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श्री कृष्‍ण जन्माष्टमी के दिन आद्य कालिका माता की जयंती, जानें पूजा का शुभ समय और महत्व

kali mata jayanti 2026
श्री कृष्ण जन्माष्टमी की शुभ तिथि पर ही दस महाविद्याओं में प्रथम और सबसे उग्र स्वरूप माता आद्य कालिका (माँ काली) की जयंती भी मनाई जाती है। सनातन धर्म में भाद्रपद पद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व है, क्योंकि इस दिन जहाँ भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्री कृष्ण ने जन्म लिया था, वहीं मध्यरात्रि के समय माँ काली का प्राकट्य भी माना जाता है।
 

पूजा का शुभ समय (मध्यरात्रि/निशिता काल)

माँ काली की पूजा मुख्य रूप से निशिता काल (मध्यरात्रि) में की जाती है।
अष्टमी तिथि का प्रारंभ: कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की रात।
शुभ पूजा मुहूर्त: मध्यरात्रि 12:00 बजे से लेकर 12:45 बजे (निशिता काल) तक का समय माँ काली की साधना और पूजा के लिए सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।
 

आद्य कालिका जयंती का धार्मिक महत्व

अधर्म का विनाश: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब असुरों का अत्याचार चरम पर था, तब धर्म और भक्तों की रक्षा के लिए माँ जगदम्बा ने कालिका रूप धारण किया था।
दोहरी पावन तिथि: जन्माष्टमी पर एक ओर जहाँ बाल गोपाल का रूप आनंद, प्रेम और वात्सल्य का प्रतीक है, वहीं माँ कालिका का रूप नकारात्मक शक्तियों, भय और शत्रुओं के नाश का प्रतीक है।
तांत्रिक और गृहस्थ साधना: तंत्र साधना करने वालों के लिए यह रात अत्यधिक सिद्धिदात्री मानी जाती है। वहीं, सामान्य गृहस्थ इस दिन माँ काली की कृपा से अपने जीवन के भय, रोग और ग्रहों के दोष दूर करते हैं।

सरल पूजा विधि

सफाई और संकल्प: मध्यरात्रि में स्नान कर लाल या काले वस्त्र धारण करें और पूजा का संकल्प लें।
स्थान स्थापना: लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माँ काली की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
सामग्री अर्पित करें: माता को लाल गुड़हल का फूल, लाल चुनरी, धूप, दीप और काजल अर्पित करें।
भोग: माँ काली को गुड़, नारियल या घर की बनी मिठाई का भोग लगाएँ।
मंत्र जाप: 'ॐ क्रीं कालिकायै नमः' या 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै' का 108 बार जाप करें।
आरती: पूजा के अंत में कपूर से माता की आरती करें और भूल-चूक की क्षमा माँगें।
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