कब आती है मातृ नवमी? क्यों जरूरी है दिवंगत माताओं का श्राद्ध? जानें सही विधि, नियम और महत्व
Shraddha Paksha 2026: मातृ नवमी पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) के दौरान आने वाली एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण तिथि है। यह वात्सल्य, त्याग और ममता की उस मूरत के प्रति अनन्य कृतज्ञता प्रकट करने का एक पावन दिन है, जिन्होंने अपने स्नेह से हमारे जीवन की नींव रखी। यह तिथि आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की नवमी को आती है। इसे मुख्य रूप से परिवार की दिवंगत माताओं, सास, दादी और महिलाओं के प्रति श्रद्धा और आभार व्यक्त करने के लिए जाना जाता है। इसे नवमी श्राद्ध' या 'सौभाग्यवती श्राद्ध' भी कहा जाता है। इस बार यह तिथि रविवार, 4 अक्टूबर 2026 को आ रही है। आइए जानते हैं मातृ नवमी पर किए जाने वाले श्राद्ध की सही विधि, नियम और महत्व के बारे में विस्तार से....
अनुष्ठान एवं श्राद्ध की विधि-विधान
मातृ नवमी पर श्राद्ध और तर्पण करने की एक निश्चित और सात्विक प्रक्रिया होती है, जिसका पालन भक्तिभाव से किया जाना चाहिए। दिन की शुरुआत स्नान ध्यान के पश्चात् स्वच्छ एवं श्वेत वस्त्र धारण करके करें। मन को शांत और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा भाव से भरें।
तर्पण एवं ध्यान
दोपहर के समय (कुतुप या रोहिणी काल में) दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। हाथ में जलांजलि लेकर तिल, जल और दूध के मिश्रण से दिवंगत माताओं का ध्यान करते हुए तर्पण करें।
पंचबलि का विधान
भोजन तैयार होने पर सबसे पहले उसका कुछ अंश पंचबलि के रूप में निकाला जाता है यानी गाय, कुत्ते, कौए, चींटी और देवताओं के लिए। यह प्रकृति के साथ सामंजस्य और जीवदया का प्रतीक है।
सुहागिन व ब्राह्मण भोजन
इस दिन किसी सुहागिन महिला अथवा योग्य ब्राह्मण को ससम्मान आमंत्रित कर भोजन कराएं। भोजन के उपरांत आमंत्रियों को वस्त्र, कुमकुम, सिंदूर, फल तथा यथाशक्ति दक्षिणा देकर उनका चरण स्पर्श करें और आशीर्वाद लें।
विधि-निषेध और आवश्यक नियम
इस पावन अवसर पर अनुष्ठान की शुद्धता बनाए रखने के लिए कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। श्राद्ध कर्म हमेशा मध्याह्न काल (लगभग 11:30 बजे से 2:30 बजे के बीच) ही संपन्न करें। प्रातःकाल या संध्या काल में श्राद्ध करना वर्जित माना गया है।
भोजन पूर्णतः सात्विक होना चाहिए। इसमें प्याज, लहसन या किसी भी तामसिक सामग्री का उपयोग न करें। परंपरागत रूप से खीर, पूड़ी, कद्दू या आलू की सब्जी और दाल का नैवेद्य उत्तम माना जाता है।
तर्पण और ध्यान के दौरान मुख सदैव दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए, क्योंकि पितृ लोक की दिशा दक्षिण मानी गई है। श्राद्ध के दिन घर में क्लेश, क्रोध या नकारात्मक विचारों से दूर रहें। पूर्ण वातावरण प्रेम और शांति से परिपूर्ण होना चाहिए।
नारी शक्ति का सम्मान
यह पर्व न केवल दिवंगत महिलाओं के प्रति श्रद्धा व्यक्त करता है, बल्कि घर-परिवार में उपस्थित जीवंत नारी शक्ति (सुहागिनों व बेटियों) के प्रति भी आदर और सम्मान का भाव जागृत करता है।
आशीर्वाद का सुरक्षा कवच
सनातन परंपरा में तीन प्रमुख ऋणों का उल्लेख मिलता है, जिनमें 'मातृ-ऋण' सबसे गहरा माना गया है। नवमी तिथि का श्राद्ध इसी ऋण से आंशिक रूप से मुक्त होने और पूर्वजों से आत्मिक जुड़ाव स्थापित करने का माध्यम है। माना जाता है कि इस दिन प्रसन्न मन से किया गया तर्पण और स्मरण परिवार पर आने वाले कष्टों को दूर करता है और आने वाली पीढ़ियों को सुख-समृद्धि का वरदान देता है।
मातृ नवमी श्राद्ध का महत्व
पितृ पक्ष का प्रत्येक दिन पूर्वजों के स्मरण के लिए समर्पित है, लेकिन नवमी तिथि का स्थान सर्वोपरि और अत्यंत भावुक है। यह दिन विशेष रूप से परिवार की उन दिवंगत माताओं, दादियों, सास तथा अन्य सौभाग्यवती स्त्रियों की आत्मा की शांति के लिए आरक्षित है, जिन्होंने परिवार के संवर्धन में अपना जीवन समर्पित कर दिया। यदि किसी कारणवश दिवंगत महिला की मृत्यु की निश्चित तिथि ज्ञात न हो, तो भी इस विशेष तिथि पर उनका श्राद्ध करने से उन्हें तृप्ति और पूर्ण शांति प्राप्त होती है।

