चातुर्मास 2026: प्रथम के बाद द्वितीय चातुर्मास प्रारंभ, जानिए इस माह क्या करें और क्या नहीं
सनातन धर्म में चातुर्मास का विशेष आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व माना गया है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से प्रारंभ होने वाले इस चार महीने के पावन काल में भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। चातुर्मास का प्रत्येक महीना एक विशेष व्रत और नियम के लिए समर्पित होता है। प्रथम मास (श्रावण - शाक व्रत) के समापन के बाद अब द्वितीय चातुर्मास (भाद्रपद - दधि व्रत) प्रारंभ हो रहा है।
क्या है द्वितीय चातुर्मास और दधि व्रत?
चातुर्मास के दूसरे महीने को शास्त्रों में 'दधि व्रत' के नाम से जाना जाता है। इस पूरे माह में 'दधि' अर्थात दही और उससे निर्मित पदार्थों का सर्वथा त्याग करने का विधान है। यह नियम दही से बने हर प्रकार के कच्चे और पक्के खाद्य पदार्थों पर समान रूप से लागू होता है। इस माह में दही, कढ़ी, रायता, पचड़ी, छाछ (मट्ठा), और लस्सी आदि का सेवन पूरी तरह से वर्जित माना गया है।
वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी दृष्टिकोण
धार्मिक नियमों के पीछे प्राचीन आचार्यों और ऋषियों का गहरा वैज्ञानिक दृष्टिकोण छिपा हुआ है:
पाचन तंत्र और सुस्ती: वर्षा ऋतु के मध्य (भाद्रपद माह) में वायुमंडल में नमी अधिक होती है, जिससे शरीर की जठराग्नि (पाचन क्षमता) कमजोर पड़ जाती है। दही तासीर में भारी और पचने में समय लेने वाला होता है।
सूक्ष्मजीव और संक्रमण: बारिश के मौसम में वातावरण में सूक्ष्मजीवों और जीवाणुओं की वृद्धि तेजी से होती है। इस समय दही बहुत जल्दी विकृत (खट्टा या दूषित) हो जाता है, जिससे पाचन संबंधी विकार, पेट में इंफेक्शन, गैस और टॉक्सिन्स (विषैले तत्व) बढ़ने का खतरा रहता है।
वात व कफ का संतुलन: शास्त्रों और आयुर्वेद के अनुसार इस समय दही का सेवन शरीर में कफ और वात दोष को बढ़ा सकता है, जिससे त्वचा रोग, जोड़ों का दर्द और पेट के रोग जन्म ले सकते हैं।
द्वितीय चातुर्मास: क्या करें और क्या न करें?
क्या न करें (वर्जित नियम):
दही व उससे बने व्यंजनों का त्याग: दही, छाछ, लस्सी, कढ़ी, रायता, श्रीखंड आदि का सेवन न करें।
तामसिक भोजन से परहेज: लहसुन, प्याज, मांसाहार, मदिरा और अत्यधिक तले-भुने भोजन से दूर रहें।
भारी भोजन: पचाने में भारी पदार्थों का सेवन शाम या रात के समय बिल्कुल न करें।
क्या करें (शुभ नियम):
सात्विक आहार: हल्का, ताजा और सुपाच्य भोजन ग्रहण करें।
भगवान विष्णु और शिव की साधना: भाद्रपद माह में भगवान श्री कृष्ण, विष्णु जी और शिव जी की पूजा-अर्चना करें।
दान एवं नाम जप: इस माह में जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और विद्या का दान करें। साथ ही 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का नियमित जप करें।
चातुर्मास का दधि व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह वर्षा ऋतु में हमारे शरीर को स्वस्थ, निरोगी और संतुलित रखने का एक बेहतरीन माध्यम है। इस माह में संयम और नियमों का पालन करके हम आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ-साथ उत्तम स्वास्थ्य भी प्राप्त कर सकते हैं।

