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Goa Diwali Tradition: गोवा में दिवाली नहीं, क्यों मनाया जाता है 'नरकासुर वध' का सबसे बड़ा जश्न? जानें अनोखी वजह

diwali in goa
Narkasur Vadh Diwas: गोवा में भी दिवाली मनाई जाती है लेकिन उत्तर भारत या अन्य राज्यों में जहाँ लक्ष्मी पूजन (अमावस्या) को दिवाली का मुख्य दिन माना जाता है, वहीं गोवा में नरक चतुर्दशी की रात और सुबह ही दिवाली का सबसे बड़ा और मुख्य आकर्षण होती है। देशभर में दीवाली श्रीराम के अयोध्या आगमन की खुशी में मनाई जाती है, लेकिन गोवा में इस उत्सव के नायक भगवान श्रीकृष्ण हैं। यहाँ कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी (नरक चतुर्दशी) को दीवाली से भी अधिक उत्साह और धूमधाम से 'नरकासुर वध दिवस' के रूप में मनाया जाता है।
 

पौराणिक संदर्भ और महत्व

मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से अत्याचारी दैत्य नरकासुर का वध किया था और उसकी कैद से 16 हजार स्त्रियों को मुक्त कराया था। गोवा वासियों का मानना है कि जब तक अधर्म का अंत नहीं होता, तब तक असली प्रकाश का पर्व शुरू नहीं हो सकता।

उत्सव की अनूठी परंपराएँ

विशालकाय पुतले: इस अवसर पर गोवा के हर गाँव और शहर में कागज़, लकड़ी और पटाखों से नरकासुर के विशाल पुतले बनाए जाते हैं।
तड़के पुतला दहन: सूर्योदय से ठीक पहले इन पुतलों का दहन करके बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश दिया जाता है। इसके बाद ही दीपदान और मुख्य दीवाली का शुभारंभ होता है।
 

नरकासुर के पुतलों का निर्माण और प्रतियोगिताएँ:

दीपावली की पूर्व संध्या (नरक चतुर्दशी की रात) गोवा के हर गाँव, शहर और मोहल्ले में युवा राक्षस 'नरकासुर' के विशालकाय, डरावने और कलात्मक पुतले बनाते हैं। इसमें रोशनी, पटाखे और डीजे/संगीत का जबरदस्त इस्तेमाल होता है। गोवा भर में सबसे बेहतरीन नरकासुर पुतले की प्रतियोगिताएँ (Narkasur Competitions) आयोजित की जाती हैं।
 

रातभर की झांकियां और सुबह दहन:

नरक चतुर्दशी की पूरी रात लोग सड़कों पर घूमकर इन नरकासुर के पुतलों और झांकियों को देखते हैं। फिर सूर्योदय से ठीक पहले (तड़के) भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध के प्रतीक के रूप में इन पुतलों को जलाया जाता है, जिसे 'अधर्म पर धर्म की विजय' और 'अंधकार पर प्रकाश की जीत' के रूप में मनाया जाता है।
 

करीट (Karit) फल कुचलने की परंपरा:

नरकासुर दहन के बाद सुबह लोग अभ्यंग स्नान (उबटन और तेल से स्नान) करते हैं। इसके बाद पैर के अंगूठे से 'करीट' (एक प्रकार का छोटा कड़वा फल) को कुचला जाता है, जो नरकासुर के अंत का प्रतीक है। फिर इसका थोड़ा सा रस चखा जाता है और इसके बाद ही पारंपरिक दिवाली का नाश्ता (विभिन्न प्रकार के 'पोहे' या 'फोव') खाया जाता है।
 
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