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मिर्जापुर की बीना त्रिपाठी: रसिका दुग्गल ने बदल दी गैंगस्टर ड्रामा की पूरी कहानी, अब हो रही स्पिन ऑफ फिल्म की मांग

बोल्ड सीन से आगे की कहानी है रसिका दुग्गल का अभिनय
बोल्ड सीन से आगे की कहानी है रसिका दुग्गल का अभिनय
मिर्जापुर की दुनिया में बंदूकें हैं, बारूद है, बदला है, सत्ता की भूख है और ऐसे पुरुष किरदार हैं जो अपनी एक नजर से सामने वाले को खामोश कर देते हैं। कालीन भैया से लेकर गुड्डू पंडित तक, इस कहानी की पहचान लंबे समय तक पुरुषों के वर्चस्व से बनी रही। लेकिन इसी हिंसक दुनिया के बीच एक महिला किरदार ऐसा भी है, जो न तो हाथ में बंदूक लेकर घूमती है और न ही हर वक्त ऊंची आवाज में अपनी ताकत का ऐलान करती है। फिर भी वह कहानी के सबसे असरदार किरदारों में शामिल हो जाती है। यह किरदार है बीना त्रिपाठी और इसे पर्दे पर जीवंत किया है रसिका दुग्गल ने।
 
मिर्जापुर द मूवी में रसिका दुग्गल को भले ही उतना स्क्रीन टाइम नहीं मिला, जितना उनके प्रशंसक शायद चाहते थे, लेकिन बीना जब भी पर्दे पर आती हैं, कहानी का तापमान बदलता हुआ महसूस होता है। उनके चेहरे के भाव, संवादों के बीच का ठहराव और किरदार की भीतर चल रही उथल-पुथल दर्शकों को बांधे रखती है। यही किसी कलाकार की असली ताकत होती है। स्क्रीन पर कितनी देर दिखाई दिए, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि जाने के बाद भी किरदार कितनी देर तक दर्शकों के दिमाग में मौजूद रहता है। और बीना त्रिपाठी इस कसौटी पर बेहद मजबूत किरदार साबित होती हैं।
 

मिर्जापुर में पुरुषों का दबदबा, लेकिन कहानी की एक अलग धुरी बीना

मिर्जापुर को अगर पहली नजर में देखें तो यह पुरुषों की दुनिया दिखाई देती है। सत्ता पुरुषों के हाथ में है, बंदूकें पुरुषों के हाथ में हैं और फैसले भी अक्सर पुरुष लेते हैं। लेकिन इस व्यवस्था के बीच बीना धीरे-धीरे अपनी जगह बनाती हैं।
 
शुरुआत में वह त्रिपाठी परिवार की बहू हैं। एक ऐसे परिवार की बहू, जहां सत्ता और हिंसा घर की चारदीवारी के भीतर भी सांस लेती है। उनके सामने कालीन भैया जैसा प्रभावशाली पति है और ऐसा परिवार है जहां रिश्ते भी ताकत के समीकरण से अलग नहीं हैं। लेकिन बीना को सिर्फ 'गैंगस्टर की पत्नी' के तौर पर देखना उनके किरदार के साथ नाइंसाफी होगी।
 
वह परिस्थितियों को पढ़ती हैं। लोगों को समझती हैं। अपनी कमजोरियों को पहचानती हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात, वह यह जानती हैं कि कब चुप रहना है और कब अपनी बात मनवानी है। यही वह बारीकी है जिसने बीना को मिर्जापुर के दूसरे किरदारों से अलग बनाया।
 

बीना की ताकत बंदूक में नहीं, दिमाग में है

बीना त्रिपाठी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि वह मिर्जापुर की हिंसक दुनिया में उसी भाषा में जवाब नहीं देतीं, जिसमें बाकी किरदार बात करते हैं। उनकी ताकत उनका दिमाग है।
 
