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Written By WD Feature Desk

जया (अजा) एकादशी व्रत कथा Jaya Ekadashi Vrat Katha

जलते हुए दीयों के साथ श्री‍हरि नारायण का खूबसूरत चित्र
jaya ekadashi story 2026: जया एकादशी हिंदू धर्म का महत्वपूर्ण व्रत हैं, जो प्रत्येक वर्ष मनाया जाता हैं। जया एकादशी माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। यह एकादशी विशेष रूप से युद्ध के समय विजय प्राप्त करने के लिए जानी जाती है।ALSO READ: जया और विजया एकादशी में क्या है अंतर जानिए

'जया' का अर्थ है 'विजय' और इस दिन उपवास रखने से व्यक्ति को शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के साथ-साथ जीवन में सफलता और समृद्धि मिलती है। इस दिन श्रीविष्णु के साथ-साथ विशेष तौर पर भगवान राम की पूजा की जाती है। यह व्रत विशेष रूप से पापों का नाश करता है और जीवन में सुख-शांति लाने के लिए किया जाता है। यहां पढ़ें कथा...
 
पद्म पुराण में वर्णित जया/ अजा एकादशी कथा व्रत के अनुसार देवराज इंद्र स्वर्ग में राज करते थे और अन्य सब देवगण सुखपूर्वक स्वर्ग में रहते थे। एक समय इंद्र अपनी इच्छानुसार नंदन वन में अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे और गंधर्व गान कर रहे थे। उन गंधर्वों में प्रसिद्ध पुष्पदंत तथा उसकी कन्या पुष्पवती और चित्रसेन तथा उसकी स्त्री मालिनी भी उपस्थित थे। साथ ही मालिनी का पुत्र पुष्पवान और उसका पुत्र माल्यवान भी उपस्थित थे। 
 
पुष्पवती गंधर्व कन्या माल्यवान को देखकर उस पर मोहित हो गई और माल्यवान पर काम-बाण चलाने लगी। उसने अपने रूप लावण्य और हावभाव से माल्यवान को वश में कर लिया। पुष्पवती अत्यंत सुंदर थी। अब वे इंद्र को प्रसन्न करने के लिए गान करने लगे परंतु परस्पर मोहित हो जाने के कारण उनका चित्त भ्रमित हो गया था। 
 
इनके ठीक प्रकार न गाने तथा स्वर ताल ठीक नहीं होने से इंद्र इनके प्रेम को समझ गया और उन्होंने इसमें अपना अपमान समझ कर उनको शाप दे दिया। इंद्र ने कहा- हे मूर्खों! तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है, इसलिए तुम्हारा धिक्कार है। अब तुम दोनों स्त्री-पुरुष के रूप में मृत्यु लोक में जाकर पिशाच रूप धारण करो और अपने कर्म का फल भोगो। 
 
इंद्र का ऐसा शाप सुनकर वे अत्यंत दु:खी हुए और हिमालय पर्वत पर दु:खपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने लगे। उन्हें गंध, रस तथा स्पर्श आदि का कुछ भी ज्ञान नहीं था। वहां उनको महान दु:ख मिल रहे थे। उन्हें एक क्षण के लिए भी निद्रा नहीं आती थी। उस जगह अत्यंत शीत था, इससे उनके रोंगटे खड़े रहते और शीत के मारे दांत बजते रहते। एक दिन पिशाच ने अपनी स्त्री से कहा कि पिछले जन्म में हमने ऐसे कौन-से पाप किए थे, जिससे हमको यह दु:खदायी पिशाच योनि प्राप्त हुई। इस पिशाच योनि से तो नर्क के दु:ख सहना ही उत्तम है। अत: हमें अब किसी प्रकार का पाप नहीं करना चाहिए। 
 
इस प्रकार विचार करते हुए वे अपने दिन व्यतीत कर रहे थे। दैव्ययोग से तभी माघ मास शुक्ल पक्ष की जया/अजा नामक एकादशी आई। उस दिन उन्होंने कुछ भी नहीं खाया और ना ही कोई पाप कर्म ही किया। केवल फल-फूल खाकर ही दिन व्यतीत किया और सायंकाल के समय महान दु:ख से पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए। उस समय सूर्य भगवान अस्त हो रहे थे। उस रात को अत्यंत ठंड थी, इस कारण वे दोनों शीत के मारे अति दु:खित होकर मृतक के समान आपस में चिपटे हुए पड़े रहे। उस रात्रि को उनको निद्रा भी नहीं आई। 
 
जया एकादशी के उपवास और रात्रि के जागरण से दूसरे दिन प्रभात होते ही उनकी पिशाच योनि छूट गई। अत्यंत सुंदर गंधर्व और अप्सरा की देह धारण कर सुंदर वस्त्राभूषणों से अलंकृत होकर उन्होंने स्वर्गलोक को प्रस्थान किया। उस समय आकाश में देवता उनकी स्तुति करते हुए पुष्पवर्षा करने लगे। स्वर्गलोक में जाकर इन दोनों ने देवराज इंद्र को प्रणाम किया। इंद्र इनको पहले रूप में देखकर अत्यंत आश्चर्यचकित हुए और पूछने लगे कि तुमने अपनी पिशाच योनि से किस तरह छुटकारा पाया, सो सब बतालाओ। 
 
तब माल्यवान बोले- हे देवेन्द्र! भगवान विष्णु की कृपा और जया एकादशी के व्रत के प्रभाव से ही हमारी पिशाच देह छूटी है। तब इंद्र बोले कि हे माल्यवान! भगवान की कृपा और एकादशी का व्रत करने से न केवल तुम्हारी पिशाच योनि छूट गई, वरन् हम लोगों के भी वंदनीय हो गए, क्योंकि विष्णु और शिव के भक्त हम लोगों के वंदनीय हैं, अत: आप धन्य है। अब आप पुष्पवती के साथ जाकर विहार करो। इस कथा के महत्व के अनुसार जया एकादशी के व्रत से बुरी योनि छूट जाती है।

जिसने इस एकादशी का व्रत किया है उसने मानो सब यज्ञ-जप, दान-पुण्य आदि के सारे कार्य कर लिए। जो मनुष्य जया एकादशी का व्रत करते हैं वे अवश्य ही हजार वर्ष तक स्वर्ग में वास करते हैं और पिशाच योनि से मुक्ति पा जाते हैं। 
 
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