गणेश चतुर्थी की पौराणिक कथा
प्रतिवर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को भगवान श्री गणेश का जन्मदिवस मनाया जाता है। इसी पावन तिथि से 10 दिवसीय गणेशोत्सव की शुरुआत होती है। इस बार 14 सितंबर से 25 सितंबर 2026 तक यह उत्वस रहेगा। पौराणिक शास्त्रों और पुराणों में गणेश जी की उत्पत्ति तथा गणेश चतुर्थी से जुड़ी विभिन्न कथाएं प्रचलित हैं।
1. श्री गणेश जन्म से जुड़ी पौराणिक कथाएं
माता पार्वती के कठोर तप से प्राकट्य (गणेश चालीसा): माता पार्वती ने पुत्र प्राप्ति के लिए कठोर तप किया। तप से प्रसन्न होकर श्री गणेश ने एक ब्राह्मण के रूप में प्रकट होकर उन्हें बिना गर्भधारण किए दिव्य पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। तत्पश्चात वे स्वयं पालने में बालक रूप में प्रकट हो गए।
पुण्यक व्रत का फल: पद्म पुराण की एक अन्य मान्यता के अनुसार, माता पार्वती द्वारा किए गए 'पुण्यक व्रत' के फलस्वरूप गणेश जी का जन्म हुआ।
उबटन और मिट्टी से निर्माण (शिव पुराण): माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन (हल्दी) से एक पुतला बनाकर उसमें प्राण फूंके और उन्हें द्वारपाल बनाया। जब उन्होंने शिवजी को अंदर जाने से रोका, तो शिवजी ने अज्ञानतावश उनका मस्तक काट दिया। बाद में माता पार्वती के विलाप करने पर, उत्तर दिशा में सो रही हथिनी के शिशु का मस्तक लाकर बालक के धड़ से जोड़ा गया और उन्हें नया जीवन मिला।
गंगाजल और आकृति (पद्म पुराण): माता पार्वती ने अपने उबटन से गजमुख वाली आकृति बनाकर उसे गंगा में प्रवाहित कर दिया। गंगाजी में जाते ही वह विशालकाय हो गई। तब माता पार्वती ने उन्हें पुत्र कहकर पुकारा और ब्रह्मा जी ने उन्हें समस्त गणों का स्वामी (गणेश) बनाया।
पंचतत्वों से निर्माण (वराह पुराण): भगवान शिव ने गणेश जी का निर्माण पंचतत्वों से अत्यंत रूपवान रूप में किया था। देवताओं को उनके प्रति अति-आकर्षण का भय हुआ, जिसे समझकर शिवजी ने उनका पेट बड़ा कर दिया और मुख हाथी का लगा दिया।
देवताओं की रक्षा हेतु प्राकट्य (लिंग पुराण): दानवों के दुष्टकर्मों में विघ्न डालने के लिए देवताओं ने शिवजी की आराधना की। तब शिवजी के आशीर्वाद से गजानन का प्राकट्य हुआ, जिन्हें दैत्यों के कार्यों में बाधा डालने और शुभ कार्यों को सिद्ध करने का दायित्व सौंपा गया।
2. स्यामंतक मणि और चंद्र-दर्शन दोष की कथा
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्रमा देखने से मनुष्य पर अकारण ही झूठा लांछन लगता है। स्वयं भगवान श्री कृष्ण पर भी स्यमंतक मणि चोरी करने का मिथ्या दोष लगा था:
लांछन और युद्ध: सत्राजित ने अपने भाई प्रसेनजित की हत्या और मणि चोरी का आरोप श्री कृष्ण पर लगाया। वास्तव में प्रसेनजित को शेर ने और शेर को रीछराज जामवंत ने मारा था। श्री कृष्ण ने 21 दिनों तक जामवंत से युद्ध कर सच्चाई उजागर की और मणि वापस प्राप्त की।
गणेश जी का शाप: नारद जी ने श्री कृष्ण को बताया कि गणेश जी के रूप का उपहास उड़ाने पर चंद्रमा को शाप मिला था कि भाद्रपद चतुर्थी को जो भी उसे देखेगा, वह कलंकित होगा।
दोष निवारण: नारद जी के सुझाव पर श्री कृष्ण ने सिद्धिविनायक (गणेश चतुर्थी) का व्रत किया और निष्कलंक हुए। बाद में युधिष्ठिर ने भी महाभारत युद्ध में विजय पाने के लिए यही व्रत किया था।
चंद्र-दर्शन दोष निवारण मंत्र:
"सिंह: प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हत:। सुकुमारक मारोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकर:॥"