वह जानती हैं कि सामने वाले की कमजोरी क्या है। उन्हें पता है कि किस रिश्ते का इस्तेमाल कब किया जा सकता है। वह अपने आसपास की सत्ता को समझती हैं और धीरे-धीरे उस सत्ता के भीतर अपने लिए जगह बनाती हैं।
 
इसीलिए कालीन भैया जैसे ताकतवर किरदार के सामने भी बीना का आत्मविश्वास दर्शकों का ध्यान खींचता है। उनके रिश्ते में सिर्फ पति-पत्नी का समीकरण नहीं है। वहां डर, दूरी, महत्वाकांक्षा, असहमति और सत्ता, सब एक साथ मौजूद हैं। यही जटिलता बीना को दिलचस्प बनाती है।
 

रसिका दुग्गल ने बीना को निभाया नहीं, उसमें जान डाल दी

बीना त्रिपाठी की सफलता सिर्फ लेखन की सफलता नहीं है। इसके पीछे रसिका दुग्गल का अभिनय भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अगर कोई दूसरा कलाकार इस भूमिका में होता तो संभव है कि बीना सिर्फ एक ग्लैमरस गैंगस्टर पत्नी बनकर रह जातीं। लेकिन रसिका ने किरदार की परतों को समझा। उनकी आंखें कई बार वह कह देती हैं, जो उनके संवाद नहीं कहते।
 
उनकी चुप्पी में भी एक अर्थ दिखाई देता है। कई दृश्यों में वह सिर्फ सामने वाले को देखती हैं और दर्शक समझ जाता है कि बीना के दिमाग में कुछ चल रहा है। अभिनय की यही बारीकी किसी किरदार को यादगार बनाती है।
 
रसिका की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने बीना को एक आयामी किरदार नहीं बनने दिया। वह एक साथ मजबूत भी हैं, असुरक्षित भी; महत्वाकांक्षी भी हैं और भावनात्मक भी। वह परिस्थितियों की शिकार भी रही हैं और कई मौकों पर परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने वाली महिला भी बनी हैं।

Rasika Duggal in Mirzapur the Movie

बोल्ड सीन की चर्चा खूब हुई, अभिनय की बात कम हुई

रसिका दुग्गल के बारे में बात करते समय एक दुर्भाग्यपूर्ण पैटर्न अक्सर दिखाई देता है। उनके बोल्ड सीन चर्चा में आ जाते हैं, लेकिन उन दृश्यों के पीछे मौजूद अभिनय की चर्चा कहीं पीछे छूट जाती है। बीना त्रिपाठी का किरदार सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि उसमें बोल्डनेस है। उसकी असली ताकत उसकी मनोवैज्ञानिक जटिलता में है।
 
एक अभिनेत्री के लिए किसी किरदार की शारीरिक अभिव्यक्ति निभाना एक हिस्सा हो सकता है, लेकिन उसके भीतर चल रहे डर, असुरक्षा, गुस्से और महत्वाकांक्षा को चेहरे और व्यवहार में उतारना कहीं ज्यादा मुश्किल काम है। रसिका ने बीना के साथ यही किया है।
 
उन्होंने दर्शकों को सिर्फ बीना का बाहरी रूप नहीं दिखाया, बल्कि उस महिला को समझने का मौका दिया जो एक ऐसे परिवार में रह रही है जहां ताकत का मतलब अक्सर हिंसा होता है। इसलिए बीना के बोल्ड दृश्यों को उनके पूरे अभिनय का पैमाना बना देना उनके काम को छोटा करके देखना होगा।
 

'मिर्जापुर द मूवी' में कम स्क्रीन टाइम, फिर भी बड़ा असर

मिर्जापुर द मूवी में रसिका दुग्गल के प्रशंसकों के लिए शायद सबसे बड़ी शिकायत यही हो सकती है कि बीना को उतना समय नहीं मिला, जितना इस किरदार की लोकप्रियता को देखते हुए उम्मीद की जा सकती थी। लेकिन यहां एक दिलचस्प बात सामने आती है।
 
