महाप्रभु की घर वापसी: गुंडिचा मंदिर से नीलाद्रि बिजे तक का अलौकिक सफर
jagannath puri bahuda yatra 2026: रथयात्रा केवल महाप्रभु जगन्नाथ की एक यात्रा नहीं है, बल्कि यह भावनाओं, रूठने-मनाने और अनूठी रस्मों का जीवंत उत्सव है। मुख्य मंदिर (श्रीमंदिर) से मौसी और गुंडिचा के घर जाने के बाद, भगवान के लौटने और पुनः मंदिर में प्रवेश करने तक का सफर बेहद दिलचस्प है। 25 जुलाई 2026 को बहुड़ा यात्रा निकलेगी। आइए इसे सिलसिलेवार ढंग से समझते हैं।
1. पड़ाव: आड़प मंडप और चमत्कारी महाप्रसाद
भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपने मुख्य मंदिर से 3 किलोमीटर दूर गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं। इस मंदिर के गर्भगृह को 'आड़प मंडप' कहा जाता है।
10 साल बनाम 1 दिन का पुण्य: इन 9 दिनों के दौरान गुंडिचा मंदिर में मिलने वाले महाप्रसाद को 'आड़प महाप्रसाद' (अबाढ़ा) कहते हैं। पुराणों के अनुसार, मुख्य श्रीमंदिर में 10 वर्षों तक भगवान के दर्शन और महाप्रसाद का जो पुण्य मिलता है, वह आड़प मंडप में केवल एक बार महाप्रसाद ग्रहण करने से मिल जाता है।
2. वापसी: बहुड़ा यात्रा और मौसी मां का 'पोड़ा पीठा'
9 दिन पूरे होने पर आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को भगवान की घर वापसी शुरू होती है, जिसे ओड़िया संस्कृति में 'बहुड़ा यात्रा' कहा जाता है।
स्वाद का सफर: वापसी के दौरान महाप्रभु का रथ थोड़ी देर के लिए 'मौसी मां मंदिर' (अर्धशानी मंदिर) पर रुकता है। यहाँ मौसी अपने भांजे जगन्नाथ को उनका सबसे पसंदीदा व्यंजन 'पोड़ा पीठा' (चावल, नारियल और गुड़ से बना एक विशेष पारंपरिक पैनकेक) भोग लगाती हैं। इस आतिथ्य को स्वीकार कर भगवान आगे बढ़ते हैं।
3. वैभव: सुना बेश (रथों पर सोने का महाश्रृंगार)
बहुड़ा यात्रा के अगले दिन, यानी आषाढ़ शुक्ल एकादशी को तीनों रथ मुख्य मंदिर के सिंहद्वार के सामने आकर रुकते हैं। इस दिन मंदिर के भीतर जाने से पहले भगवान रथों पर ही भक्तों को दर्शन देते हैं।
स्वर्ण आभूषणों का सैलाब: इस दिन महाप्रभु जगन्नाथ, बलभद्र जी और देवी सुभद्रा का विशाल सोने के आभूषणों से श्रृंगार किया जाता है, जिसे 'सुना बेश' या 'राजराजेश्वर बेश' कहते हैं। भगवान को कुंडल, मुकुट, करधनी और सोने के हाथों-पैरों से सजाया जाता है। इस अद्भुत रूप को देखने के लिए लाखों की भीड़ उमड़ती है।
4. तृप्ति: अधर पणा (पवित्र पेय का अर्पण)
सुना बेश के अगले दिन (द्वादशी तिथि को) रथों पर ही एक और विशेष रस्म निभाई जाती है, जिसे 'अधर पणा' कहते हैं।
पार्श्व देवताओं की मुक्ति: इस रस्म में दूध, छेना, चीनी, केला और मसालों से बना एक बेहद स्वादिष्ट और सुगंधित पेय (शर्बत) बड़े-बड़े मिट्टी के घड़ों में भरकर भगवान के अधरों (होठों) तक लाया जाता है। भोग लगाने के बाद इन मिट्टी के घड़ों को जानबूझकर रथों पर ही तोड़ दिया जाता है। माना जाता है कि रथों पर मौजूद अदृश्य आत्माएं, चंडी-चामुंडा और पार्श्व देवी-देवता इस शर्बत को ग्रहण करके मोक्ष पाते हैं।
5. मनुहार: नीलाद्रि बिजे और रसगुल्ले की मिठास
रथयात्रा का सबसे अंतिम और भावुक कर देने वाला पड़ाव त्रयोदशी तिथि को होता है, जिसे 'नीलाद्रि बिजे' यानी भगवान का दोबारा मुख्य मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करना कहा जाता है। यहाँ एक बेहद सुंदर और मानवीय रस्म होती है:
लक्ष्मी जी का गुस्सा: जब भगवान जगन्नाथ 9 दिनों तक अपनी पत्नी माता लक्ष्मी को अकेले छोड़कर भाई-बहन के साथ घूमकर लौटते हैं, तो देवी लक्ष्मी अत्यधिक क्रोधित हो जाती हैं। वे गुस्से में श्रीमंदिर का मुख्य दरवाजा (सिंहद्वार) बंद कर देती हैं और महाप्रभु का रास्ता रोक लेती हैं।
संवाद और मीठी मान-मनुहार: इसके बाद मंदिर के सिंहद्वार पर भगवान जगन्नाथ के सेवकों (दैतापति) और माता लक्ष्मी की दासियों के बीच एक बहुत ही मजेदार और पारंपरिक संवाद होता है, जिसे गीतों के रूप में गाया जाता है।
रसगुल्ले से खुला दरवाजा: अपनी रूठी हुई पत्नी को मनाने के लिए अंत में चतुराई दिखाते हुए भगवान जगन्नाथ माता लक्ष्मी को ओडिशा का प्रसिद्ध 'रसगुल्ला' उपहार में देते हैं। इस मीठी मनुहार के बाद माता लक्ष्मी का गुस्सा शांत होता है, वे हंसकर दरवाजा खोल देती हैं और तब जाकर तीनों भाई-बहन गर्भगृह में अपने रत्न सिंहासन पर दोबारा विराजमान होते हैं।
विशेष बात: नीलाद्रि बिजे के इसी सुंदर प्रसंग के कारण पूरे ओडिशा में इस दिन को 'रसगुल्ला दिवस' (Rasgulla Day) के रूप में भी बेहद उत्साह के साथ मनाया जाता है।

