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Last Modified: बुधवार, 20 मई 2026 (11:54 IST)

3 साल बाद आई अधिकमास की पद्मिनी एकादशी, जानें व्रत का महत्व, शुभ मुहूर्त और पौराणिक कथा

Lord vishnu and padmini ekadashi ki vrat katha
17 मई से 15 जून 2026 तक अधिकमास चलेगा। इसे पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। वर्ष में यूं तो 12 माह की 24 एकादशियां होती हैं, लेकिन प्रत्येक 3 वर्षों में 13 माह का वर्ष होने से 2 एकादशियां जुड़कर कुल 26 एकादशियां हो जाती हैं। इस बार ज्येष्ठ माह में अधिकमास लगा है। 27 मई 2026 बुधवार ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष के दिन पहली पद्मिनी एकादशी का व्रत रखा जाएगा, जिसे कमला और पुरुषोत्तमी एकादशी भी कहते हैं। चलिए जानते हैं महत्व और कथा।
 

पद्मिनी एकादशी का महत्व:

पद्मिनी (कमला) एकादशी का महत्व (27 मई 2026): अधिकमास के शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को पद्मिनी या कमला एकादशी कहा जाता है। इस दिन व्रत रखने से व्यक्ति को कीर्ति, वैभव और संतान सुख की प्राप्ति होती है। यह व्रत व्रती को सीधे बैकुंठ धाम का अधिकारी बनाता है और जीवन के सभी भौतिक कष्टों को दूर करता है।
 
शास्त्रों में वर्णित है कि पुरुषोत्तम मास की इन दोनों एकादशियों का व्रत रखने और भगवान विष्णु के 'पुरुषोत्तम' स्वरूप की पूजा करने से सैकड़ों अश्वमेध यज्ञ और वाजपेय यज्ञ करने के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। इन तिथियों पर व्रत रखने के साथ-साथ दीपदान, अन्नदान और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' महामंत्र का जप करने से पितरों को मोक्ष मिलता है और साधक के जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है। इन दुर्लभ एकादशियों के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु के समक्ष दीपक जलाकर व्रत का संकल्प लें। पूरे दिन फलाहार रहें और द्वादशी तिथि के शुभ मुहूर्त में पारण (व्रत खोलना) करें। इस पावन अवसर को हाथ से न जाने दें और श्रीहरि की कृपा प्राप्त करें। भगवान कृष्‍ण बोले- मलमास में अनेक पुण्यों को देने वाली एकादशी का नाम पद्मिनी है। इसका व्रत करने पर मनुष्य कीर्ति प्राप्त करके बैकुंठ को जाता है, जो मनुष्‍यों के लिए भी दुर्लभ है। 
 

पद्मिनी एकादशी के नियम:

यह एकादशी करने के लिए दशमी के दिन व्रत का आरंभ करके कांसे के पात्र में जौ-चावल आदि का भोजन करें तथा नमक न खाएं। भूमि पर सोएं और ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें। एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में शौच आदि से निवृत्त होकर दंतधावन करें और जल के 12 कुल्ले करके शुद्ध हो जाएं। सूर्य उदय होने के पूर्व उत्तम तीर्थ में स्नान करने जाएं। इसमें गोबर, मिट्‍टी, तिल तथा कुशा व आंवले के चूर्ण से विधिपूर्वक स्नान करें। श्वेत वस्त्र धारण करके भगवान विष्णु के मंदिर जाकर पूजा-अर्चना करें।
 

पद्मिनी एकादशी की कथा

पूर्वकाल में त्रेयायुग में हैहय नामक राजा के वंश में कृतवीर्य नाम का राजा महिष्मती पुरी में राज्य करता था। उस राजा की 1,000 परम प्रिय स्त्रियां थीं, परंतु उनमें से किसी को भी पुत्र नहीं था, जो कि उनके राज्यभार को संभाल सके। देव‍ता, पितृ, सिद्ध तथा अनेक चिकि‍त्सकों आदि से राजा ने पुत्र प्राप्ति के लिए काफी प्रयत्न किए, लेकिन सब असफल रहे।
 
तब राजा ने तपस्या करने का निश्चय किया। महाराज के साथ उनकी परम प्रिय रानी, जो इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए राजा हरिश्चंद्र की पद्मिनी नाम वाली कन्या थीं, राजा के साथ वन में जाने को तैयार हो गई। दोनों अपने मंत्री को राज्यभार सौंपकर राजसी वेष त्यागकर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करने चले गए। 
 
राजा ने उस पर्वत पर 10 हजार वर्ष तक तप किया, परंतु फिर भी पुत्र प्राप्ति नहीं हुई। तब पतिव्रता रानी कमलनयनी पद्मिनी से अनुसूया ने कहा- 12 मास से अधिक महत्वपूर्ण मलमास होता है, जो 32 मास पश्चात आता है। उसमें द्वादशीयुक्त पद्मिनी शुक्ल पक्ष की एकादशी का जागरण समेत व्रत करने से तुम्हारी सारी मनोकामना पूर्ण होगी। इस व्रत के करने से भगवान तुम पर प्रसन्न होकर तुम्हें शीघ्र ही पुत्र देंगे।
 
रानी पद्मिनी ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से एकादशी का व्रत किया। वह एकादशी को निराहार रहकर रात्रि जागरण कर‍ती। इस व्रत से प्रसन्न होकर भगवान विष्‍णु ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। इसी के प्रभाव से रानी पद्मिनी के घर कार्तवीर्य उत्पन्न हुए। जो बलवान थे और उनके समान तीनों लोकों में कोई बलवान नहीं था। तीनों लोकों में भगवान के सिवा उनको जीतने का सामर्थ्य किसी में नहीं था। 
 
सो जिन मनुष्यों ने मलमास शुक्ल पक्ष एकादशी का व्रत किया है, जो संपूर्ण कथा को पढ़ते या सुनते हैं, वे भी यश के भागी होकर विष्‍णुलोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार अधिक मास की पद्मिनी एकादशी की महिमा है, जो मनुष्य को पुत्ररत्न की प्राप्ति करवा कर समस्त सुख देती है और मृत्यु पश्चात मोक्ष प्रदान करती है।
 
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वेबदुनिया धर्म-ज्योतिष टीम
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