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Ravi Pradosh vrat: रवि प्रदोष व्रत रखने के हैं 3 फायदे, जानिए महत्व

Pradosh Vrat 2026
Ravi Pradosh vrat 2026 : हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार हर महीने में प्रदोष व्रत 2 बार किया जाता है। इस बार 01 मार्च 2026, दिन रविवार को प्रदोष व्रत रखा जा रहा है। रविवार को होने के कारण इसे रवि प्रदोष कहा जाता है। 
 

रवि प्रदोष व्रत का महत्व

प्रदोष प्रदोष का व्रत शिवजी के लिए होता है लेकिन रविवार का दिन अर्थात विष्णु जी का दिन होने से इसका महत्व बढ़ जाता है। इस दिन शिव जी तथा श्री विष्णु का पूजन करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है। यद्यपि प्रदोष व्रत प्रत्येक त्रयोदशी को किया जाता है, परंतु विशेष कामना के लिए वार संयोगयुक्त प्रदोष का भी बड़ा महत्व है। 
 

रवि प्रदोष के 3 बड़े फायदे

1. यह व्रत करने वाले समस्त पापों से मुक्त भी होते हैं।
2. ज्योतिष अनुसार व्रत को करने से जीवन की अनेक समस्याएं दूर की जा सकती हैं।
3. इस व्रत से मनुष्य की स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां दूर होती हैं तथा मनुष्य निरोगी हो जाता है। अत: जो लोग अपने स्वास्थ्य को लेकर हमेशा परेशान रहते हैं, किसी न किसी बीमारी से ग्रसित होते रहते हैं, उन्हें रवि प्रदोष व्रत अवश्य करना चाहिए। 
 

पूजन सामग्री :

1 जल से भरा हुआ कलश, 1 थाली (आरती के लिए), बेलपत्र, धतूरा, भांग, कपूर, सफेद पुष्प व माला, आंकड़े का फूल, सफेद मिठाई, सफेद चंदन, धूप, दीप, घी, सफेद वस्त्र, आम की लकड़ी, हवन सामग्री।
 

पूजन की सरल विधि: 

- इस दिन प्रदोष व्रतार्थी को नमकरहित भोजन करना चाहिए। 
- रवि प्रदोष व्रत के दिन व्रतधारी को प्रात: नित्य कर्मों से निवृत्त होकर स्नानादि कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- फिर उपरोक्त सामग्री से शिव जी का पूजन करें।
- इस पूरे दिन निराहार रहें।
- दिनभर मन ही मन शिव मंत्र 'ॐ नम: शिवाय' का जाप करें।
- फिर सूर्यास्त के पश्चात पुन: स्नान करके भगवान शिव का षोडषोपचार पूजन करें।
- रवि प्रदोष व्रत की पूजा का समय शाम 4.30 से शाम 7.00 बजे के बीच उत्तम रहता है, अत: इस समय पूजा करना उचित रहता है।
- नैवेद्य में जौ का सत्तू, घी एवं शकर का भोग लगाएं।
- तत्पश्चात आठों दिशाओं में 8‍ दीपक रखकर प्रत्येक की स्थापना कर उन्हें 8 बार नमस्कार करें। 
- इसके बाद नंदीश्वर (बछड़े) को जल एवं दूर्वा खिलाकर स्पर्श करें। 
- शिव-पार्वती एवं नंदकेश्वर की प्रार्थना करें।
 
प्रदोष वालों को मंत्र - 'ॐ नम: शिवाय', 'शिवाय नम:', ॐ त्रिनेत्राय नम:, 'ॐ तत्पुरुषाय विद्महे, महादेवाय धीमहि, तन्नो रूद्र प्रचोदयात्' आदि मंत्रों का कम से कम 108 बार जप करें।
 
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