मास हैं। इस माह में वर्षा नया जीवन लेकर आती है। इस माह से ही चातुर्मास लगता है। खासकर यह संपूर्ण माह भगवान शिव का माह माना जाता है लेकिन इस मास का संबंध श्रीकृष्ण से भी है। आओ जानते हैं 4 रोचक ...
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अध्यात्म जगत में 14 विद्याएं और 64 कलाएं होती हैं जिसमें श्रीकृण पारंगत हैं। विद्या दो प्रकार की होती है परा और अपरा विद्या। इसी तरह कलाएं भी दो प्रकार की होती है। पहली सांसारिक कलाएं और दूसरी आध्यात्मिक कलाएं। भगवान श्रीकृष्‍ण सांसारिक और ...
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श्रीराधा को भगवान श्रीकृष्‍ण की प्रेमिका कहा जाता और श्रीरुक्मिणी जी उनकी पत्नी थीं। सबसे बड़ा अंतर तो यही था परंतु इससे अलावा भी 12 बड़े अंतर थे। आओ जानते हैं दोनों के बीच के अंतर को। difference between Radha and Rukmini.
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पौराणिक ग्रंथों के अनुसार श्रीजी राधारानी की 8 सखियां थीं। अष्टसखियों के नाम हैं- 1. ललिता, 2. विशाखा, 3. चित्रा, 4. इंदुलेखा, 5. चंपकलता, 6. रंगदेवी, 7. तुंगविद्या और 8. सुदेवी। राधारानी की इन आठ सखियों को ही "अष्टसखी" कहा जाता है। श्रीधाम वृंदावन ...
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भगवान श्री कृष्‍ण को सांवलिया या सांवरिया सेठ भी कहा जाता है। राजस्थान में सांवलिया सेठ का विश्व प्रसिद्ध मंदिर है जहां प्रतिदिन हजारों लोग दर्शन करने आते हैं। आओ जानते हैं कि क्या है सांवलिया सेठ कहे जाने का इतिहास या पौराणिक कथा।
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यह तो सभी जानते हैं कि भगवान श्रीकृष्‍ण का जन्म मथुरा में कंस के कारागार में हुआ। गोकुल और वृंदावन में उनका बचपन बिता और फिर किशोरावस्था में वे मुथरा में रहकर कंस वध के बाद जरासंध से युद्ध करते रहे। बाद में उन्होंने प्रभाष क्षेत्र में समुद्र के ...
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महाभारत में श्रीमद्भागवत गीता के अलावा अनु गीता, हंस गीता, पराशर गीता, बोध्य गीता, विचरव्नु गीता, हारीत गीता, काम गीता, पिंगला गीता, वृत्र गीता, शंपाक गीता, उद्धव गीता, मंकि गीता, व्याध गीता जैसी अनेक गीताएं हैं। इसके अलावा गुरु गीता, अष्ट्रवक गीता, ...
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जीवन हो मर्यादा जैसा लेकिन धर्म और न्याय की रक्षार्थ श्री कृष्ण होना ही होता है। मानव मन भेद में जिता है। इसलिए सामान्यजनों के लिए श्रीराम और श्री कृष्ण के दांपत्य जीवन और विवाह के जानिए 10 अंतर।
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श्रीराम के पास कोदंड, शिवजी के पास पिनाक और अर्जुन के पास गाण्डिव धनुष था। प्रभु श्रीकृष्‍ण को आपने धनुष धारण करते हुए नहीं देखा होगा परंतु उनके पास था सारंग या शारंग नाम का धनुष। आओ जानते हैं इसके बारे में कुछ खास।
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प्याज को ग्रामीण क्षेत्रों में कांदा भी कहते हैं। अंग्रेजी में इसे ओन्यन या अन्यन (onion) कहते हैं। यह कंद श्रेणी में आता है जिसकी सब्जी भी बनती है और इसे सब्जी बनने में मसालों के साथ उपयोग भी किया जाता है। इसे संस्कृत में कृष्णावल कहते थे। हालांकि ...
