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दूसरे देशों में इथेनॉल की वजह से क्यों नहीं होते वाहन खराब?
Ethanol blending vehicle damage: सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है कि दुनिया के तमाम देशों में जहां पेट्रोलियम पदार्थों में इथेनॉल की ब्लेंडिंग की जाती है वहां गाड़ियां खराब क्यों नहीं होती है, जबकि भारत में यह बहुत ज्यादा हो रहा है। इसका उत्तर साफ है कि सरकार ने आधी-अधूरी तैयारियों के साथ इसे पूरी तरह लागू कर दिया। दरअसल जिन देशों में लंबे समय से पेट्रोल में इथेनॉल जैसे E10 या E85 का इस्तेमाल हो रहा है, वहां भी शुरुआत में गाड़ियां खराब होने और इंजन में दिक्कतें आने की शिकायतें आई थीं।
इथेनॉल नमी को सोखता है, जिससे ईंधन टैंक में जंग लगना, रबर के पाइप का गलना और इंजन में रुकावट जैसी समस्याएं होती हैं। विकसित देशों जैसे अमेरिका और ब्राजील ने इन समस्याओं से निपटने के लिए बड़े कदम उठाए। वहां की ऑटोमोबाइल कंपनियों ने बहुत पहले ही इंजनों में जंग-रोधी धातुओं जैसे स्टेनलेस स्टील और खास तरह के रबर व प्लास्टिक पाइपों का उपयोग शुरू कर दिया था। ALSO READ: 22% से 30% इथेनॉल वाले पेट्रोल पर टैक्स हुआ ज़ीरो, जानें आपकी गाड़ी के इंजन पर क्या होगा असर?
रिफाइनरी से लेकर पेट्रोल पंप तक ईंधन में नमी को रोकने के लिए वाटर-सेपरेटर फिल्टर और उन्नत स्टोरेज टैंक का उपयोग किया जाने लगा और ईंधन की स्थिरता बनाए रखने के लिए विशेष केमिकल मिलाए जा रहे हैं जो इंजन को नुकसान से बचाते हैं जो भारत में नहीं हुआ।
भारत में E20 से वाहनों को क्या नुकसान?
भारत में 2023 से पहले निर्मित अधिकांश पुराने वाहन E20 और E85 ईंधन के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं हैं। अप्रैल 2023 में BS6 Phase 2 लागू होने से पहले की गाड़ियां आमतौर पर केवल E5 या E10 के लिए डिज़ाइन की गई थीं। हालांकि, होंडा जैसी कुछ कंपनियों ने 2009 के बाद से ही अपने वाहनों को E20 मैटेरियल कंपैटिबल बनाना शुरू कर दिया था, लेकिन यह सभी ब्रांड्स पर लागू नहीं होता।यदि आप 2023 से पहले के पुराने वाहनों में उच्च इथेनॉल वाले इन ईंधनों का उपयोग करते हैं, तो इस तरह के प्रभाव पड़ सकते हैं:
- इंजन और फ्यूल सिस्टम को नुकसान : इथेनॉल नमी पानी को सोखता है और स्वभाव से संक्षारक जंग लगाने वाला होता है। पुराने वाहनों के रबर पाइप, सील, गैस्केट और फ्यूल इंजेक्टर्स इसके संपर्क में आकर जल्दी खराब या लीक हो सकते हैं।
- माइलेज में कमी : इथेनॉल की ऊर्जा सघनता शुद्ध पेट्रोल से कम होती है, जिससे पुराने वाहनों के माइलेज में गिरावट आ सकती है। स्वयं पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने इस बात को स्वीकार किया है।
सरकार के दावों में कितना दम
सरकार के अनुसार E20 ईंधन से वाहनों को कोई गंभीर मैकेनिकल नुकसान पहुंचने के ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिले हैं, फिर भी इसके व्यावहारिक प्रभावों की समीक्षा की जा रही है। नीति आयोग और मंत्रालय के प्रारंभिक अध्ययनों के अनुसार, E10 की तुलना में E20 ईंधन से वाहनों का एक्सेलरेशन बेहतर होता है और कार्बन उत्सर्जन में लगभग 30 फीसदी तक की कमी आती है। ALSO READ: भारत की पहली Flex Fuel कार लॉन्च! Maruti Suzuki WagonR अब चलेगी E85 इथेनॉल पर
