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गुंडिचा मंदिर क्यों है जगन्नाथ रथयात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव? जानिए 5 खास बातें

Interesting facts about Gundicha Temple
Gundicha Temple: भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा का सबसे महत्वपूर्ण और केंद्रीय पड़ाव गुंडिचा मंदिर ही है। प्रत्येक वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पुरी में श्री जगन्नाथ प्रभु की रथयात्रा निकाली जाती है। यह रथ मुख्य मंदिर से निकलकर 3 किलोमीटर दूर गुंडिचा मंदिर जाता है और वहीं 9 दिनों तक रहने के बाद देवशयनी एकादशी के दिन लौट आता है। धार्मिक, पौराणिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह पड़ाव क्यों इतना खास है, आइए इसकी 5 सबसे महत्वपूर्ण बातें समझते हैं।

1. महालक्ष्मी को छोड़कर केवल भाई-बहन का एकांत प्रवास

गुंडिचा मंदिर का पड़ाव इसलिए सबसे अनोखा है क्योंकि यहाँ भगवान जगन्नाथ अपनी पत्नी, धन और ऐश्वर्य की देवी महालक्ष्मी को मुख्य मंदिर में ही छोड़ आते हैं। वे केवल अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ यहाँ 9 दिनों के लिए आते हैं। यह पड़ाव इस बात का प्रतीक है कि भगवान कुछ दिनों के लिए ऐश्वर्य और राजसी ठाट-बाट को छोड़कर, अपने भक्तों के बीच बेहद सरल और सहज रूप में रहने आते हैं।
 

2. हेरा पंचमी: माता लक्ष्मी का क्रोध और रथ तोड़ना

रथयात्रा के पांचवें दिन (आषाढ़ शुक्ल पंचमी) को गुंडिचा मंदिर में एक बेहद दिलचस्प परंपरा निभाई जाती है, जिसे 'हेरा पंचमी' (Hera Panchami) कहा जाता है। भगवान जगन्नाथ के बिना अकेले रहकर माता लक्ष्मी क्रोधित हो जाती हैं और वे उन्हें ढूंढते हुए गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं। जब वे देखती हैं कि भगवान अपने भाई-बहन के साथ व्यस्त हैं, तो गुस्से में आकर वे भगवान जगन्नाथ के रथ (नंदीघोष) का एक हिस्सा (लकड़ी) तोड़ देती हैं। इसके बाद वे मुख्य मंदिर लौट जाती हैं। यह परंपरा गुंडिचा पड़ाव को बेहद जीवंत और उत्सवपूर्ण बनाती है।
इस दौरान शाम के समय माता लक्ष्मी की पालकी (सुवर्ण महालक्ष्मी) को मुख्य मंदिर से पूरे विधि-विधान के साथ निकाला जाता है। वे (पालकी) मुख्य भव्य मार्ग (बड़ा डांड) से न जाकर एक गुप्त और छोटे रास्ते से गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करती हैं। जब माता लक्ष्मी की पालकी गुंडिचा मंदिर पहुंचती है, तो भगवान जगन्नाथ के सेवक उनका स्वागत करते हैं। यहाँ एक बेहद खास रस्म होती है।
 
