दशहरा पर साईं बाबा का समाधि दिवस: क्या श्रीराम के भक्त थे साईं बाबा? जानिए वह रहस्य
शिरडी के साईं बाबा- एक ऐसा नाम जिसकी चौखट से कोई खाली हाथ नहीं लौटा। हालाँकि कुछ हिंदू संगठन उनके अतीत को लेकर तरह-तरह के सवाल उठाते रहे हैं, लेकिन उनके जीवन के पन्नों में एक ऐसा गहरा रहस्य छिपा है, जो सीधे तौर पर उन्हें प्रभु श्रीराम की भक्ति से जोड़ता है। आखिर विजयादशमी यानी दशहरे से साईं बाबा का क्या अटूट नाता था? आइए जानते हैं उनसे जुड़ी 4 बेहद खास और मर्मस्पर्शी बातें।
1. भक्त तात्या को मिला जीवनदान
दशहरे से कुछ दिनों पहले बाबा ने अपने भक्त रामचंद्र पाटिल को संकेत दे दिया था कि इस विजयादशमी पर तात्या की सांसें थम सकती हैं। तात्या, बाबा की अनन्य भक्त बैजाबाई के बेटे थे और बाबा को प्यार से 'मामा' कहकर पुकारते थे। तात्या गंभीर बीमारी की जकड़ में थे और उनका बचना नामुमकिन लग रहा था। लेकिन बाबा ने अपने इस भांजे को जीवनदान देने के लिए एक ऐसा फैसला लिया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।
2. वह ऐतिहासिक ईंट और बाबा की भविष्यवाणी
बाबा के पास हमेशा एक ईंट रहती थी, जिसे वे अपना सिरहाना बनाकर सोया करते थे। यह महज कोई साधारण पत्थर नहीं था, बल्कि उनके गुरु वैंकुशा के प्रेम और त्याग का प्रतीक था। जब गुरु वैंकुशा ने बाबा को अपनी शक्तियां सौंपकर आश्रम छोड़ा, तो रास्ते में कुछ कट्टरपंथियों ने बाबा पर पत्थर बरसाए। बाबा को बचाने के लिए गुरु आगे आ गए और एक ईंट उनके सिर पर जा लगी। बहते खून को जब बाबा ने कपड़े से पोंछा, तो गुरु ने वही कपड़ा बाबा के सिर पर तीन फेरों में बांधकर संसार से मुक्ति और ज्ञान का आशीर्वाद दिया। बाबा ने वही चोट पहुँचाने वाली ईंट उठाकर संभाल ली और ताउम्र उसे अपने पास रखा।
सितंबर 1918 में जब भक्त माधव फासले के हाथों सफाई करते समय वह ईंट छूटकर टूट गई, तो द्वारकामाई में सन्नाटा पसर गया। टूटी ईंट को देखकर बाबा ने मुस्कुराते हुए कहा था कि यह ईंट उनकी जीवनसंगिनी थी, और इसके टूटने का मतलब है कि अब उनका इस दुनिया से जाने का वक्त भी आ चुका है।
3. अंतिम पलों में 'रामविजय' का पाठ
जब महाप्रयाण की घड़ी करीब आई, तो बाबा ने भक्त श्री वझे को 'रामविजय प्रकरण' (श्रीराम की गाथा) सुनाने का आदेश दिया। वझे जी ने लगातार 11 दिनों तक पूरे मनोयोग से पाठ किया। इसके बाद 3 दिन और पाठ करने के बाद जब वे थक गए, तो बाबा ने उन्हें विश्राम करने को कहा। प्रभु श्रीराम के नाम का रसपान करते हुए बाबा पूरी तरह शांत होकर अपनी अंतिम यात्रा के क्षणों की प्रतीक्षा करने लगे।
4. दशहरे पर महासमाधि और अमर त्याग
27 सितंबर 1918 से बाबा का शरीर तपने लगा था और उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया था। उधर तात्या की हालत बिगड़ती जा रही थी, लेकिन 15 अक्टूबर 1918—विजयादशमी के पावन दिन—बाबा ने तात्या के प्राणों की रक्षा के लिए अपने नश्वर शरीर की बलि दे दी। तात्या ठीक हो गए और साईं बाबा स्वयं ब्रह्मलीन होकर अमर हो गए।

