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Last Updated : मंगलवार, 16 जून 2026 (12:12 IST)

Maharana Pratap:जयंती विशेष : मेवाड़ का शेर- महाराणा प्रताप के वो 10 सच, जो आपके रोंगटे खड़े कर देंगे

इमेज कैप्शन में महाराणा प्रताप की जयंती पर उनकी वीर गाथा बताता उनका प्रिय घोड़ा चेतक, भाला, छाती पर कवच और दो तलवारें
Veer Shiromani Maharana Pratap Jayanti: 9 मई का दिन भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों से लिखा गया है। यह दिन है उस महायोद्धा की जयंती का, जिसका नाम सुनते ही आज भी दुश्मनों के पसीने छूट जाते हैं। अदम्य साहस और स्वाभिमान के साक्षात अवतार महाराणा प्रताप की जयंती पर आइए जानते हैं उनके जीवन के वो 10 अध्याय, जो हर भारतीय को गौरवान्वित करते हैं।
 

1. मिट्टी का लाल: जन्म और विरासत

महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ। महाराजा उदयसिंह और माता रानी जयवंता बाई के इस लाड़ले को बचपन में प्यार से 'कीका' कहा जाता था। उन्होंने मेवाड़ की माटी को मुगलों के आतंक से आजाद कराने का संकल्प लिया था।
 

2. फौलादी शरीर और भारी-भरकम हथियार

महाराणा प्रताप कोई साधारण योद्धा नहीं थे। उनकी कदकाठी और ताकत हैरान करने वाली थी:
 
लंबाई: 7 फीट 5 इंच
 
वजन: करीब 110 किलोग्राम
 
हथियार: वे 81 किलो का भाला, 72 किलो का छाती कवच और दो तलवारें (कुल वजन करीब 208 किलो) लेकर युद्ध के मैदान में उतरते थे।
 

3. हल्दीघाटी: जब 20 हजार भारी पड़े 80 हजार पर

1576 के हल्दीघाटी युद्ध में प्रताप ने दिखा दिया कि हौसला तादाद से बड़ा होता है। मात्र 20 हजार राजपूत योद्धाओं के साथ उन्होंने अकबर के सेनापति मानसिंह की 80 हजार की फौज के दांत खट्टे कर दिए थे।
 

4. चेतक: वफादारी की जीती-जाती मिसाल

हल्दीघाटी के युद्ध को 'चेतक' के बिना अधूरा माना जाता है। जख्मी होने के बावजूद चेतक ने प्रताप को बचाने के लिए 26 फीट ऊंचे नाले के ऊपर से छलांग लगा दी। खुद वीरगति को प्राप्त हो गया, लेकिन अपने स्वामी की जान बचा ली।
 

5. सिंहासन नहीं, स्वाभिमान चुना

अकबर की गुलामी स्वीकार करने के बजाय प्रताप ने जंगलों में भटकना बेहतर समझा। जब कई राजा मुगलों से वैवाहिक संबंध बनाकर अपनी सत्ता बचा रहे थे, तब प्रताप ने स्पष्ट कर दिया कि "मेवाड़ झुकेगा नहीं।"
 

6. अकबर की 'अधूरी' जीत

कहा जाता है कि हल्दीघाटी के युद्ध का कोई स्पष्ट परिणाम नहीं निकला। अकबर न तो प्रताप को बंदी बना सका और न ही उनके स्वाभिमान को तोड़ सका। प्रताप ने आजीवन संघर्ष किया और अकबर के घमंड को चूर-चूर कर दिया।
 

7. घास की रोटी और संघर्ष की पराकाष्ठा

जंगलों में रहते हुए एक समय ऐसा आया जब शाही सुख भोगने वाले प्रताप के परिवार को घास की रोटी खानी पड़ी। लेकिन जब एक जंगली बिल्ली ने उनके बेटे अमर सिंह के हाथ से वह रोटी भी छीन ली, तो प्रताप का हृदय द्रवित हो उठा, पर संकल्प नहीं टूटा।
 

8. उस एक पत्र ने जगाया स्वाभिमान

जब अफवाह फैली कि प्रताप संधि कर रहे हैं, तब बीकानेर के कवि पृथ्वीराज राठौड़ ने उन्हें एक पत्र लिखा। उस पत्र की पंक्तियों ने प्रताप के भीतर की सोई हुई ज्वाला को फिर से दहका दिया और उन्होंने अंतिम सांस तक मुगलों की गुलामी नहीं की।
 

9. जब अकबर भी रो पड़ा

19 जनवरी 1597 को चावंड में धनुष की डोर खींचते समय लगी चोट के कारण इस महानायक का निधन हुआ। कहते हैं जब अकबर को प्रताप की मृत्यु की खबर मिली, तो उसकी आंखों में भी आंसू आ गए थे। उसने स्वीकार किया था कि 'प्रताप जैसा वीर कोई दूसरा नहीं।'
 

10. अजर-अमर है शौर्य गाथा

आज भी मेवाड़ की हवाओं में प्रताप का नाम गूंजता है। उन्होंने सिखाया कि संसाधन कम हों तब भी धर्म और स्वतंत्रता के लिए बलिदान दिया जा सकता है।

 

वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की जयंती पर उन्हें शत्-शत् नमन!

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