रामदेव जयंती: मक्का के पीरों ने भी माना था बाबा का लोहा, कौन हैं श्री कृष्ण के अवतार? जानिए 'पीरों के पीर' की पूरी कहानी
Baba Ramdev Jayanti 2026 : राजस्थान और पश्चिमी भारत की सांस्कृतिक आस्था के दैदीप्यमान प्रतीक, लोक देवता बाबा रामदेवजी, जो कि रामसा पीर के नाम से भी जाने जाते हैं। बाबा रामदेवजी को हिन्दू रामदेवजी और मुस्लिम उन्हें रामसा पीर कहते हैं। बाबा रामदेव के समाधि स्थल रुणिचा में मेला लगता है, जहां भारत और पाकिस्तान से लाखों की तादाद में लोग आते हैं। इनमें से हजारों तो पैदल ही वहां जाते हैं। बाबा रामदेव की यह जयंती इस साल 13 सितंबर, रविवार को मनाई जा रही है। जानिए 'पीरों के पीर' बाबा रामदेवजी की पूरी कहानी...
यहां हुआ था बाबा रामदेव का जन्म
विक्रम संवत् 1409 में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की द्वितीया (भादवा सुदी बीज) के शुभ अवसर पर बाबा रामदेव जी का जन्म उड़ूकासमेर (उंडू-काश्मीर) गांव, तहसील शिव, जिला बाड़मेर, राजस्थान में तंवर (तोमर) वंशीय राजपूत राजा अजमल जी और माता मैणादे के घर में हुआ। बाबा रामदेव की यह जयंती इस साल 13 सितंबर, रविवार को मनाई जा रही है।
क्यों माने जाते हैं भगवान कृष्ण के अवतार?
निःसंतान राजा अजमल जी की अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर द्वारकाधीश (श्री कृष्ण) ने स्वयं उनके घर पुत्र रूप में अवतरित होने का वरदान दिया था।
बाबा रामदेव ने अत्याचार से दिलाई मुक्ति
बाल्यकाल में ही उन्होंने पोकरण क्षेत्र को भैरव नामक राक्षस के क्रूर आतंक से मुक्त कराया और जनमानस में अभय का संचार किया। लोककथाओं के अनुसार, बाबा ने जीवनकाल में 24 बड़े चमत्कार (परचे) दिखाए, जो दुखियों के निवारण और धर्म रक्षा के हेतु थे। उन्होंने 'चौबीस वाणियां' नामक रचना के माध्यम से अपनी शिक्षाएं दीं।
बाबा रामदेव ने समानता का दिया संदेश
14वीं शताब्दी के सामाजिक अंधकार में उन्होंने जाति-पांत, ऊंच-नीच और वर्ग-भेद की दीवारों को पूरी तरह ढहा दिया। उन्होंने मेघवाल समाज की कन्या 'डाली बाई' को अपनी बहन बनाकर समाज को समरसता का सर्वोच्च संदेश दिया। यही कारण है कि हिंदू समाज जहां उन्हें श्री कृष्ण का अवतार मानकर पूजता है, वहीं मुस्लिम समुदाय उन्हें 'रामापीर' या 'रामसा पीर' के रूप में अगाध श्रद्धा अर्पित करता है।
बाबा रामदेव को ऐसे मिली 'रामसा पीर' की उपाधि
मक्का से आए 5 सिद्ध पीरों ने जब बाबा की आध्यात्मिक सामर्थ्य की परीक्षा ली, तो बाबा ने उन्हें मक्का से ही उनके मूल भोजन-पात्र मंगवाकर परोसे। इस दिव्य परचे से प्रभावित होकर पीरों ने स्वीकार किया कि हम तो केवल पीर हैं, आप पीरों के पीर (रामसा पीर) हैं।
महाप्रयाण और जीवंत समाधि
लोक देवता बाबा रामदेवजी ने विक्रम संवत् 1442 में मात्र 33 वर्ष की आयु में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को रुणिचा (रामदेवरा) में राम सरोवर के तट पर जीवित समाधि ली। बाबा से 2 दिन पूर्व ही उनकी अनन्य शिष्या डाली बाई ने नवमी तिथि को समाधि ली थी, जिनकी पवित्र समाधि भी मुख्य मंदिर परिसर में बाबा की समाधि के पास ही विद्यमान है। रुणिचा के मंदिर में बाबा की समाधि के अलावा उनके परिवार वालों की समाधियां भी हैं।
रामदेवरा मेला और महायात्रा
प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी तक जैसलमेर के रामदेवरा धाम में विशाल मेला आयोजित किया जाता है। इस दौरान राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा और पंजाब से लाखों पदयात्री अपने हाथों में पंचरंगी ध्वज (नेजा) लहराते हुए, 'खम्मा-खम्मा' और 'जय बाबे री' के जयघोषों के साथ पैदल चलकर रामदेवरा पहुंचते हैं। बाबा रामदेव ने जिस स्थान पर समाधि ली, उस स्थान पर बीकानेर के राजा गंगासिंह ने एक सुंदर और भव्य मंदिर का निर्माण करवाया है।

