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Sharad Purnima: कब है शरद पूर्णिमा? इस दिन किसकी होती है पूजा? चंद्रमा की रोशनी में क्‍यों रखते हैं खीर?

When is Sharad Purnima, Who is worshipped on this day
Sharad Purnima 2026: आश्‍विन माह की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। इसे कोजागरी पूर्णिमा, रास पूर्णिमा तथा कोजागरी लक्ष्मी पूजा भी कहते हैं। इस बार शरद पूर्णिमा 25 अक्टूबर, रविवार 2026 को मनाई जा रही है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शरद पूर्णिमा वर्षभर की सभी पूर्णिमा तिथियों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। शरद पूर्णिमा के दिन चांद अपनी 16 कलाओं से युक्त होकर धरती पर अमृत की वर्षा करता है। पूर्णिमा की रात जिस भी चीज पर चंद्रमा की किरणें गिरती हैं, उसमें अमृत का संचार होता है। आइए जानते हैं शरद पूर्णिमा के दिन किसकी होती है पूजा? खीर बनाकर पूरी रात चंद्रमा की रोशनी में क्‍यों रखी जाती है? 
 

शरद पूर्णिमा पर पूजा के शुभ मुहूर्त 

ब्रह्म मुहूर्त: प्रात: 04:46 से 05:37 बजे तक।  
अभिजित मुहूर्त: सुबह 11:42 से दोपहर 12:27 बजे तक।
गोधूलि मुहूर्त: शाम 05:42 से 06:07 बजे तक।
 

तिथि और समय विवरण

पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 25 अक्टूबर 2026 को सुबह 11:55 बजे।
पूर्णिमा तिथि समाप्त: 26 अक्टूबर 2026 को सुबह 09:41 बजे।
चन्द्रोदय: शरद पूर्णिमा के दिन चन्द्रोदय शाम 05:00 बजे होगा।
 

कब है शरद पूर्णिमा?

शरद पूर्णिमा इस वर्ष 25 अक्टूबर, रविवार 2026 को मनाई जाएगी। खीर को अमृतमय बनाने के लिए इसे चंद्रमा की शुद्ध और शक्तिशाली रोशनी में रखना चाहिए, लेकिन शुभ मुहूर्त का ध्यान रखना अनिवार्य है। शरद पूर्णिमा के दिन चन्द्रोदय शाम 05:00 बजे होगा। 
 

इस दिन किसकी होती है पूजा?

पौराणिक मान्यता के अनुसार, शरद पूर्णिमा के दिन माता लक्ष्मी जी का अवतरण हुआ था। साथ ही इस दिन रास पूर्णिमा होने के कारण भी राधा-कृष्ण के पूजन का तथा भोलेनाथ-पार्वती माता के साथ ही कार्तिकेय और गणेश पूजन का भी विशेष महत्व है। धन-वैभव और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए इस दिन धन की देवी मां लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और व्रत रखा जाता है। 
 
सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर साफ-सफाई करें। फिर ध्यानपूर्वक माता लक्ष्मी और श्रीहरि की पूजा करें। पूजन हेतु गाय के दूध में चावल की खीर बनाकर तैयार रख लें। देवी लक्ष्मी और श्री विष्णु की पूजा करने के लिए चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करें।
 
अब भगवान की प्रतिमा के सामने घी का दीया जलाएं, धूप, अगरबत्ती करें। इसके बाद प्रतिमा को गंगाजल से स्नान कराकर अक्षत और रोली से तिलक लगाएं। लाल या पीले पुष्प अर्पित करें। इस दिन माता लक्ष्मी को गुलाब का फूल अर्पित करना विशेष फलदायक होता है।
 
तिलक करने के बाद सफेद या पीले रंग की मिठाई से भोग लगाएं। शाम के समय चंद्रमा निकलने पर अपने सामर्थ्य के अनुसार गाय के शुद्ध घी के दीये जलाएं। इसके बाद खीर को कई छोटे बर्तनों में भरकर छलनी से ढंक कर चंद्रमा की रोशनी में रख दें। अगली सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर उस खीर को मां लक्ष्मी को अर्पित करें। तत्पश्चात वह खीर प्रसाद रूप में घर-परिवार के सदस्यों में बांट दें।
 

इस मंत्र से करें पूजन 

भागवत महापुराण में वर्णन किया गया है कि यदि आप चाहते हैं आपका भाग्य, सौभाग्य बन जाए तो शरद पूर्णिमा पर सुंदर, श्वेत और चमकीले चंद्र देव को निम्न मंत्र से पूजें तथा चांदी के बर्तन में दूध और मिश्री का भोग लगाकर इस मंत्र 'पुत्र पौत्रं धनं धान्यं हस्त्यश्वादिगवेरथम् प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु मे' का रातभर जाप करें। 
 

चंद्रमा की रोशनी में क्‍यों रखते हैं खीर?

पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा के दिन चांद अपनी 16 कलाओं से युक्त होकर धरती पर अमृत की वर्षा करता है। पूर्णिमा की रात जिस भी चीज पर चंद्रमा की किरणें गिरती हैं, उसमें अमृत का संचार होता है। इसलिए शरद पूर्णिमा के दिन खीर बनाकर पूरी रात चंद्रमा की रोशनी में रखा जाता है और सुबह उठकर इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। 
 
मान्‍यताओं के अनुसार, चंद्रमा की रोशनी में रखी गई खीर खाने से शरीर के कई रोग समाप्त होते हैं। साथ ही जिन जातकों की कुंडली में चंद्रमा शुभ फल नहीं देते हैं, उन्हें तो इस खीर का सेवन जरूर करना चाहिए। इस विशेष दिन पर चांदनी में खीर रखने की परंपरा सदियों पुरानी है, जिसके पीछे स्वास्थ्य, धन और आध्यात्मिक लाभ जुड़े हैं।
 

वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक तर्क

शरद ऋतु (सितंबर से नवंबर) में दिन गर्म और रातें ठंडी होने लगती हैं, जिससे शरीर में पित्त दोष बढ़ जाता है। खीर, जिसमें मुख्य रूप से दूध, चावल और चीनी (या मिश्री) होती है, स्वभाव से शीतल होती है। रातभर चंद्रमा की शीतल किरणों में रखने से इसकी शीतलता और बढ़ जाती है, जो बढ़े हुए पित्त को शांत करने में मदद करती है।
 
दूध में लैक्टिक एसिड और चावल में स्टार्च होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ये दोनों तत्व चंद्रमा की किरणों से ऊर्जा और शक्ति को अवशोषित करने में सहायक होते हैं। खासकर दमा (अस्थमा) और हृदय रोग से पीड़ित लोगों के लिए इस खीर का सेवन विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है, क्योंकि यह शरीर को आंतरिक शीतलता प्रदान करती है।
 
विशेष रूप से यह पर्व बंगाल, ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है तथा बंगाल में इसे 'लक्ष्मी पूर्णिमा' के रूप में मनाया जाता है और महाराष्ट्र में इसे 'कोजागिरी पौर्णिमा' कहते हैं।
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