चातुर्मास में संत-महात्मा क्यों नहीं करते यात्रा? 4 महीने एक जगह रहने की जानिए खास वजह
Chaturmas 2026: हिन्दू कैलेंडर के अनुसार आषाढ़ शुक्ल देवशयनी एकादशी यानी 25 जुलाई 2026 से चातुर्मास प्रारंभ हो गए हैं। इसके बाद 20 नवंबर 2026 कार्तिक शुक्ल एकादशी को देव उठनी एकादशी रहेगी तब तक चातुर्मास चलेंगे। चातुर्मास में यदि आपने शास्त्रों के नियमों का पालन कर लिया तो मानसिक और शारीरिक सेहत के साथ ही सुख, शांति और समृद्धि मिलेगी।
शास्त्रों के अनुसार चातुर्मास में तप, साधना या जप बहुत जल्दी फलित होते हैं। इसलिए साधना और सिद्धियों के लिए इन चार माह को सबसे उत्तम माह बताया गया है। कहते हैं कि इन चार माह में सेहत में भी सुधार करके स्वस्थ हुआ जा सकता है। चातुर्मास (आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक के चार महीने) में साधु-संतों, ऋषियों और मुनियों द्वारा एक ही स्थान पर ठहरने की परंपरा सदियों पुरानी है। इसे ज्योतिषीय, धार्मिक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक सभी दृष्टिकोणों से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। संतों द्वारा एक स्थान पर 4 महीने (चौमासा) बिताने के मुख्य कारण नीचे दिए गए हैं।
1. अहिंसा और जीव-रक्षा का पालन (मुख्य कारण)
- चातुर्मास का समय वर्षा ऋतु (Monsoon) का समय होता है। इस मौसम में धरती पर छोटे-छोटे कीट-पतंगे, चींटियां, सूक्ष्म जीव और सूक्ष्म वनस्पतियां अत्यधिक संख्या में उत्पन्न होती हैं।
- संतों का जीवन अहिंसा के सिद्धांत पर आधारित होता है।
- बारिश के मौसम में यदि वे लगातार यात्राएं करेंगे, तो उनके पैरों तले कुचलकर अनजाने में इन सूक्ष्म जीवों की हिंसा (हत्या) होने का भय रहता है।
- जैन और सनातन परंपरा में जीव-रक्षा को सर्वोच्च धर्म माना गया है, इसलिए संत पद-यात्रा (विहार) रोककर एक स्थान पर ठहर जाते हैं।
2. मार्ग की बाधाएं और प्राकृतिक कठिनाइयां
प्राचीन काल में (और आज भी कई ग्रामीण/पहाड़ी इलाकों में) वर्षा ऋतु में नदियों-नालों में उफान आता था, रास्ते कीचड़ और पानी से भर जाते थे। कच्चे रास्तों पर यात्रा करना अत्यंत कठिन और जोखिम भरा होता था। सुरक्षा और स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी संतों का एक स्थान पर रुकना व्यावहारिक था।
3. भक्ति, स्वाध्याय और साधना का समय
अन्य आठ महीनों में संत समाज में घूम-घूमकर धर्म का प्रचार करते हैं और निरंतर यात्रा में रहते हैं। निरंतर यात्रा के कारण उन्हें स्वयं की साधना के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता।
ये चार महीने आंतरिक यात्रा (Self-Reflection) और ईश्वर साधना के माने गए हैं।
संत इस समय गहन तपस्या, मौन, ग्रंथों का अध्ययन (स्वाध्याय) और ध्यान करते हैं।
4. समाज का कल्याण और सत्संग का अवसर
जब कोई ज्ञानी संत किसी एक नगर या गांव में चार महीने के लिए रुकते हैं, तो वहां के निवासियों को उनके साथ सत्संग करने, कथा-प्रवचन सुनने और धर्म मार्ग पर चलने का लंबा और सुनहरा अवसर मिलता है। इससे समाज में संस्कार और धार्मिक जागृति बढ़ती है।
5. खगोलीय और प्राकृतिक ऊर्जा (साधना के अनुकूल)
धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, इन चार महीनों में भगवान विष्णु 'योगनिद्रा' (क्षीरसागर में विश्राम) में चले जाते हैं।
इस दौरान ब्रह्मांड में प्राकृतिक और सात्विक ऊर्जा का प्रवाह अधिक होता है।
इस समय का वातावरण ध्यान, व्रत और जप-तप के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है।
संतों का चातुर्मास केवल एक धार्मिक नियम नहीं है, बल्कि यह अहिंसा (जीवों की सुरक्षा), प्रकृति के प्रति सम्मान, आत्म-साधना और जन-कल्याण का एक सुंदर एवं वैज्ञानिक संतुलन है।
चातुर्मास में क्या करें:- यज्ञोपवीत धारण करके व्रत, तप, संयम, मौन, संत्सग, ध्यान, दान, संध्या और तर्पण करें।
चातुर्मास में क्या न करें:- संस्कार और मांगलिक कार्य, केश कर्तन, कटू वचन बोलना, यात्रा, झूठ बोलना, अनर्गल बातें, मनोरंजन के कार्य न करें।
त्याज्य पदार्थ : तेल, दूध, शकर, दही, तेल, बैंगन, पत्तेदार सब्जियां, नमकीन या मसालेदार भोजन, मिठाई, सुपारी, मांस और मदिरा का सेवन नहीं किया जाता। श्रावण में पत्तेदार सब्जियां यथा पालक, साग इत्यादि, भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध, कार्तिक में प्याज, लहसुन और उड़द की दाल, आदि का त्याग कर दिया जाता है।