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भगवान श्रीकृष्ण को मोर मुकुट धारी कहा जाता है क्योंकि वे अपने मुकुट पर मोर पंख धारण करते थे। मोरपंख धारण करने के पांच कारण बताए जाते हैं, लेकिन हमें तो मात्र एक कारण ही समझ में आता है। आओ जानते हैं मोर पंख धारण करने की कथा।
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पौराणिक ग्रंथों के अनुसार श्रीजी राधारानी की 8 सखियां थीं। अष्टसखियों के नाम हैं- 1. ललिता, 2. विशाखा, 3. चित्रा, 4. इंदुलेखा, 5. चंपकलता, 6. रंगदेवी, 7. तुंगविद्या और 8. सुदेवी। राधारानी की इन आठ सखियों को ही "अष्टसखी" कहा जाता है। श्रीधाम वृंदावन ...
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पौंड्र नगरी का राजा पौंड्रक नकली श्रीकृष्ण बनकर खुद को वासुदेव कहता था। पौंड्रक को उसके मूर्ख और चापलूस मित्रों ने यह बताया कि असल में वही परमात्मा वासुदेव और वही विष्णु का अवतार है, मथुरा का राजा कृष्ण नहीं। कृष्ण तो ग्वाला है। बहुत समय तक ...
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भगवान श्रीकृष्ण का रूप अनोखा है। करुपदेश का राजा पौंड्रक भी श्रीकृष्ण जैसे ही रूप रखकर खुद को वह विष्णु का अवतार मानता था। आओ जानते हैं श्रीकृष्ण के शुभ प्रतीकों के बारे में।
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भगवान श्रीकृष्ण के कई बाल सखा थे। जैसे मधुमंगल, सुबाहु, सुबल, भद्र, सुभद्र, मणिभद्र, भोज, तोककृष्ण, वरूथप, श्रीदामा, सुदामा, मधुकंड, विशाल, रसाल, मकरन्‍द, सदानन्द, चन्द्रहास, बकुल, शारद और बुद्धिप्रकाश आदि। उद्धव और अर्जुन बाद में सखा बने। बलराम ...
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भगवान श्रीकृष्ण के वैसे तो कई सखा अर्थात मित्र या दोस्त थे लेकिन बचपन में कुछ खास सखा थे। इन बाल सखाओं और सखियों के साथ श्रीकृष्ण ने अपना बचपन गुजारा था। लगभग 11 वर्ष की उम्र तक इन सखाओं के साथ रहे थे। कंस वध के लिए उन्हें गोकुल-वृंदावन को छोड़कर ...
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भगवान श्रीकृष्ण का रूप अनोखा है। वे अपने शरीर पर कई तरह की वस्तुएं धारण करते थे, जो कि शुभ प्रतीक होते हैं। हर वस्तुओं के धारण करके के पीछे कुछ ना कुछ कारण होता था, या उसे धारण करने के पीछे कोई ना कोई कथा जुड़ी हुई है।
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हल से खेतों में खेती जुताई की जाती है इसीलिए हल भारतीय कृषक समाज का प्रतीक है। इसकी सहायता से बीज बोने के पहले जमीन की आवश्यक तैयारी की जाती है। हल का प्रयोग प्राचीन काल से ही चला आ रहा है। राजा जनक और दशरथ के काल में भी हल के प्रयोग का उल्लेख मिलता ...
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ढोल मृदंग, झांझ, मंजीरा, ढप, नगाड़ा, पखावज और एकतारा में सबसे प्रिय बांस निर्मित बांसुरी भगवान श्रीकृष्ण को अतिप्रिय है। इसे वंसी, वेणु, वंशिका और मुरली भी कहते हैं। बांसुरी से निकलने वाला स्वर मन-मस्तिष्क को शांति प्रदान करता है। जिस घर में बांसुरी ...
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