1. धर्म-संसार
  2. व्रत-त्योहार
  3. श्राद्ध पर्व
  4. pitru paksha dashami shradh 2026 date time vidhi

16 shradh paksha 2026: श्राद्ध पक्ष में दशमी के श्राद्ध का महत्व, जानिए कैसे और किसका करते हैं श्राद्ध

dashami shradh 2026
24 सितबंर से 10 अक्टूबर तक पितृपक्ष का महापर्व चल रहा है। 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या रहेगी। पितृ पक्ष में दशमी श्राद्ध का अपना एक विशेष और पावन महत्व है। यह तिथि उन सभी पितरों की आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए समर्पित है, जिनका देहावसान किसी भी माह के कृष्ण या शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को हुआ हो। वर्ष 2026 में दशमी श्राद्ध सोमवार, 05 अक्टूबर को मनाया जाएगा।
 

तिथि और शुभ मुहूर्त (05 अक्टूबर 2026)

दशमी तिथि की शुरुआत: 05 अक्टूबर 2026 को तड़के 03:53 बजे
दशमी तिथि का समापन: 06 अक्टूबर 2026 को तड़के 02:07 बजे
कुतुप मुहूर्त: दोपहर 11:46 से 12:33 बजे तक (अवधि: 47 मिनट)
रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:33 से 01:20 बजे तक (अवधि: 47 मिनट)
अपराह्न काल: दोपहर 01:20 से शाम 03:41 बजे तक

दशमी श्राद्ध का धार्मिक व आध्यात्मिक महत्व

पितरों का आशीर्वाद: पूरे विधि-विधान से किया गया यह श्राद्ध पितरों की आत्मा को तृप्त करता है, जिससे वे प्रसन्न होकर परिवार को सुख, समृद्धि, सफलता और वंश वृद्धि का वरदान देते हैं।
कष्टों से मुक्ति: इस दिन वेदी पर श्रद्धापूर्वक पिंडदान करने से कष्ट भोग रही भटकती आत्माओं को मोक्ष और स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।
अश्वमेध यज्ञ तुल्य फल: मान्यता है कि दशमी के दिन किसी पवित्र कूप (कुएं) के समीप पिंडदान करने से साधक को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है।
 

संपूर्ण पूजन एवं श्राद्ध विधि

शुद्धिकरण एवं तैयारी: प्रातःकाल स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूरे घर की साफ-सफाई कर गंगाजल का छिड़काव करें।
तर्पण कर्म: दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। तांबे के पात्र में जल, थोड़ा सा दूध, जौ, चावल, सफेद फूल और काले तिल मिलाकर पितरों के नाम तर्पण दें।
पिंडदान: पके हुए चावल और आटे से पिंड तैयार कर श्रद्धा से अर्पित करें।
सात्विक भोजन का निर्माण: बिना लहसुन-प्याज़ के पितरों की पसंद का शुद्ध सात्विक भोजन (जैसे खीर, पूरी, सब्जी) तैयार करें।
पंचबलि भोग: तैयार भोजन में से प्रथम भाग निकालकर गाय, कौवे, कुत्ते, चींटी और देव-बलि के लिए अलग रखें।
धूप एवं मंत्र जाप: गुड़ और घी को मिलाकर अग्नि पर सुगंधित धूप दें। जब तक धूप जले, तब तक 'ॐ पितृदेवताभ्यो नमः' मंत्र का निरंतर जप करें और इसी मंत्र से आहुति दें।
ब्राह्मण भोज एवं दान: कुतुप मुहूर्त में 10 (या कम से कम 1) योग्य ब्राह्मण को सादर घर बुलाकर भोजन कराएं तथा यथाशक्ति वस्त्र व दक्षिणा देकर विदा करें। यदि ब्राह्मण भोज संभव न हो, तो जरूरतमंदों को आटा, गुड़, घी, नमक और शक्कर का सीधा दान करें।
सामूहिक दान: परिवार के सभी सदस्यों से बराबर मात्रा में सिक्के एकत्र करके किसी मंदिर में दान करें।
संध्या पूजन एवं दीपदान: शाम के समय दक्षिण दिशा की ओर या घर की बालकनी/गैलरी में पितरों के नाम 2, 5, 11 या 16 दीपक अवश्य प्रज्वलित करें। पीपल के वृक्ष के नीचे भी एक दीपक जलाकर शांति प्रार्थना करें।
गीता पाठ: इस पावन दिन श्रीमद्भगवद्गीता के 10वें अध्याय का पाठ करना अति उत्तम माना जाता है। अंत में परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर प्रसादरूपी भोजन ग्रहण करें।
 

आवश्यक सावधानियां

बर्तनों का चयन: श्राद्ध कर्म में लोहे के बर्तनों का प्रयोग पूरी तरह वर्जित है। इसके स्थान पर सोना, चांदी, तांबा या कांसे के पात्रों का ही उपयोग करें।
आचरण और व्यवहार: घर में शांतिपूर्ण माहौल बनाए रखें। किसी भी प्रकार के वाद-विवाद, क्रोध या क्लेश से बचें।
जीव-दया: किसी भी पशु, पक्षी या असहाय जीव को कष्ट न पहुंचाएं; ऐसा माना जाता है कि पितृदेव किसी भी रूप में आपके द्वार पर आ सकते हैं।
 
अगला लेख
शनि का उत्तर भाद्रपद नक्षत्र में प्रवेश, 9 अक्टूबर से 12 राशियों पर होगा असर, जानें मेष से मीन तक का हाल