जया एकादशी का व्रत कब रखा जाएगा, जानिए महत्व और कथा
Jaya Ekadashi Vrat 2026 : जया एकादशी या अजा एकादशी का व्रत भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी रखा जाता है। यह व्रत भगवान श्री हरि विष्णु की कृपा पाने, पापों से मुक्ति, मोक्ष प्राप्ति, व्यक्ति को अनजाने में हुए पापों, पिशाच और नीच योनियों के कष्टों से मुक्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। आइए जानते हैं जया एकादशी या अजा एकादशी का व्रत कब रखा जाएगा, इसका महत्व और कथा के बारे में विस्तार से...
शुभ तिथि और मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ और समापन सूर्योदय की तिथि (उदयातिथि) के आधार पर तय किया जाता है।
एकादशी तिथि प्रारंभ : 6 सितंबर 2026 को शाम 07:29 बजे।
ब्रह्म मुहूर्त: प्रात: 04:52 से 05:38 तक।
अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:12 से 03:01 तक।
गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:48 से 07:11 तक।
जया एकादशी या अजा एकादशी का व्रत पूरे दिन रखा जाता है।
एकादशी व्रत का पारण
एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहते हैं। एकादशी के अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को सूर्योदय के पश्चात सात्विक भोजन ग्रहण करके पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है।
एकादशी तिथि समाप्त : 7 सितंबर 2026 को शाम 05:03 बजे।
8 सितंबर व्रत के पारण का समय : सुबह 06:25 से 08:53 तक।
पूजन विधान और नियम
दशमी तिथि की संध्या से ही केवल सात्विक भोजन ग्रहण करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
स्नान के पश्चात स्वच्छ अथवा पीले वस्त्र धारण करें। हाथ में जल और अक्षत लेकर भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।
भगवान विष्णु की प्रतिमा को गंगाजल से स्नान कराकर पीले फूल, गोपी चंदन, अक्षत और पीले मिष्ठान अर्पित करें।
पूजा में तुलसी दल का महत्व
भगवान विष्णु को भोग लगाते समय तुलसी का पत्ता अवश्य रखें, इसके बिना पूजन अधूरा माना जाता है। (ध्यान रखें कि एकादशी के दिन तुलसी पत्र न तोड़ें, इसे एक दिन पूर्व ही तोड़कर रख लें।)
निंदा और चावल पूर्णतः वर्जित
इस दिन चावल का सेवन पूर्णतः वर्जित है। किसी की चुगली, क्रोध या अपशब्द बोलने से बचें और मन ही मन 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करते रहें।
जया एकादशी व्रत का महत्व
जया एकादशी या अजा एकादशी व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मन और आत्मा के शुद्धिकरण का माध्यम है। यह व्रत व्यक्ति के भीतर के अहंकार, मोह और नकारात्मक ऊर्जा का नाश करता है। जो श्रद्धालु विधि-विधान और निष्ठा के साथ इस व्रत का पालन करते हैं, उन्हें जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है और अंत समय में विष्णुलोक (वैकुंठ) का मार्ग सुलभ होता है।
जया एकादशी की कथा
एक पौराणिक प्रसंग के अनुसार, इंद्रदेव की सभा में 'माल्यवान' नाम का गंधर्व और 'पुष्पवती' नाम की नर्तकी रहते थे। एक बार स्वर्गलोक में उत्सव के दौरान दोनों एक-दूसरे के प्रति मोहित हो गए, जिससे उनका ध्यान गायन और नृत्य से भटक गया। इस अवहेलना से क्रोधित होकर देवराज इंद्र ने उन्हें स्वर्ग से निष्कासित कर पृथ्वी पर पिशाच रूप में भटकने का शाप दे दिया।
दुख और शारीरिक कष्टों से पीड़ित होकर दोनों हिमालय की गुफाओं में रहने लगे। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन ठंड और भूख के कारण उन्होंने पूरे दिन कुछ भी नहीं खाया और रातभर जागते रहे। अनजाने में ही सही, उनसे जया एकादशी का कठोर उपवास और जागरण पूरा हो गया।
इस अनजाने व्रत के पुण्य प्रभाव से दोनों को पिशाच योनी से मुक्ति मिल गई और वे पुन: अपने सुंदर दिव्य रूप में आकर स्वर्गलोक लौट गए। जब इंद्र ने उनसे इसका कारण पूछा, तो माल्यवान ने बताया कि यह भगवान विष्णु की कृपा और जया एकादशी के व्रत का फल है।