कई कलाकार लंबे समय तक पर्दे पर रहने के बावजूद दर्शकों के जेहन में जगह नहीं बना पाते। दूसरी तरफ रसिका सीमित दृश्यों में भी बीना की मौजूदगी दर्ज करा देती हैं। यही कारण है कि फिल्म देखने के बाद चर्चा सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं रहती कि बीना कितनी देर दिखाई दीं। सवाल यह उठता है कि इस किरदार की कहानी को आगे क्यों नहीं बढ़ाया गया? और यहीं से स्पिन ऑफ की मांग पैदा होती है।
 

क्या बीना त्रिपाठी पर बन सकती है अलग फिल्म?

बीना की कहानी में एक पूरी फिल्म या वेब सीरीज की संभावनाएं दिखाई देती हैं। मिर्जापुर की मुख्य कहानी से अलग अगर बीना के नजरिए से इस दुनिया को देखा जाए तो दर्शकों को वही अपराध की दुनिया एक बिल्कुल अलग कोण से दिखाई दे सकती है।
 
एक महिला जो सत्ता के केंद्र में है, लेकिन सत्ता की मालिक नहीं। एक पत्नी जो अपने पति की दुनिया को समझती है, लेकिन हर बात से सहमत नहीं। एक बहू जो परिवार के भीतर रहते हुए परिवार की राजनीति को पढ़ती है। और एक ऐसी महिला जो जानती है कि इस दुनिया में भावनाएं कमजोरी भी बन सकती हैं और हथियार भी। बीना की यह यात्रा अपने आप में एक मजबूत महिला-केंद्रित क्राइम ड्रामा का आधार बन सकती है।
 
यही वजह है कि दर्शकों के बीच बीना पर स्पिन ऑफ की मांग को सिर्फ सोशल मीडिया की हल्की-फुल्की प्रतिक्रिया मानकर खारिज करना आसान नहीं है। किरदार में इतना मटीरियल जरूर है कि उसकी अलग कहानी दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रख सकती है।
 

लेकिन रसिका की कहानी बीना से बहुत पहले शुरू हो चुकी थी

रसिका दुग्गल को सिर्फ बीना त्रिपाठी के नाम से याद करना उनके करीब दो दशक लंबे अभिनय सफर को सीमित कर देना होगा। 17 जनवरी 1985 को जमशेदपुर में जन्मी रसिका ने दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज फॉर वुमेन से गणित में स्नातक की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने सोशल कम्युनिकेशन मीडिया में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया और फिर फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से अभिनय की ट्रेनिंग ली।
 
यानी जिस अभिनेत्री को आज दर्शक मिर्जापुर की बीना के रूप में जानते हैं, उसके पीछे अभिनय को लेकर एक लंबी और गंभीर तैयारी रही है।
 
2007 में 'अनवर' से फिल्मों में छोटी भूमिका के साथ शुरुआत करने वाली रसिका ने शुरुआती वर्षों में कई फिल्मों और टेलीविजन प्रोजेक्ट्स में काम किया। 'नो स्मोकिंग', 'हाइजैक', 'तहान', 'अज्ञात', 'क्षय' और 'औरंगजेब' जैसी फिल्मों में उनके हिस्से छोटी भूमिकाएं आईं। लेकिन रसिका उन कलाकारों में नहीं रहीं जो छोटी भूमिका को छोटा अभिनय मानते हैं। उन्होंने हर भूमिका को अपना बनाने की कोशिश की।
 

'किस्सा' से 'हामिद' तक बदली पहचान

2015 की फिल्म 'किस्सा' ने रसिका के अभिनय की क्षमता को ज्यादा व्यापक दर्शकों और आलोचकों के सामने रखा। इसके बाद 'कम्मट्टी पाडम' और 'तू है मेरा संडे' जैसी फिल्मों में भी उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार निभाए।
 
