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जगन्नाथ मंदिर के बाना में रहस्यमयी गांठ, क्या अर्नब तूफान से बच गया ओडिशा!

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चक्रवात अरनाव या अर्नब की तबाही के बीच ओडिशा के पूरी जगन्नाथ मंदिर के 215 फीट ऊंचे शिखर पर फहराते पतित पावन बाणा में रहस्यमयी गांठ बंध गई जिसे 'शून्य ग्रंथि' कहा जा रहा है। कहते हैं कि इस गांठ की वजह से 150 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से चलने वाली हवाएं रुक गई। माना जा रहा है कि इस अलौकिक घटना से महाप्रभु ने पूरे पूरी धाम को चक्रवात के कहर से बचा लिया है। हालांकि यह गांठ कैसे लगी यह सभी के लिए आश्चर्य का विषय है।
 
दरअसल, प्रभु जगन्नथ के मंदिर पर लहराता पतित पावन ध्वज हवा की विपरीत दिशा में लहराता है लेकिन जब चक्रवात अर्नब ने ओड़िसा में तबाही मचाना प्रारंभ की तो इस ध्वजा की एक अजीब गांठ बंध गई जिसे शून्य ग्रंथि कहा जा रहा है जो कि बहुत ही दुर्लभ दृष्य है। कहते हैं कि जगन्नाथ मंदिर में जो भी घटना घटती है वह भविष्य में होने वाली घटना का संकेत है।

ध्वज में बनी 'शून्य ग्रंथि' (अनोखी गांठ)

अर्नब तूफान के दौरान जब पुरी में बहुत तेज रफ्तार हवाएं चल रही थीं, तब मंदिर के शिखर (215 फीट ऊंचे नीलचक्र) पर लहराते हुए ध्वज (पतित पावन बाणा) के कपड़े में हवा के तेज दबाव से एक विशेष प्रकार की अनोखी गांठ (शून्य ग्रंथि) बन गई। भगवान जगन्नाथ के भक्तों और पुजारियों के बीच इस घटना को एक अलौकिक संकेत माना जा रहा है। लोगों का मानना है कि महाप्रभु ने इस अनोखी गांठ के जरिए तूफान का बड़ा असर बांध दिया और पुरी धाम व ओडिशा को चक्रवात के भीषण विनाश से सुरक्षित बचा लिया।
 

ध्वज फटने और बदलने की चर्चा

भारी बारिश और तेज तूफानी हवाओं के कारण ध्वज का कुछ हिस्सा फट गया था, जिसके बाद मंदिर परंपरा के अनुसार सेवकों ने सुरक्षा मानकों का ध्यान रखते हुए नियमानुसार नया ध्वज फहराया। सोशल मीडिया पर ध्वज फटने/बदलने के दृश्यों के साथ कई तरह की पुरानी और भ्रामक खबरें (जैसे पुरानी आपदाओं की क्लिप्स) भी शेयर की जाने लगीं है।
 
तूफान 'अर्नब' के समय मंदिर के शिखर पर हवा के कारण बनी उस विशेष गांठ और लहराते ध्वज का वीडियो भक्तों के बीच काफी आस्था और कौतूहल का विषय बना हुआ है। सेवायतों और प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे किसी तरह के अंधविश्वास या अफवाहों से बचें और केवल अधिकृत जानकारियों पर ही भरोसा करें।
 

ध्वज से मिलते हैं शुभ और अशुभ के संकेत:

श्री जगन्नाथ मंदिर के ध्वज (पतित पावन बाणा) से जुड़ी घटनाओं को लेकर ओडिशा की परंपराओं, स्थानीय सेवायतों और भक्तों के बीच दो अलग-अलग दृष्टिकोण देखे जाते हैं:-

धार्मिक एवं पारंपरिक मान्यताएं (लोक विश्वास)

सुरक्षा का संकेत: श्रद्धालुओं और स्थानीय सेवायतों का मानना है कि भीषण चक्रवात 'अर्नब' के दौरान ध्वज में गांठ बनना या उसका पूरी तरह से न उड़ना, महाप्रभु जगन्नाथ द्वारा अपने क्षेत्र को भीषण प्राकृतिक आपदा से बचा लेने (कवच बनाने) का दिव्य संकेत है।
अपशकुन या चेतावनी (प्राचीन परंपराएं): उड़िया साहित्य (जैसे अच्युतानंद दास जी द्वारा रचित 'मालिका') और मंदिर की परंपराओं में नीलचक्र पर लगे ध्वज के फटने, हवा के विपरीत बहने या बार-बार उड़ जाने को आने वाले समय में प्राकृतिक आपदा, राजनीतिक उथल-पुथल या महामारियों का 'पूर्व संकेत' माना जाता रहा है।

ध्वज से जुड़ी पूर्व की घटनाएं:

पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर के 215 फीट ऊंचे नीलचक्र पर लहराते ध्वज (पतित पावन बाणा) से जुड़ी ऐसी कई घटनाएं पहले भी घटी हैं, जिन्हें श्रद्धालुओं द्वारा किसी न किसी बड़े अलौकिक या भविष्य के संकेत के रूप में देखा गया:

वर्ष 2025 में पहलगाम आतंकी महला और ऑपरेशन सिंदूर:

पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर के शिखर पर स्थित नीलचक्र और उस पर लहराते 'पतितपावन बाना' कई बार भविष्‍य के संकेत दे चुका है। उल्लेखनीय है कि 14 अप्रैल 2025 को मंदिर के शिखर पर फहराई गई धर्म ध्वजा को एक पक्षी उठाकर ले गया था इसके बाद 22 अप्रैल को पहलगाम में आतंकवादी हमला हुआ और 26 पर्यटकों की मौत हो गई और फिर ऑपरेशन सिंदुर लॉन्च हुआ। अब ध्वजा पर पक्षी का बैठना किस बात कर संकेत है?

वर्ष 2019 (चक्रवात 'फणि' के समय ध्वज मुड़ जाना):

मई 2019 में जब ओडिशा में भीषण 'फणि' तूफान आया था, तब मंदिर के शिखर का ध्वज मुड़कर उल्टी दिशा में चला गया था और एकाएक हवा के भीषण थपेड़ों के बीच ध्वज का कुछ हिस्सा फट गया था।
स्थानीय लोगों और सेवायतों ने इसे राज्य पर आने वाली बड़ी आपदा का संकेत माना था, जिसके ठीक बाद राज्य को फणि तूफान के कारण भारी तबाही का सामना करना पड़ा था।

वर्ष 2020 (कोरोना महामारी के दौरान ध्वज में आग लगना):

मार्च 2020 में (लॉकडाउन शुरू होने के ठीक आसपास) एकाएक नीलचक्र पर लहराते ध्वज में दीपक की लौ से आग लग गई थी और वह जल गया था।
जगन्नाथ परंपरा और 'मालिका' साहित्य के जानकारों ने इसे एक बड़ा अशुभ संकेत माना था। इसके तुरंत बाद ही पूरे देश और दुनिया में कोरोना महामारी का भीषण संकट और लॉकडाउन की स्थिति बनी थी।

ध्वज का बार-बार उड़ जाना या नीलचक्र पर न टिकना:

इतिहास में कई बार ऐसा देखा गया है कि जब भी राज्य में कोई बड़ा राजनीतिक संकट, सूखा या चक्रवात आने वाला होता है, तो ध्वज अपने स्थान से अचानक उड़ जाता है या ध्वज बांधने में असामान्य रुकावट आती है।
 

जगन्नाथ पुरी मंदिर के ध्वज की 11 खास बातें:

ओडिशा राज्य के पुरी में स्थित विशालकाय जगन्नाथ मंदिर के गुंबद पर स्थापित नीलचक्र और उसके ऊपर लहराता भगवान जगन्नाथ का ध्वज किसी आश्‍चर्य से कम नहीं है। 
1. श्री जगन्नाथ मंदिर के ऊपर स्थापित त्रिकोणीय आकार का ध्वज सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराता है।
2. यह ध्वज लाल, पीला, सफेद और केसरिया रंग का होता है।
3. इस ध्वज पर शिवजी का अर्ध चंद्र बना हुआ है, चंद्र के सूर्य का चिन्ह है।
4. प्रतिदिन सायंकाल मंदिर के ऊपर स्थापित ध्वज को मानव द्वारा बदला जाता है जिन्हें चुनरा नियोग और गरूढ़ सेवक कहते हैं। 
5. शिखर पर कई ध्वज लगाए जाते हैं जिसमें मुख्‍य ध्वज को 'पतित पावन बाना' कहा जाता है।
6. श्री मंदिर के 45 मंजिला शिखर पर ध्वज हर दिन शाम 4 से 5 बजे के बीच बदला जाता है।
7. ऐसी मान्यता है कि यदि ध्वज एक दिन भी नहीं बदला गया तो मंदिर 18 सालों के लिए बंद हो जाएगा।
8. इस 20 मीटर लंबे ध्वज को 800 साल से चोला परिवार ही बदलता आ रहा है।
9. ऐसा भी कहते हैं कि पहले यह ध्वज इतना लंबा होता था कि यह समुद्र के उपर तक लहराता था और लोग इसे पकड़कर स्नान करते थे।
10. मुख्य ध्वज के नीचे की और लहराने वाली पताका को 'मानसिक बाना' कहते हैं। इस ध्वज को श्रद्धालु द्वारा भेंट किया जाता है। 
11. इसके अलावा पादु खाकिया नामक 250 फीट एक लंबा बाना सुदर्शन चक्र से बाधते हैं जिसका अंतिम सिर श्रीमंदिर के उत्तरी भाग में स्थित पादुका कुंड या अमृत कुंड में डूबा रहता है। भक्तगण इस सिरे को निचोड़कर उस पानी को पीते हैं।
 
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