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी कहते हैं कि हमने इस्तेमाल करने से पहले प्रयोग किए हैं लेकिन इसका विवरण अनुपलब्ध है। एक दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जब तक इथेनॉल बनाने के लिए गन्ने का इस्तेमाल किया जाता था तब तक सब ठीक था लेकिन जबसे चावल का इस्तेमाल किया जाने लगा तबसे समस्या गहरा गई।
भारत में पेट्रोल में मिलाने और टूटे हुए चावल से एथेनॉल बनाने की आधिकारिक शुरुआत वर्ष 2020 में हुई। राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति-2018 के तहत राष्ट्रीय जैव ईंधन समन्वय समिति (NBCC) ने 20 अप्रैल 2020 को हुई अपनी बैठक में सरप्लस चावल को एथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल करने की मंजूरी दी थी। इसके अलावा, अगस्त 2022 में देश में पराली से एथेनॉल बनाने के पहले कमर्शियल प्लांट की शुरुआत पानीपत में की गई। ALSO READ: इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल: फायदे ज्यादा या नुकसान? वाहन मालिकों के लिए जरूरी जानकारी
पहाड़ जैसी पर्यावरणीय चुनौतियां
एक बड़ा सवाल पर्यावरण का है। द लेंस ने अपनी रिसर्च में पाया कि देश में इस समय पेट्रोल में मिलाने (ब्लेंडिंग) के लिए औसतन 75 से 90 करोड़ लीटर प्रति माह इथेनॉल का उत्पादन और आपूर्ति हो रही है। अगर हम देश में हर साल लगभग 1,000 करोड़ लीटर इथेनॉल उत्पादन का औसत मानकर चलें, तो पानी की खपत का अनुमान आपकी रूह कंपा देगा।
डिस्टिलरी में 1 लीटर इथेनॉल बनाने में लगभग 4 से 5 लीटर पानी खर्च होता है। एक हजार करोड़ लीटर के लिए फैक्ट्री में 5 हजार करोड़ लीटर पानी खर्च होगा। यह मात्रा बहुत बड़ी नहीं है। लेकिन ठहरिए असली पानी खेती में लगता है। 1 लीटर इथेनॉल के लिए आवश्यक गन्ने को उगाने में लगभग 2000 से 2500 लीटर पानी की जरूरत होती है। यानी एक हजार करोड़ लीटर इथेनॉल बनाने में कुल 25,000,000 करोड़ लीटर पानी लगेगा जो कावेरी और ताप्ती नदियों के वार्षिक बहाव दर के बराबर है। आप अंदाजा लगाएं इससे पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
निजी कंपनियां बाहर भेज रही शुद्ध ईंधन
निजी कंपनियां रिलायंस और नायरा आदि नीदरलैंड, चाड, फ्रांस और अन्य यूरोपीय संघ के देशों के साथ साथ सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, बांग्लादेश और श्रीलंकाई बाजार के पेट्रोलियम पदार्थ बेचती है। वाणिज्यिक आंकड़ों के अनुसार, भारत का कुल पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात लगातार मजबूत बना हुआ है। पिछले डेढ़ महीने के दौरान रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी और नायरा एनर्जी की वाडीनार रिफाइनरी ने मिलकर वैश्विक बाजारों में लाखों टन ईंधन की आपूर्ति की है। अकेले नायरा एनर्जी ने हाल ही में रूस को ही करीब 60 हजार मीट्रिक टन से अधिक पेट्रोल का निर्यात ट्रेडर्स के जरिए किया है।
इसके अलावा, दोनों कंपनियों का कुल मासिक पेट्रोलियम निर्यात औसतन 7 से 9 अरब डॉलर के बीच बना हुआ है। लेकिन यह तेल इथेनॉल मिश्रित नहीं था। यह दीगर है कि वो भारत में खुद अपनी टंकियों लड़ ब्लेंडेड ईंधन बेच रहे हैं। विदेशों में ब्लेंडिंग का काम खुद ही किया जा रहा हैं।
आईआईटियन और केमिनल इंजीनियर राघव अवस्थी कहते हैं कि इथेनॉल की एक रासायनिक विशेषता है कि यह पानी को बहुत तेजी से सोखता है। यदि इसे समुद्री जहाजों के जरिए लंबी दूरी तक भेजा जाए, तो नमी के कारण पेट्रोल और इथेनॉल अलग हो सकते हैं, जिससे ईंधन खराब होने का खतरा रहता है।