फिर आया 2018। इस साल रसिका ने 'मंटो' में सफिया का किरदार निभाया। सआदत हसन मंटो की पत्नी के रूप में उन्होंने ऐसा अभिनय किया जिसमें शोर नहीं था, लेकिन भावनाओं की गहराई थी।
 
मंटो की दुनिया में सफिया का अपना संघर्ष था और रसिका ने उस संघर्ष को बहुत सहजता से पर्दे पर उतारा। इस भूमिका के लिए उन्हें स्क्रीन अवॉर्ड्स में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के लिए नामांकन भी मिला।
 
इसी दौर में 'हामिद' ने उनके अभिनय को और मजबूत पहचान दी। फिल्म की कहानी और संवेदनशील विषय के बीच रसिका ने अपने किरदार को जिस तरह निभाया, उसकी काफी सराहना हुई।
 
यह वही दौर था जब यह साफ होने लगा था कि रसिका दुग्गल सिर्फ मुख्यधारा की अभिनेत्री बनने की कोशिश नहीं कर रहीं, बल्कि वह ऐसे किरदार चुन रही हैं जिनमें अभिनय की गुंजाइश हो।
 

ओटीटी ने दिया वह मंच, जिसकी रसिका को जरूरत थी

रसिका के करियर में ओटीटी का दौर एक महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आया। 'मिर्जापुर' ने उन्हें लोकप्रियता दी तो 'दिल्ली क्राइम' जैसी सीरीज ने उनकी अभिनय क्षमता का दूसरा पहलू दिखाया। 'दिल्ली क्राइम' में उन्होंने आईपीएस अधिकारी नीति सिंह का किरदार निभाया। इसके अलावा 'मेड इन हेवन', 'आउट ऑफ लव', 'ए सूटेबल बॉय' और 'ओके कंप्यूटर' जैसी सीरीज में भी उन्होंने अलग-अलग तरह की भूमिकाएं कीं।
 
यानी एक तरफ बीना त्रिपाठी जैसी महत्वाकांक्षी और जटिल महिला, दूसरी तरफ 'दिल्ली क्राइम' की पुलिस अधिकारी और फिर 'आउट ऑफ लव' की डॉ. मीरा कपूर। रसिका ने लगातार यह साबित किया कि उन्हें किसी एक तरह के किरदार में बांधना आसान नहीं है।
 

टीवी, फिल्म और वेब: हर माध्यम में अपनी जगह

रसिका का सफर सिर्फ फिल्मों और ओटीटी तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने 'पाउडर', 'रिश्ता डॉट कॉम', 'किस्मत', 'उपनिषद गंगा' और 'पी.ओ.डब्ल्यू.- बंदी युद्ध के' जैसे टेलीविजन प्रोजेक्ट्स में भी काम किया।
 
उन्होंने कॉमेडी और हल्के-फुल्के डिजिटल कंटेंट में भी हाथ आजमाया। 'परमानेंट रूममेट्स', 'ह्यूमरसली योर्स' और 'टीवीएफ कपल्स' जैसे प्रोजेक्ट्स ने उनके अभिनय के दूसरे रंग दिखाए। यही विविधता रसिका के करियर को दिलचस्प बनाती है।
 
वह सिर्फ गंभीर भूमिकाएं करने वाली अभिनेत्री नहीं हैं और न ही उन्हें केवल ग्लैमरस किरदारों तक सीमित किया जा सकता है।
 

गणित पढ़ने वाली लड़की से मिर्जापुर की बीना तक

रसिका दुग्गल की कहानी में शायद सबसे दिलचस्प बात यही है कि उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि और अभिनय की दुनिया पहली नजर में बिल्कुल अलग दिखाई देती है।
 
