हिंदी फिल्म संगीत का एक ऐसा अध्याय अब इतिहास का हिस्सा बन गया है, जिसकी चर्चा अक्सर फुसफुसाहटों में होती थी, लेकिन जिसका महत्व किसी भी तरह कम नहीं था। पार्श्व गायिका सुमन कल्याणपुर का निधन केवल एक कलाकार का जाना नहीं है, बल्कि उस दौर की एक ऐसी मधुर ध्वनि का मौन हो जाना है, जिसने लाखों दिलों को छुआ, लेकिन अपने हिस्से की रोशनी कभी पूरी तरह हासिल नहीं कर सकी।
सुमन कल्याणपुर का नाम लेते ही सबसे पहले एक सवाल सामने आता है—क्या उनकी सबसे बड़ी ताकत ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई थी? संगीत जगत के जानकारों का मानना है कि उनकी आवाज़ इतनी हद तक लता मंगेशकर से मिलती थी कि श्रोता अक्सर दोनों में फर्क नहीं कर पाते थे। यही समानता उनके करियर पर दोधारी तलवार की तरह असर डालती रही।
जब अपनी पहचान बनाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया
फिल्म इंडस्ट्री में सुमन कल्याणपुर का आगमन उस समय हुआ था, जब लता मंगेशकर का नाम सफलता की गारंटी माना जाता था। निर्माता और संगीतकार किसी भी बड़े गीत के लिए सबसे पहले लता की ओर देखते थे। ऐसे माहौल में एक नई गायिका, जिसकी आवाज़ लता से मिलती-जुलती हो, उसके लिए अपनी अलग पहचान बनाना बेहद कठिन था।
विडंबना यह रही कि जिस आवाज़ को लोग सुनकर मुग्ध हो जाते थे, उसी आवाज़ ने उन्हें "लता का विकल्प" या "लता का क्लोन" जैसी पहचान दे दी। परिणाम यह हुआ कि उन्हें प्रतिभा के अनुरूप अवसर नहीं मिले। वे फिल्म संगीत की दुनिया में हमेशा मौजूद रहीं, लेकिन अक्सर दूसरी कतार में खड़ी दिखाई दीं।
एचएमवी के कैसेट और उपेक्षा का दर्द
एक समय एचएमवी ने 50 लोकप्रिय प्रेम गीतों का विशेष संग्रह जारी किया था। चार कैसेट्स के उस संकलन में सबसे अधिक सात गीत सुमन कल्याणपुर के थे। यह अपने आप में उनकी लोकप्रियता और गायकी की गुणवत्ता का प्रमाण था।
लेकिन आश्चर्य की बात यह रही कि कैसेट कवर पर मोहम्मद रफी, किशोर कुमार, तलत महमूद, मन्ना डे, गीता दत्त और हेमंत कुमार जैसे कलाकारों की तस्वीरें थीं, जबकि सुमन कल्याणपुर की तस्वीर कहीं नहीं थी। यह उस कलाकार के साथ हुई उपेक्षा का प्रतीक था, जिसकी आवाज़ तो सब सुनना चाहते थे, लेकिन जिसका चेहरा अक्सर पीछे छूट जाता था।
रफी-लता विवाद ने बदली किस्मत
सुमन कल्याणपुर के करियर का सबसे सुनहरा दौर 1960 के दशक के उत्तरार्ध और 1970 के शुरुआती वर्षों में आया। उस समय गीतों की रॉयल्टी को लेकर मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर के बीच मतभेद चल रहे थे। दोनों ने कुछ समय तक साथ गाना बंद कर दिया था।
यहीं से सुमन कल्याणपुर के लिए नए दरवाजे खुले। उन्हें बड़ी संख्या में फिल्मों में गाने का अवसर मिला। इसी दौर में उन्होंने ऐसे गीत गाए जो आज भी संगीत प्रेमियों की पसंद बने हुए हैं।
"दिल एक मंदिर है", "अगर तेरी जलवानुमाई न होती", "तुमने पुकारा और हम चले आए", "अजहूं न आए बालमा" और "आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे" जैसे गीतों ने उन्हें घर-घर पहुंचा दिया।
लेकिन जैसे ही रफी और लता के बीच सुलह हुई, इंडस्ट्री फिर पुराने ढर्रे पर लौट आई और सुमन के हिस्से में आने वाले अवसर एक बार फिर सीमित होने लगे।
ढाका से मुंबई तक का सफर
28 जनवरी 1937 को ढाका में जन्मी सुमन कल्याणपुर का बचपन भारत विभाजन से पहले के दौर में बीता। उनके पिता बैंक अधिकारी थे। परिवार 1943 में मुंबई आ गया, जहां उनकी पढ़ाई और संगीत शिक्षा हुई।
उन्होंने प्रसिद्ध संगीतकार और गुरु यशवंत देव से संगीत की विधिवत शिक्षा ली। मराठी फिल्म शुक्राची चांदनी में उन्हें पहला अवसर मिला, लेकिन दुर्भाग्यवश उनका गीत फिल्म में शामिल नहीं हो पाया।
इसके बाद संगीतकार मोहम्मद शफी ने 1954 में फिल्म मंगू में उन्हें मौका दिया। उस समय उनकी उम्र मात्र 17 वर्ष थी। लेकिन यहां भी किस्मत ने साथ नहीं दिया। फिल्म के बीच में संगीतकार बदल गए और उनकी जगह ओ.पी. नैय्यर आ गए। नैय्यर की पसंद अलग तरह की आवाज़ें थीं, इसलिए सुमन का केवल एक गीत फिल्म में रखा गया।
