कब है पोला पिठोरा? क्यों मनाया जाता है यह पर्व? जानिए पूजा विधि और मुहूर्त
Pola Pithora Festival 2026 : भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला पिठोरी व्रत (जिसे कई क्षेत्रों में पिठोरी अमावस, भाद्रपद अमावस्या, पोला पिठोरा, पोला अमावस्या या मातृ अमावस्या भी कहा जाता है) धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत फलदायी माना गया है। यह व्रत मुख्य रूप से माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है। इस दिन माताएं देवी दुर्गा सहित 64 योगिनियों की पूजा-अर्चना करती हैं।
पूजा का शुभ प्रदोष मुहूर्त
शाम 06:46 बजे से रात्रि 09:06 बजे तक।
पिठोरी पर्व को लेकर तिथियों का क्षेत्रीय भेद
पूर्णिमान्त कैलेंडर के अनुसार उत्तर भारत एवं अन्य क्षेत्रों में यह व्रत भाद्रपद मास की अमावस्या को रखा जाता है, जबकि अमान्त कैलेंडर के मुताबिक महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिणी राज्यों में यह व्रत श्रावण माह की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है।
पिठोरी व्रत का धार्मिक महत्व
यह व्रत मुख्य रूप से माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है। इस दिन माताएं देवी दुर्गा सहित 64 योगिनियों की पूजा-अर्चना करती हैं। पितरों की शांति के लिए तर्पण और दान-पुण्य करने का भी इस तिथि पर विशेष विधान है।
पूजा विधि और परंपरा
पीठ (आटे) की प्रतिमाएं : इस व्रत में 'पीठ' यानी आटे से 64 योगिनियों की छोटी-छोटी प्रतिमाएं (मूर्तियां) बनाई जाती हैं, इसीलिए इसे 'पिठोरी अमावस्या' कहा जाता है। घरों में महिलाएं ठेसूरी, खुरमी, चौसेला, खीर और पूरी जैसे पारंपरिक और लजीज व्यंजन बनाती हैं।
सायंकाल प्रदोष मुहूर्त के समय इन प्रतिमाओं का विधिवत श्रृंगार करके फल, फूल, पकवान और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। माताएं संतान की रक्षा और कल्याण का संकल्प लेकर पिठोरी व्रत की पौराणिक कथा सुनती हैं तथा आरती के बाद प्रसाद वितरित करती हैं।

