16 shradh paksha 2026: श्राद्ध पक्ष में एकादशी के श्राद्ध का महत्व, जानिए कैसे और किसका करते हैं श्राद्ध
पितृ पक्ष का पावन समय हमारे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और आदर व्यक्त करने का दिव्य अवसर होता है। इस वर्ष 24 सितंबर से शुरू हुआ पितृ पक्ष 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ संपन्न होगा। इस पूरे पखवाड़े में एकादशी श्राद्ध (ग्यारस श्राद्ध) का अत्यंत विशेष और महिमामयी स्थान है।
यह तिथि उन सभी पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए समर्पित है, जिनका देहावसान किसी भी माह के शुक्ल या कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को हुआ हो। वर्ष 2026 में एकादशी श्राद्ध सोमवार, 06 अक्टूबर को मनाया जाएगा और इसी दिन पावन इंदिरा एकादशी का व्रत भी रखा जाएगा।
शुभ मुहूर्त व समय सीमा (06 अक्टूबर 2026)
एकादशी तिथि प्रारंभ: 06 अक्टूबर 2026 को तड़के 02:07 बजे
एकादशी तिथि समाप्त: 07 अक्टूबर 2026 को तड़के 00:34 बजे
कुतुप मुहूर्त: दोपहर 11:46 से 12:33 बजे तक (अवधि: 47 मिनट)
रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:33 से 01:20 बजे तक (अवधि: 47 मिनट)
अपराह्न काल: दोपहर 01:20 से शाम 03:40 बजे तक
एकादशी श्राद्ध का अलौकिक महत्व
नरक और दंड से मुक्ति: मान्यता है कि यदि कोई पूर्वज अपने अनजाने में हुए पाप कर्मों के कारण यमलोक में कष्ट भोग रहे हों, तो इस दिन विधिपूर्वक व्रत रखकर उसका पुण्य फल पितरों को अर्पित करने से उन्हें यमयातना से तुरंत मुक्ति मिलती है और स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।
संन्यासियों व ऋषियों का आशीर्वाद: एकादशी तिथि संन्यास ग्रहण करने वाले साधुओं-महात्माओं के श्राद्ध के लिए भी सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। इस दिन श्राद्ध कर्म करने से समस्त वेदों के ज्ञान और ऋषियों के आशीर्वाद की प्राप्ति होती है।
अर्यमादेव व श्रीहरि की कृपा: इस दिन व्रत और तर्पण करने से पितृदेव अर्यमा तथा भगवान शालिग्राम (श्री विष्णु) अत्यंत प्रसन्न होते हैं, जिससे जीवन के संपूर्ण पाप नष्ट होते हैं और कर्ज से मुक्ति मिलती है।
अक्षय ऐश्वर्य की प्राप्ति: आश्विन कृष्ण एकादशी पर दान-तर्पण करने वाले साधक के जीवन में निरंतर धन-धान्य, ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है। रुकी हुई सभी योजनाएं पूरी होती हैं।
एकादशी श्राद्ध की संपूर्ण पूजा विधि
शुद्धिकरण व स्नान: साधक को प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करना चाहिए और शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए।
देव व पंचबलि भोग: सबसे पहले देवताओं को अग्निग्रास दें। इसके बाद गाय, कौए, कुत्ते, चींटी और मछली को भोजन कराएं। पीपल के वृक्ष के नीचे भी श्रद्धापूर्वक अन्न व जल रखें।
तर्पण कर्म: दक्षिण दिशा की ओर मुख करके हाथ में जल, कुशा, जौ और काले तिल लेकर पितरों का भक्तिभाव से तर्पण करें।
पिंडदान: जौ, चावल, तिल और आटे से पिंड तैयार कर पितरों की आत्मा की शांति के लिए अर्पित करें।
सात्विक भोजन का निर्माण: बिना प्याज-लहसुन के सात्विक भोजन (जैसे खीर, पूड़ी, सब्जी) तैयार करें।
ब्राह्मण भोज व दान: कुतुप या अपराह्न काल के शुभ मुहूर्त में किसी योग्य ब्राह्मण को घर पर आदरपूर्वक आमंत्रित कर भोजन कराएं। इसके पश्चात उन्हें अपनी सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा, वस्त्र और दान सामग्री देकर आशीर्वाद लें।
ध्यान रखने योग्य आवश्यक सावधानियां
ब्रह्मचर्य का पालन: श्राद्ध कर्म करने वाले व्यक्ति को पूरे दिन मन, वचन और कर्म से ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है।
तामसिक आहार से परहेज: इस पावन दिन मसूर की दाल, लहसुन, प्याज, मूली, बैंगन और किसी भी प्रकार के तामसिक भोजन का सेवन पूरी तरह वर्जित है।
शारीरिक नियम: इस दिन बाल कटवाना, शेविंग (दाढ़ी) बनाना या नाखून काटना सख्त मना होता है।
दान-पुण्य: श्राद्ध की प्रक्रिया पूर्ण होने के पश्चात गरीबों, असहायों और ज़रूरतमंदों को अपनी क्षमता अनुसार भोजन या वस्त्रों का दान अवश्य करें।