हालांकि उसी वर्ष फिल्म दरवाजा में पांच गीत गाकर उन्होंने अपनी मौजूदगी दर्ज करा दी। तब वे सुमन हेमाड़ी के नाम से जानी जाती थीं। बाद में मुंबई के व्यवसायी रामानंद कल्याणपुर से विवाह के बाद वे सुमन कल्याणपुर बन गईं।
बड़े संगीतकार मिले, बड़ी फिल्में नहीं
सुमन कल्याणपुर की प्रतिभा पर कभी किसी ने सवाल नहीं उठाया। उन्हें हिंदी फिल्म संगीत के लगभग सभी बड़े संगीतकारों के साथ काम करने का अवसर मिला। हेमंत कुमार, रोशन, एस.डी. बर्मन, कल्याणजी-आनंदजी, शंकर-जयकिशन, मदन मोहन, खय्याम, चित्रगुप्त और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे दिग्गजों ने उनकी आवाज़ का इस्तेमाल किया।
समस्या यह थी कि जिन फिल्मों में उन्होंने कई बेहतरीन गीत गाए, उनमें से बड़ी संख्या बी और सी ग्रेड फिल्मों की थी। नतीजा यह हुआ कि उनकी धुनें तो उत्कृष्ट रहीं, लेकिन फिल्मों की सीमित पहुंच के कारण गीतों को वह लोकप्रियता नहीं मिल सकी जिसके वे हकदार थे।
आज भी रेडियो या टीवी पर उनके कई गीत सुनकर श्रोता उन्हें लता मंगेशकर का गीत समझ बैठते हैं। केवल संगीत के पारखी ही उस बारीक अंतर को पहचान पाते हैं, जो दोनों महान गायिकाओं की आवाज़ में मौजूद था।
फिल्मों से आगे भी रहा संगीत का सफर
फिल्मी गीतों के अलावा सुमन कल्याणपुर ने कई प्राइवेट एल्बम भी रिकॉर्ड किए। उन्होंने भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी अनेक संगीत कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। उनकी उपलब्धियों को देखते हुए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया।
उन्हें तानसेन सम्मान, महाराष्ट्र और गुजरात सरकार के पुरस्कारों के साथ-साथ मध्य प्रदेश सरकार के प्रतिष्ठित लता अलंकरण सम्मान से भी सम्मानित किया गया।
सुमन कल्याणपुर के सदाबहार गीत
सुमन कल्याणपुर की विरासत उनके गीतों में हमेशा जीवित रहेगी। उनके कुछ लोकप्रिय गीत आज भी संगीत प्रेमियों की प्लेलिस्ट का हिस्सा हैं:
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इतने बड़े जहां में अपना भी कोई होता — डार्क स्ट्रीट
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इक जुर्म करके हमने चाहा था मुस्कुराना — शमा
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जूही की कली मेरी लाड़ली — दिल एक मंदिर
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अपने पिया की मैं तो बनी रे जोगनियां — कण कण में भगवान
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तुझे प्यार करते हैं करते रहेंगे — अप्रैल फूल
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हाले-दिल उनको सुनाना था — फरियाद
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परबतों के पेड़ों पर — शगुन
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ना-ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे — जब-जब फूल खिले
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ठहरिए होश में आ लूं तो चले जाइएगा — मोहब्बत इसको कहते हैं
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ये मौसम रंगीन समां — मॉडर्न गर्ल
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बहना ने भाई की कलाई से प्यार बांधा है — रेशम की डोरी
एक ऐसी आवाज़ जो कभी खोई नहीं
सुमन कल्याणपुर का जीवन इस बात का प्रमाण है कि प्रतिभा हमेशा सुर्खियों की मोहताज नहीं होती। उन्हें शायद वह शोहरत नहीं मिली जिसकी वे अधिकारी थीं, लेकिन उनके गीतों की मिठास आज भी समय की धूल से अछूती है।
हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में उनका नाम उस कलाकार के रूप में दर्ज रहेगा, जिसकी आवाज़ को दुनिया ने अक्सर किसी और की आवाज़ समझा, लेकिन जिसने अपनी सादगी, सुर और संवेदना से एक अलग पहचान बनाई। उनके जाने के बाद भी जब-जब "तुमने पुकारा और हम चले आए" या "आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे" गूंजेगा, सुमन कल्याणपुर की मधुर स्मृति संगीत प्रेमियों के दिलों में जीवित रहेगी।