मोही चूर्ण: भगवान जगन्नाथ की ओर से माता लक्ष्मी को एक विशेष जड़ी-बूटी का चूर्ण (मोही चूर्ण) भेंट किया जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि भगवान अपनी पत्नी को शांत करने और यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि वे जल्द ही वापस लौटेंगे।
चोरी से दर्शन: माता लक्ष्मी को गुंडिचा मंदिर के भीतर ले जाया जाता है, जहां वे छिपकर (जय-विजय द्वार के पास से) भगवान जगन्नाथ को देखती हैं।
जब माता लक्ष्मी देखती हैं कि भगवान जगन्नाथ अपने भाई-बहन के साथ आनंद मना रहे हैं और उन्हें घर लौटने की कोई जल्दी नहीं है, तो उनका क्रोध बढ़ जाता है। इसके बाद एक बेहद अनोखी रस्म निभाई जाती है।
रथ को नुकसान पहुंचाना: माता लक्ष्मी के निर्देश पर उनके सेवक, भगवान जगन्नाथ के मुख्य रथ 'नंदीघोष' के पास जाते हैं और उसके एक हिस्से (लकड़ी या रथ के एक टुकड़े) को प्रतीकात्मक रूप से तोड़ देते हैं। यह रस्म इस बात का प्रतीक है कि माता लक्ष्मी अपना हक जता रही हैं और भगवान को उनके कर्तव्य की याद दिला रही हैं।
मान-मनुहार और गुप्त वापसी: रथ का हिस्सा तोड़ने के बाद माता लक्ष्मी का गुस्सा थोड़ा शांत होता है, लेकिन वे अभी भी रूठी रहती हैं। वे भगवान जगन्नाथ के सामने आए बिना, उसी समय मुख्य मंदिर (श्रीमंदिर) के लिए वापस निकल पड़ती हैं।
हेरा गोहड़ी (Hera Gohri): वापसी के दौरान वे एक दूसरे रास्ते (हेरा गोहड़ी साही) से जाती हैं ताकि भगवान जगन्नाथ के भक्तों या सेवकों को पता न चले कि वे आकर जा चुकी हैं।
लक्ष्मी-नारायण समझौता (आगामी रस्मों की नींव): हेरा पंचमी की इस घटना के बाद, गुंडिचा मंदिर में भगवान जगन्नाथ के सेवक तुरंत हरकत में आते हैं। भगवान को जब पता चलता है कि देवी नाराज होकर लौट गई हैं, तो वे अपनी वापसी (बहुड़ा यात्रा) की तैयारियां शुरू करने का आदेश देते हैं।
सांस्कृतिक महत्व: हेरा पंचमी की यह परंपरा यह सिखाती है कि भगवान भले ही ब्रह्मांड के स्वामी हों, लेकिन मानवीय लीलाओं में वे अपनी पत्नी के प्रेम और क्रोध के सामने एक साधारण मनुष्य की तरह ही समर्पित नजर आते हैं। पुरी में इस दिन भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है और इस अलौकिक दृश्य को देखकर हर कोई भक्ति-रस में डूब जाता है।

3. आड़प मंडप के महाप्रसाद का महात्म्य

गुंडिचा मंदिर के गर्भगृह को 'आड़प मंडप' (Adapa Mandapa) कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि गुंडिचा मंदिर में इन 9 दिनों के दौरान जो महाप्रसाद (अबाढ़ा) मिलता है, उसे 'आड़प महाप्रसाद' कहते हैं। पुराणों के अनुसार, श्रीमंदिर में 10 साल तक भगवान के दर्शन करने और महाप्रसाद पाने से जो पुण्य मिलता है, वह गुंडिचा मंदिर के आड़प मंडप में केवल एक बार महाप्रसाद ग्रहण करने से मिल जाता है।
 

4. रथयात्रा की शुरुआत का ऐतिहासिक कारण (राजा इंद्रद्युम्न की कथा)

पौराणिक कथाओं के अनुसार, गुंडिचा कोई साधारण जगह नहीं है। सतयुग में मालवा के राजा इंद्रद्युम्न ने जब पुरी में भगवान के विग्रह (मूर्तियों) का निर्माण करवाना चाहा, तो इसी गुंडिचा मंडप वाले स्थान पर महावेदी बनाई गई थी। यहीं पर देवशिल्पी विश्वकर्मा ने बंद दरवाजे के पीछे नीम की लकड़ी (दारु) से तीनों भाई-बहनों की मूर्तियों को आकार दिया था। रानी गुंडिचा (राजा इंद्रद्युम्न की पत्नी) की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने वचन दिया था कि वे हर साल अपने जन्मस्थान (गुंडिचा) आएंगे। इसलिए यह पड़ाव भगवान का प्रकट स्थल भी माना जाता है।
 

5. वापसी की यात्रा: 'बहुड़ा यात्रा' का प्रस्थान बिंदु

नौ दिनों तक गुंडिचा मंदिर में भक्तों को दर्शन देने और मौसी के घर के आतिथ्य (जिसमें प्रसिद्ध पोड़ा पीठा व्यंजन शामिल है) का आनंद लेने के बाद, भगवान की घर वापसी शुरू होती है। इस वापसी की यात्रा को 'बहुड़ा यात्रा' (Bahuda Jatra) कहा जाता है। गुंडिचा मंदिर ही वह पड़ाव है जहाँ से भगवान फिर से अपने रथों पर सवार होकर मुख्य मंदिर (श्रीमंदिर) की ओर प्रस्थान करते हैं।
 
यही कारण हैं कि गुंडिचा मंदिर के बिना जगन्नाथ रथयात्रा की कल्पना भी असंभव है; यह पड़ाव भक्तों और भगवान के सीधे मिलन का सबसे पावन स्थल है।
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