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Rajaram Mohan Roy: आधुनिक भारत के जनक राजाराम मोहन राय की जयंती, जानें उनके विचार

The picture depicts Raja Ram Mohan Roy and his opposition to the practice of Sati
Rajaram Mohan Roy Jyanati 2026: आधुनिक भारत के पुनर्जागरण के अग्रदूत, राजा राम मोहन राय की जयंती 22 मई को मनाई जाती है। उन्हें 'आधुनिक भारत का जनक' (Father of Modern India) कहा जाता है क्योंकि उन्होंने उस समय भारतीय समाज को झकझोरा जब वह कुरीतियों और अंधविश्वासों की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था।
 

यहां उनके जीवन, प्रमुख सुधारों और विचारों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है:

 

1. जीवन परिचय

राजाराम मोहन राय का जन्म बंगाल में 22 मई 1772 को एक शिक्षित और प्रभावशाली परिवार में हुआ था। उन्होंने संस्कृत और फारसी का अध्ययन किया था तथा आधुनिक शिक्षा के प्रति उनकी बहुत रुचि थी। उनके पिता का नाम रमाकांत तथा माता का नाम तारिणी देवी था।
 

2. शिक्षा और पत्रकारिता में योगदान

उनका मानना था कि केवल पश्चिमी विज्ञान और तर्कसंगत सोच ही भारतीयों को आधुनिक बना सकती है। उन्होंने 1817 में हिंदू कॉलेज (कोलकाता) की स्थापना में मदद की।
 
उन्हें 'भारतीय पत्रकारिता का अग्रदूत' भी कहा जाता है। उन्होंने फारसी में 'मिरात-उल-अखबार' और बांग्ला भाषा में 'संवाद कौमुदी' जैसे समाचार पत्र शुरू किए ताकि लोगों में जागरूकता फैले। 
 

3. ब्रह्म समाज की स्थापना

उन्होंने 1828 में 'ब्रह्म समाज' की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य हिंदू धर्म में सुधार लाना और 'एकेश्वरवाद' (एक ईश्वर की पूजा) का प्रचार करना था। उन्होंने मूर्ति पूजा, कर्मकांड और बलि प्रथा का कड़ा विरोध किया। उन्होंने वेदों और उपनिषदों के शुद्ध ज्ञान को जनता तक पहुंचाने के लिए उनका बांग्ला और अंग्रेजी में अनुवाद किया।
 

4. सामाजिक समानता और महिला अधिकार

राजा राम मोहन राय केवल सती प्रथा के विरोधी नहीं थे, बल्कि वे महिलाओं के समग्र उत्थान के पक्षधर थे:
 
- विधवा विवाह: उन्होंने विधवाओं के पुनर्विवाह का समर्थन किया।
 
- संपत्ति का अधिकार: उन्होंने महिलाओं के लिए पैतृक संपत्ति में अधिकार की मांग की।
 
- बहुविवाह और बाल विवाह: उन्होंने इन दोनों प्रथाओं को समाज के लिए अभिशाप माना और इनका विरोध किया।
 

राजा राम मोहन राय के प्रमुख विचार

 
* ईश्वर- वे एक ही निराकार ईश्वर की उपासना में विश्वास रखते थे।
 
* धर्म- उन्होंने सभी धर्मों की मौलिक एकता पर बल दिया और संकीर्णता का विरोध किया।
 
*स्वतंत्रता- वे नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी के प्रबल समर्थक थे।
 
* तर्कवाद- उनका कहना था कि किसी भी परंपरा को सिर्फ इसलिए नहीं मानना चाहिए क्योंकि वह पुरानी है; उसे तर्क की कसौटी पर कसना जरूरी है।
 

5. सती प्रथा का अंत

राजा राम मोहन राय का सबसे बड़ा योगदान सती प्रथा जैसी अमानवीय परंपरा को समाप्त करना था। उन्होंने इसके खिलाफ जन-आंदोलन चलाया और शास्त्रों के माध्यम से यह सिद्ध किया कि सती प्रथा का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। उनके प्रयासों के कारण ही 1829 में लॉर्ड विलियम बेंटिक ने सती प्रथा को अवैध घोषित कर दिया।
 

6. विरासत

राजा राम मोहन राय ने भारत को मध्यकाल के अंधेरे से निकालकर आधुनिक युग की ओर धकेला। मुगल सम्राट अकबर द्वितीय ने उन्हें 'राजा' की उपाधि दी थी। 27 सितंबर 1833 को ब्रिस्टल (इंग्लैंड) में उनका निधन हुआ, लेकिन उनके द्वारा जलाई गई सामाजिक सुधार की मशाल ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम की नींव को भी मजबूत किया।
 
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