गणित की पढ़ाई से लेकर अभिनय की ट्रेनिंग और फिर छोटे किरदारों से होते हुए एक लोकप्रिय वेब सीरीज की सबसे चर्चित महिला पात्रों में जगह बनाना आसान सफर नहीं रहा।
 
2010 में उन्होंने अभिनेता मुकुल चड्ढा से शादी की। दोनों ने साथ मिलकर 'बनाना ब्रेड' नाम की शॉर्ट फिल्म भी लिखी। अभिनय के अलावा रसिका की रुचि उर्दू कविता पढ़ने, संगीत सीखने और पॉडकास्ट सुनने में भी रही है। यह सब उनके उस व्यक्तित्व की ओर इशारा करता है जो सिर्फ कैमरे के सामने खड़े होने तक सीमित नहीं है।
 

बीना त्रिपाठी की सबसे बड़ी जीत क्या है?

शायद यह कि दर्शक उससे सहमत हों या असहमत, लेकिन उसे नजरअंदाज नहीं कर सकते। बीना हमेशा सही नहीं हैं। वह पारंपरिक अर्थों में आदर्श महिला भी नहीं हैं। लेकिन वह बेहद मानवीय हैं। उनके फैसलों के पीछे परिस्थितियां हैं, इच्छाएं हैं, डर हैं और अपने अस्तित्व को बचाए रखने की जद्दोजहद है। यही वजह है कि दर्शक उनके साथ भावनात्मक रूप से जुड़ते हैं।
 
मिर्जापुर जैसी कहानी में जहां कई किरदार ताकत दिखाने के लिए चिल्लाते हैं, बीना कई बार सिर्फ देखकर अपनी बात कह देती हैं। और शायद यही रसिका दुग्गल के अभिनय की सबसे बड़ी खूबी है।
 

अब सवाल यह नहीं कि बीना को कितना स्क्रीन टाइम मिला, सवाल यह है कि आगे क्या?

मिर्जापुर द मूवी में बीना का स्क्रीन टाइम भले ही सीमित रहा हो, लेकिन इस किरदार की लोकप्रियता ने एक सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या बीना त्रिपाठी की अपनी कहानी को अलग से बताया जा सकता है?
 
अगर कभी ऐसा स्पिन ऑफ बनता है तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती भी यही होगी कि बीना की जटिलता बरकरार रहे। उसे सिर्फ एक और गैंगस्टर कहानी की महिला किरदार बना देना इस चरित्र के साथ न्याय नहीं होगा।
 
बीना की कहानी को उसकी नजर से बताना होगा। उस महिला की नजर से, जिसने पुरुषों की सत्ता वाली दुनिया में रहते हुए अपने लिए एक अलग जगह बनाई।
 
और अगर ऐसा होता है तो उस कहानी की सबसे बड़ी ताकत फिर वही अभिनेत्री होंगी, जिन्होंने बीना को सिर्फ निभाया नहीं, उसे दर्शकों की याद में दर्ज कर दिया। रसिका दुग्गल की असली उपलब्धि यही है।
 
मिर्जापुर ने उन्हें लोकप्रिय बनाया, लेकिन बीना त्रिपाठी ने यह साबित कर दिया कि रसिका सिर्फ लोकप्रियता की अभिनेत्री नहीं हैं। वह उन कलाकारों में हैं जो किरदार को अपने हिसाब से नहीं ढालते, बल्कि खुद को किरदार के हिसाब से बदल लेते हैं।
 
और शायद इसलिए, मिर्जापुर की इस हिंसक दुनिया में जहां हर कोई सत्ता के लिए लड़ रहा है, बीना त्रिपाठी की कहानी आज भी सबसे ज्यादा दिलचस्प लगती है।
 
क्योंकि उसके हाथ में बंदूक भले न हो, लेकिन खेल को समझने की उसकी क्षमता उसे बाकी किरदारों के बराबर खड़ा कर देती है।
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