16 shradh paksha 2026: श्राद्ध पक्ष में पंचमी के श्राद्ध का महत्व, जानिए कैसे और किसका करते हैं श्राद्ध
पितृपक्ष में पंचमी तिथि का श्राद्ध उन दिवंगत आत्माओं के लिए अर्पित किया जाता है, जिनका देहावसान किसी भी माह की कृष्ण या शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को हुआ हो। इसके अतिरिक्त, यदि परिवार में किसी सदस्य का निधन विवाह से पूर्व (अविवाहित अवस्था) में हो गया था, तो उनके लिए भी इस दिन श्राद्ध करने का विशेष विधान है। इसी कारण इस तिथि को 'कुंवारा पंचमी' भी कहा जाता है। वर्ष 2026 में पंचमी तिथि का श्राद्ध बुधवार, 30 सितंबर 2026 को रखा जाएगा। चतुर्थी का श्राद्ध भी इसी दिन रखा जाएगा।
पंचांग एवं शुभ मुहूर्त
पंचमी तिथि का प्रारंभ: 30 सितंबर 2026 को दोपहर 02:55 बजे से
पंचमी तिथि का समापन: 01 अक्टूबर 2026 को दोपहर 12:35 बजे तक
श्राद्ध पूजन के मुख्य मुहूर्त (30 सितंबर 2026):
कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:47 बजे से दोपहर 12:35 बजे तक (अवधि: 48 मिनट)
रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:35 बजे से दोपहर 01:22 बजे तक (अवधि: 48 मिनट)
अपराह्न काल: दोपहर 01:22 बजे से अपराह्न 03:45 बजे तक (अवधि: 2 घंटे 23 मिनट)
1. प्रातःकाल की तैयारी: शुद्धि एवं स्थान पवित्रता.
प्रातः शीघ्र उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। श्राद्ध स्थल को गाय के गोबर से लीपकर तथा गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।
2. सात्विक भोजन का निर्माण: खीर अवश्य बनाएं.
गृहलक्ष्मी पूर्ण पवित्रता के साथ पितरों के निमित्त सात्विक भोजन तैयार करें। भोजन में दूध-चावल की खीर का समावेश विशेष रूप से करें।
3. तर्पण एवं पिण्डदान:कुतुप या अपराह्न काल में.
कुतुप या अपराह्न काल में दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों का ध्यान करें। जल में काले तिल, जौ और सफेद पुष्प मिलाकर तर्पण करें। इसके पश्चात पके हुए चावल और जौ के आटे से पिण्ड बनाकर अर्पित करें।
4. पंचबलि (अन्य जीवों को अन्न): पांच अंश निकालना.
ब्राह्मण भोजन से पूर्व भोजन में से गाय, कुत्ते, कौवे, चींटियों और देवों (अतिथि) के लिए पांच अलग-अलग ग्रास अवश्य निकालें।
5. ब्राह्मण भोज एवं दक्षिणा: सम्मानपूर्वक विदाई.
योग्य ब्राह्मण को आदरपूर्वक भोजन कराएं। तत्पश्चात अपनी सामर्थ्य के अनुसार वस्त्र, बर्तन और दक्षिणा देकर उन्हें प्रसन्नचित्त होकर विदा करें।
श्राद्ध कर्म के दौरान ध्यान रखने योग्य सावधानियां
खान-पान की पवित्रता: श्राद्ध पक्ष के दौरान तामसिक भोजन जैसे मांस-मदिरा, लहसुन और प्याज का सेवन पूरी तरह वर्जित रखें।
बर्तनों का चयन: श्राद्ध का भोजन बनाने या परोसने के लिए लोहे के बर्तनों का प्रयोग न करें। इसके स्थान पर चांदी, कांसा, पीतल या दोने-पत्तल का उपयोग करें।
स्थान का नियम: श्राद्ध कर्म सदैव अपनी निजी भूमि, घर या किसी पवित्र तीर्थ स्थल पर ही संपन्न करें।
भोजन की मर्यादा: परोसे गए भोजन की न तो अत्यधिक प्रशंसा करें और न ही कोई कमी निकालें।
आचरण एवं मानसिक स्थिति: श्राद्ध करते समय मन शांत और एकाग्र रखें। क्रोध, कलेश या शोर-शराबे से दूर रहें।
विशेष नोट: यदि परिवार के किसी दिवंगत सदस्य की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, तो उनका श्राद्ध पितृपक्ष के अंतिम दिन यानी 'सर्वपितृ अमावस्या' को किया जा सकता है।

