Kanya Sankranti 2026: कन्या संक्रांति कब है? जानें महत्व, पूजा विधि और इस दिन दान करने से मिलने वाले पुण्य
सूर्य के एक राशि से दूसरे राशि में गोचर करने को संक्रांति कहते हैं। संक्रांति एक सौर घटना है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार पूरे वर्ष में प्रायः कुल 12 संक्रान्तियाँ होती हैं और प्रत्येक संक्रांति का अपना अलग महत्व होता है। शास्त्रों में संक्रांति की तिथि एवं समय को बहुत महत्व दिया गया है 17 सितंबर 2026 को सूर्य सिंह से निकलकर कन्या राशि में गोचर करेगा। इस गोचर को कन्या संक्रांति कहते हैं।
कन्या संक्रांति 2026: महत्व, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और दान
सूर्य देव का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना 'संक्रांति' कहलाता है। यह एक प्रमुख सौर घटना है। हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष में कुल 12 संक्रांतियां होती हैं, जिनका अपना विशेष धार्मिक महत्व है। 17 सितंबर 2026 को सूर्य देव सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में गोचर करेंगे, जिसे कन्या संक्रांति कहा जाता है।
कन्या संक्रांति शुभ मुहूर्त (17 सितंबर 2026, गुरुवार)
पुण्य काल: प्रातः 07:58 बजे से दोपहर 02:31 बजे तक (कुल अवधि: 6 घंटे 33 मिनट)
महा पुण्य काल: प्रातः 07:58 बजे से सुबह 10:01 बजे तक (कुल अवधि: 2 घंटे 03 मिनट)
गोचर का वैश्विक व सामाजिक प्रभाव
- सरकारों और प्रशासनिक कर्मचारियों के लिए यह समय अत्यंत शुभ और फलदायी रहेगा।
- वस्तुओं के मूल्य में कमी आएगी और दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं की सुलभ आपूर्ति बनी रहेगी।
- जनसामान्य को स्वास्थ्य लाभ मिलेगा, राष्ट्रों के मध्य आपसी संबंध मधुर होंगे तथा अनाज के भंडारों में वृद्धि होगी।
कन्या संक्रांति का धार्मिक महत्व
सौर मास की शुरुआत: कन्या संक्रांति हिंदू सौर पंचांग के छठे महीने के आरंभ का प्रतीक है।
पितृ दोष व कालसर्प दोष निवारण: यह दिन पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और पंचबलि कर्म के लिए बेहद शुभ माना जाता है। इससे पितृ दोष व कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है और पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
विश्वकर्मा पूजा का योग: इस तिथि पर भगवान विश्वकर्मा की पूजा भी की जाती है, जिससे इस दिन का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
क्षेत्रीय मान्यताएं: ओडिशा, आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, गुजरात, तेलंगाना, तमिलनाडु, पंजाब और महाराष्ट्र में इसे नववर्ष की शुरुआत के रूप में देखा जाता है, जबकि बंगाल और असम में इसे वर्ष के समापन के रूप में जाना जाता है।
पूजा विधि एवं दान के नियम
स्नान व संकल्प: प्रातःकाल जल में तिल मिलाकर स्नान करें। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का विशेष पुण्य प्राप्त होता है। तत्पश्चात व्रत एवं दान का संकल्प लें।
सूर्य अर्घ्य: तांबे के लोटे में शुद्ध जल लेकर उसमें लाल फूल, रोली-चंदन, तिल और थोड़ा गुड़ मिलाएं। इसके बाद "ॐ सूर्याय नमः" मंत्र का जाप करते हुए सूर्य देव को अर्घ्य दें।
दान-पुण्य: अर्घ्य देने के पश्चात अपनी श्रद्धा अनुसार जरूरतमंदों को आटा, दाल, चावल, खिचड़ी और तिल के लड्डू का दान करें।
दीपदान: संध्या के समय किसी पवित्र नदी या जलाशय में दीपदान करने से आर्थिक बाधाओं और संकटों से मुक्ति मिलती है।

