क्यों मनाई जाती है नरक चतुर्दशी? इसका भगवान श्रीकृष्ण से क्या है संबंध?
Naraka Chaturdashi 2026: हिंदू धर्म में दीपावली का त्योहार केवल एक दिन नहीं, बल्कि 5 दिनों तक चलने वाला विशेष पर्व है। धनतेरस से शुरू होकर भाई दूज तक चलने वाले इस उत्सव में नरक चतुर्दशी का भी विशेष महत्व है। इसे छोटी दिवाली, रूप चौदस और काली चौदस के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन घरों में दीपक जलाए जाते हैं, सुबह अभ्यंग स्नान किया जाता है और भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना की जाती है। नरक चतुर्दशी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण और राक्षस नरकासुर के वध की पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है। आइए जानते हैं विस्तार से क्यों मनाई जाती है नरक चतुर्दशी और इसका भगवान श्रीकृष्ण से क्या है संबंध?
नरक चतुर्दशी क्यों मनाई जाती है?
नरक चतुर्दशी मनाने के पीछे सबसे प्रमुख मान्यता भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध से जुड़ी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का अंत करके हजारों बंदी कन्याओं को मुक्त कराया था। नरकासुर एक अत्याचारी असुर था, जिसने अपनी शक्ति के अहंकार में देवताओं, ऋषि-मुनियों और मनुष्यों को परेशान कर रखा था।
भगवान श्रीकृष्ण ने किया था नरकासुर का वध
उसने अनेक कन्याओं को बंदी बना लिया था और देवताओं की संपत्ति पर भी अधिकार कर लिया था। उसके अत्याचारों से तीनों लोकों में भय का वातावरण बन गया था। तब देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण से नरकासुर के आतंक को समाप्त करने की प्रार्थना की थी। भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध करके नरकासुर का वध किया और बंदी कन्याओं को मुक्त कराया।
नरकासुर के अंत की खुशी में लोगों ने दीपक जलाकर उत्सव मनाया था। यही वजह है कि यह दिन बुराई पर अच्छाई की जीत और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक माना जाता है। दीपक जलाकर जीवन से अज्ञान, नकारात्मकता और बुराइयों को दूर करने की कामना की जाती है। इस घटना को अधर्म पर धर्म की विजय के रूप में भी देखा जाता है।
इसी परंपरा के कारण कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को दीपोत्सव से जोड़ा गया। चूंकि यह मुख्य दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाती है, इसलिए इसे छोटी दिवाली कहा जाता है। नरकासुर का जन्म पृथ्वी देवी और भगवान विष्णु के वराह अवतार से हुआ था। इसी कारण उसे भौमासुर भी कहा जाता था।
नरक चतुर्दशी पर क्यों की जाती है यमराज की पूजा?
नरक चतुर्दशी को यम चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन मृत्यु के देवता भगवान यमराज के नाम पर दीपदान करने की परंपरा है। इसे यम दीपदान कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन शाम के समय घर के बाहर दक्षिण दिशा में दीपक जलाने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है।
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दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा माना जाता है। इस दिन दीपक जलाते समय भगवान यमराज से परिवार के सदस्यों की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। कुछ धार्मिक परंपराओं में यमराज के लिए दीपदान के साथ पितरों के कल्याण की कामना भी की जाती है।

