सम्बंधित जानकारी
- पंकज त्रिपाठी के बड़े भाई पर पैतृक गांव में जानलेवा हमला, हालत नाजुक
- जेब्रा प्रिंट आउटफिट में दिशा पाटनी ने ढाया कहर, सिजलिंग पोज देख फैंस हुए क्रेजी
- थिएटर्स में देखने मिलेगा जबरदस्त क्रेज, 10 दिनों के भीतर रिलीज होंगी साल की दो बड़ी फिल्में 'टॉक्सिक' और 'मिर्जापुर: द मूवी'
- 'बंटवारा 1947' की रिलीज से पहले करण देओल ने पापा सनी देओल पर लुटाया प्यार, फादर्स डे पर लिखा दिल छू लेने वाला नोट
- प्रभास की छोटी सी झलक ने 'कल्कि 2' और 'स्पिरिट' को लेकर फैंस के बीच छेड़ी चर्चा!
अमरीश पुरी: बॉलीवुड का वो महानायक जिसने अपने स्वाभिमान के लिए ठुकरा दिया हॉलीवुड
भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी एक दमदार, रौबदार और खौफनाक खलनायक का जिक्र होगा, तो सबसे पहला नाम अमरीश पुरी का ही जेहन में आएगा। अपनी कड़क और बुलंद आवाज, बड़ी-बड़ी आंखों के अनोखे भाव-भंगिमाओं और स्क्रीन पर अपनी चुंबकीय उपस्थिति से उन्होंने 'विलेन' शब्द को एक नया और सम्मानित मुकाम दिया।
अमरीश पुरी ने यह साबित किया कि एक खलनायक भी अपनी अदाकारी के दम पर पूरी फिल्म को अपने कंधों पर खींच सकता है। पंजाब के नौशेरां गांव में 22 जून 1932 को जन्मे अमरीश पुरी का सिनेमाई सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। हिमाचल प्रदेश के खूबसूरत शहर शिमला से अपनी बीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने सपनों की नगरी मुंबई का रुख किया।
उस दौर में उनके बड़े भाई मदन पुरी पहले से ही हिंदी फिल्मों में बतौर खलनायक अपनी मजबूत पहचान बना चुके थे। हालांकि उनकी शुरुआती राह आसान नहीं थी। साल 1954 में अपने पहले स्क्रीन टेस्ट में अमरीश पुरी को असफलता का सामना करना पड़ा था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अपनी जीविका चलाने के लिए उन्होंने श्रम मंत्रालय में नौकरी की और साथ ही रंगमंच के जादूगर सत्यदेव दुबे के नाटकों में अभिनय की बारीकियां सीखते रहे।
बाद में, पृथ्वीराज कपूर के ऐतिहासिक 'पृथ्वी थियेटर' में अमरीश पुरी खुद को एक परिपक्व कलाकार के रूप में स्थापित करने में सफल रहे। आखिरकार, अपने जीवन के 40वें बसंत में यानी साल 1971 में फिल्म 'रेशमा और शेरा' से उन्होंने बड़े पर्दे पर कदम रखा।
अमरीश पुरी ने पर्दे पर जितने क्रूर किरदार निभाए, असल जिंदगी में वे उतने ही ऊंचे सिद्धांतों वाले इंसान थे। शुरुआती दौर में बॉम्बे टॉकीज जैसे प्रतिष्ठित बैनर से जुड़ने के बाद अमरीश पुरी को बड़ी फिल्में मिलनी शुरू हुईं। उन्होंने 'निशांत', 'मंथन', 'भूमिका', 'कलयुग' और 'मंडी' जैसी कलात्मक और सुपरहिट फिल्मों में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया। साल 1983 में गोविंद निहलानी की फिल्म 'अर्द्धसत्य' में ओम पुरी के सामने उनका निभाया किरदार आज भी मील का पत्थर माना जाता है।
इसके बाद, 1986 में आई फिल्म 'नगीना' में एक संपेरे के रूप में श्रीदेवी के साथ उनका टकराव दर्शकों को रोमांचित कर गया। लेकिन साल 1987 उनके करियर का स्वर्ण काल साबित हुआ। निर्देशक शेखर कपूर एक ऐसी फिल्म बना रहे थे जो 'इनविजिबल मैन' की अवधारणा पर आधारित थी और बच्चों को केंद्रित थी—'मिस्टर इंडिया'। फिल्म में अनिल कपूर मुख्य भूमिका में थे, लेकिन कहानी की असली मांग थी एक ऐसा विलेन, जो स्क्रीन पर आते ही खौफ पैदा कर दे।
अमरीश पुरी ने इस फिल्म में 'मोगैंबो' का कालजयी किरदार निभाया। उनका संवाद "मोगैंबो खुश हुआ" आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास का सबसे लोकप्रिय डायलॉग है। अमरीश पुरी की प्रतिभा केवल भारत तक सीमित नहीं रही। जब भारतीय मूल के कलाकारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलना बेहद मुश्किल था, तब हॉलीवुड के दिग्गज निर्देशक स्टीफन स्पीलबर्ग ने अपनी कल्ट क्लासिक फिल्म 'इंडीआना जोंस एंड द टेंपल ऑफ डूम' में उन्हें मुख्य खलनायक—'मोला राम' का किरदार दिया। इस फिल्म से उन्हें वैश्विक स्तर पर जबरदस्त ख्याति मिली।
इस बड़ी सफलता के बाद हॉलीवुड के कई बड़े निर्देशकों और प्रोडक्शन हाउस ने अमरीश पुरी को मुख्य भूमिकाओं के ऑफर दिए। लेकिन अमरीश पुरी ने उन सभी आकर्षक प्रस्तावों को सिरे से ठुकरा दिया। इसके पीछे की मुख्य वजह उनका गहरा आत्मसम्मान और भारतीय कलाकारों के प्रति उनका नजरिया था। अमरीश पुरी का स्पष्ट मानना था कि पश्चिमी सिनेमा (हॉलीवुड) में एशियाई और विशेषकर भारतीय मूल के कलाकारों को रूढ़िवादी भूमिकाएं दी जाती हैं और उन्हें कमतर या नीचा दिखाया जाता है। वे केवल पैसों या वैश्विक प्रसिद्धि के लिए अपने देश और अपनी कला की गरिमा से समझौता नहीं करना चाहते थे।
लगभग चार दशकों तक भारतीय और अंतरराष्ट्रीय सिनेमा पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले इस महानायक ने 12 जनवरी 2005 को दुनिया को अलविदा कह दिया। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन सिनेमा की दुनिया में उनके द्वारा स्थापित किए गए प्रतिमान और उनका स्वाभिमान आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा एक प्रेरणास्रोत रहेगा।
