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Phalguni Amavasya 2020 : फाल्गुनी अमावस्या पर करें ये 5 कार्य तो कटेगा संकट

शुक्रवार,फ़रवरी 21, 2020
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यूं तो साल के 12 महीनों में 12 अमावस्याएं आती हैं, लेकिन उनमें से कुछ श्राद्ध कर्म, पितृ-तर्पण आदि कार्यों के लिए बहुत खास मानी जाती हैं। फाल्गुन अमावस्या उन्ही में से एक है।
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हिन्दू कैलेंडर के अनुसार अमावस्या के दिन चंद्र नहीं दिखाई देता अर्थात जिसका क्षय और उदय नहीं होता है उसे अमावस्या कहा गया है। अमावस्या माह में एक बार ही आती है।
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यह अमावस्या सुख, संपत्ति और सौभाग्य की प्राप्ति के लिए विशेष फलदायी है। जीवन में सुख और शांति के लिए फाल्गुन अमावस्या का व्रत रखा जाता है।
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23 फरवरी के दिन धन की देवी मां लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के लिए शाम के समय घर के ईशान कोण में गाय के घी का दीपक लगाएं। बत्ती में रूई के स्थान पर लाल रंग के धागे का उपयोग करें। प्रस्तु‍त हैं फाल्गुन अमावस्या के 2 सरल उपाय...
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रामायण में प्रसंग आता है कि भगवान श्रीराम ने शबरी के झूठे बैर खाएं थे। आओ जानते हैं माता शबरी के बारे में 5 रहस्य।
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साल में 12 अमावस्या होती हैं। इस दिन 108 बार तुलसी की परिक्रमा करने से मन को शांति की अनुभूति होती है। जो लोग आध्यात्मिक मार्ग पर बढ़ना चाहते हैं उनके लिए भी यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। आइए जानें साल भर की 12 अमावस कब कब आ रही हैं...
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23 फरवरी 2020 रविवार, को फाल्गुन अमावस्या है। इस अमावस्या का शास्त्रों में अत्यधिक महत्व बताया गया है। हिन्दू धर्म-संस्कृति में आस्था रखने वालों के लिए वैसे तो प्रत्येक मास की
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प्रदोष को प्रदोष कहने के पीछे एक कथा जुड़ी हुई है। संक्षेप में यह कि चंद्र को क्षय रोग था, जिसके चलते उन्हें मृत्युतुल्य कष्टों हो रहा था। भगवान शिव ने उस दोष का निवारण कर उन्हें त्रयोदशी के दिन पुन:जीवन प्रदान किया था अत: इसीलिए इस दिन को प्रदोष ...
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प्रदोष माह में दो बार यानी शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष की बारस अथवा तेरस को आता है। प्रदोष का व्रत एवं उपवास भगवान सदाशिव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। प्रदोष काल में स्नान करके मौन रहना चाहिए, क्योंकि शिवकर्म सदैव मौन रहकर ही पूर्णता को प्राप्त ...
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हर महीने की दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। अलग-अलग दिन पड़ने वाले प्रदोष की महिमा अलग-अलग होती है। सोमवार का प्रदोष, मंगलवार को आने वाला प्रदोष और अन्य वार को आने वाला प्रदोष सभी का महत्व और लाभ अलग अलग है। आओ जानते हैं इस ...
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हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार माह की त्रयोदशी तिथि में सायंकाल को प्रदोष काल कहा जाता है। इस प्रदोष व्रत को मंगलकारी एवं शिव की कृपा दिलाने वाला माना गया है।
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ग्यारस अर्थात ग्यारह तिथि को एकादशी और तेरस या त्रयोदशी तिथि को प्रदोष कहा जाता है। प्रत्येक शुक्ल और कृष्ण पक्ष में यह दोनों ही तिथियां दो बार आती है। हिन्दू धर्म में एकादशी को विष्णु से तो प्रदोष को शिव से जोड़ा गया है।
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दोष-व्रत को श्रद्धा व भक्तिपूर्वक करने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। आज हम वेबदुनिया के पाठकों को प्रदोष-व्रत की पूर्ण जानकारी देंगे।
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पौराणिक शास्त्रों में प्रदोष व्रत की बड़ी महिमा है। इस दिन भगवान शिव जी की विधिपूर्वक आराधना करने से सभी संकटों से मुक्ति मिलती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। आइए जानें कैसे करें पूजन :-
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प्रदोष-व्रत चन्द्रमौलेश्वर भगवान शिव की प्रसन्नता व आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए किया जाता है। भगवान शिव को आशुतोष भी कहा गया है, जिसका आशय है-शीघ्र प्रसन्न होकर आशीष देने वाले। प्रदोष-व्रत को श्रद्धा व भक्तिपूर्वक करने से भगवान शिव की विशेष कृपा ...
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समाज-सुधारक स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म मोरबी के पास काठियावाड़ क्षेत्र जिला राजकोट, गुजरात में 12 फरवरी सन् 1824 में हुआ। तिथि के अनुसार फल्गुन मास की कृष्ण दशमी के दिन उनका जन्म हुआ था। मूल नक्षत्र में जन्म होने के कारण उनका नाम मूलशंकर रखा गया ...
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राम जब सीता को रावण के पास से छुड़वाकर अयोध्या ले आए तो उनके राज्याभिषेक के कुछ समय बाद मंत्रियों और दुर्मुख नामक एक गुप्तचर के मुंह से राम ने जाना कि प्रजाजन सीता की पवित्रता के विषय में संदिग्ध है अत: सीता और राम को लेकर अनेक मनमानी बातें बनाई जा ...
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देवी सीता मिथिला के राजा जनक की ज्येष्ठ पुत्री थीं इसलिए उन्हें 'जानकी' भी कहा जाता है। कहते हैं कि राजा जनक को माता सीता एक खेत से मिली थी। इसीलिए उन्हें धरती पुत्री भी कहा जाता है। लक्ष्मण, भारत और शत्रुघ्न की पत्नियां माता सीता की बहनें थीं।
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उसी समय ब्रह्माजी वहां आए और भगवान से कहने लगे- 'रघुनंदन! इसे तो मैंने स्त्री के हाथों मरने का वरदान दिया है। आपका प्रयास बेकार ही जाएगा।
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