Heatwave Deaths in India: हमारी धरती का तापमान इंसानी लालच और कंक्रीट के जंगलों की वजह से लगातार बढ़ रहा है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह 'सुलगती हुई धूप' केवल पसीना नहीं, बल्कि हमारे अपनों की सांसें भी छीन रही है?
'द वायर' में एक बेहद चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, भारत में केवल एक दिन की अत्यधिक गर्मी (Extreme Heat) लगभग 3400 अतिरिक्त मौतों का कारण बन सकती है। डरावना सच यह है कि यदि यही लू (Heatwave) लगातार पांच दिनों तक खिंच जाए, तो यह आंकड़ा बढ़कर 30,000 मौतों तक पहुंच सकता है।
सरकार द्वारा हर साल जारी किए जाने वाले आधिकारिक आंकड़े मात्र 800 या उससे भी कम मौतें बताते हैं। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं ज्यादा भयावह है। कारण स्पष्ट है — हीटस्ट्रोक को मृत्यु प्रमाण-पत्र में सीधे दर्ज नहीं किया जाता। अत्यधिक गर्मी के कारण होने वाली अधिकांश मौतें हार्ट अटैक, किडनी फेलियर या श्वसन संबंधी बीमारियों के रूप में दर्ज हो जाती हैं। इससे असली आंकड़े छिप जाते हैं।
सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य और जिले
अध्ययन के अनुसार, पांच राज्य — उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात — पांच दिनों की लू में होने वाली कुल अतिरिक्त मौतों का 66 प्रतिशत हिस्सा अकेले उठाते हैं। इन राज्यों में देश की सिर्फ 43 प्रतिशत आबादी रहती है, फिर भी गर्मी का प्रकोप यहां सबसे घातक है। अकेले उत्तर प्रदेश में पांच दिनों की लू के दौरान लगभग 8100 अतिरिक्त मौतें होने की आशंका है।
सबसे संवेदनशील राज्य : जहां आबादी ज़्यादा, संसाधन कम
इस थर्मल आपदा (Thermal Disaster) का सबसे क्रूर चेहरा भारत के पांच राज्यों में देखने को मिलता है: उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात।
-
66% मौतों का बोझ : पांच दिनों की लू के दौरान होने वाली कुल मौतों का 66% हिस्सा इन्हीं पांच राज्यों में होता है, जबकि यहां देश की केवल 43% आबादी रहती है।
-
उत्तर प्रदेश सबसे आगे : अकेले उत्तर प्रदेश में 5 दिनों की भीषण लू के कारण लगभग 8100 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं।
-
शहरी हॉटस्पॉट : जिला स्तर पर सबसे भयावह स्थिति अहमदाबाद (307 मौतें), जयपुर (265) और सूरत (261) जैसे कंक्रीट के गढ़ बन चुके शहरों की है।
पर्यावरणीय अन्याय का उदाहरण
चिंता की बात यह है कि ये पांच सबसे प्रभावित राज्य देश की जीडीपी में सिर्फ 29 प्रतिशत का ही योगदान देते हैं। जहां गर्मी का खतरा सबसे ज्यादा है, वहीं आर्थिक संसाधन सबसे कम हैं। कूलिंग शेल्टर, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, पीने का पानी और आपातकालीन व्यवस्था — इनकी कमी इन राज्यों में साफ दिखती है।
इसका सीधा मतलब यह है कि जिन राज्यों के लोग इस जानलेवा गर्मी की सबसे अग्रिम पंक्ति (Frontline) पर खड़े हैं, उनके पास इससे निपटने के आर्थिक संसाधन—जैसे कूलिंग शेल्टर, बेहतर सार्वजनिक चिकित्सा सुविधाएं और शुद्ध पेयजल की व्यवस्था—सबसे कम हैं। गरीब मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले और किसान एसी कमरों में बैठकर कार्बन उत्सर्जन करने वालों की सजा भुगत रहे हैं।
शोधकर्ताओं ने इसे पर्यावरणीय अन्याय (Environmental Injustice) का स्पष्ट उदाहरण बताया है। गरीब और पिछड़े क्षेत्र जलवायु परिवर्तन की मार सबसे पहले और सबसे ज्यादा झेल रहे हैं, जबकि संसाधनों का वितरण अभी भी पुरानी सोच पर आधारित है।
जलवायु परिवर्तन और भविष्य की चुनौती
वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण लू की तीव्रता और अवधि दोनों बढ़ रही है। ऐसे में केंद्र सरकार को अपनी आपदा प्रबंधन निधियों — जैसे एनडीएमए और राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना — का आवंटन अब केवल जनसंख्या के आधार पर नहीं करना चाहिए। सबसे संवेदनशील और आर्थिक रूप से कमजोर राज्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो हर गर्मी का मौसम हजारों-लाखों अतिरिक्त मौतों का कारण बनता जाएगा।
1. जनसंख्या नहीं, 'थर्मल संवेदनशीलता' बने आधार
केंद्र सरकार को अपनी आपदा प्रबंधन निधियों (जैसे NDMA और जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना - NAPCC) का आवंटन केवल राज्य की जनसंख्या देखकर नहीं करना चाहिए। फंड का बड़ा हिस्सा उन गरीब और पिछड़े जिलों को जाना चाहिए जो इस थर्मल आपदा के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं।
2. ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर और अर्बन फॉरेस्ट
शहरों को 'हीट आइलैंड' बनने से रोकना होगा। कंक्रीट के प्रसार को रोककर शहरी वनों (Miyawaki Forests) को बढ़ावा देना, तालाबों को पुनर्जीवित करना और कूल रूफ (Cool Roof) तकनीकों को अनिवार्य करना होगा।
3. हीट एक्शन प्लान (HAP) को कानूनी रूप देना
हर जिले का अपना सक्रिय 'हीट एक्शन प्लान' होना चाहिए, जिसमें डॉक्टरों को हीटस्ट्रोक के लक्षणों की पहचान करने और मौतों को सही ढंग से रिकॉर्ड करने का प्रशिक्षण शामिल हो।
लू अब कोई स्थानीय समस्या नहीं रही। यह एक राष्ट्रीय आपदा है जो सबसे गरीब और सबसे कमजोर तबके को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रही है। आंकड़ों को छिपाने या कम करके आंकने की बजाय वास्तविकता को स्वीकार करते हुए तत्काल कार्ययोजना बनानी होगी। क्योंकि गर्मी किसी को भी छोड़ने वाली नहीं है — न अमीर को, न गरीब को। लेकिन तैयारी की कमी सिर्फ गरीबों की जान ले रही है।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala