राम मंदिर: सात्विकता, सुशासन और सनातन की अग्निपरीक्षा
अयोध्या धाम में प्रभु श्री राम के भव्य मंदिर का निर्माण केवल शिल्पकला का दर्शन नहीं, बल्कि करोड़ों सनातनियों की सदियों पुरानी अगाध आस्था, तप और संकल्प की पूर्णाहुति है। इस पावन काज में देश-विदेश के रामभक्तों ने अपनी गाढ़ी कमाई का अंश समर्पित किया है।ALSO READ: अयोध्या के श्री रामलला मंदिर पर लोभ का साया
ऐसे में, यदि मंदिर परिसर या दान राशि के प्रबंधन में किसी भी स्तर पर कोई विसंगति या मानवीय भूल सामने आती है, तो सनातनी समाज का उद्वेलित होना स्वाभाविक है। किंतु, इस संवेदनशील घटनाक्रम पर जिस प्रकार की विपक्ष की राजनीति शुरू हुई है, उसने एक बार फिर साबित किया है कि देश के विरोधी दलों के लिए जन-आस्था केवल चुनावी लाभ-हानि का जरिया मात्र है।
देखा जाए तो इस पूरे प्रकरण में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनकी सरकार का तरीका अत्यंत सराहनीय और अनुकरणीय रहा है। मुख्यमंत्री ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि दूध का दूध और पानी का पानी होकर रहेगा।
सरकार ने केवल बातें नहीं की, बल्कि त्वरित कार्रवाई से जीरो टॉलरेंस की नीति को धरातल पर उतार कर दिखाया। जैसे ही 5 जून को मामला सामने आया, सरकार ने 13 जून को एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन कर दिया। इस जांच दल ने बिना किसी दबाव के, पूरी निष्पक्षता से मात्र 10 दिनों में ही अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी।
इसका ही परिणाम है कि 24 घंटे के भीतर प्राथमिकी दर्ज कर, आठ मुख्य आरोपियों को सलाखों के पीछे भेज दिया गया है और बाकी संदिग्धों से भी कड़ी पूछताछ जारी है। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि वर्तमान योगी शासन तंत्र में चाहे कोई कितना भी रसूखदार क्यों न हो, प्रभु राम के काज में और सनातन की सात्विकता के साथ खिलवाड़ करने वाले को छोड़ा नहीं जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे गरिमामय पक्ष श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के वरिष्ठ पदाधिकारियों, चंपत राय जी और अनिल मिश्रा जी का निर्णय रहा। इन दोनों विभूतियों ने अपना संपूर्ण जीवन राम काज और सनातन धर्म की सेवा में समर्पित कर दिया है। विशेषकर चंपत राय जी के उस संघर्ष को देश कभी नहीं भूल सकता, जिन्होंने बिना रुके, बिना थके पत्थरों की नक्काशी से लेकर अदालती दस्तावेजों को सहेजने तक, मंदिर निर्माण के हर मोर्चे पर एक सच्चे सेनापति की तरह काम किया। जन-जन उन्हें आदर से राम जी का पटवारी कहता है।
जब जांच की बात आई, तो उन्होंने भारतीय लोक-मर्यादा की श्रेष्ठ परंपरा का निर्वहन करते हुए अपने पदों से त्यागपत्र दे दिया। उनका यह इस्तीफा किसी दोष की स्वीकारोक्ति नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी का वह उत्कृष्ट उदाहरण है जो त्रेतायुग की न्यायप्रियता की झलक है। उन्होंने पद इसलिए छोड़ा ताकि जांच प्रक्रिया पूरी तरह स्वतंत्र, निष्पक्ष और बिना किसी प्रभाव के पूरी हो सके। ऐसे तपस्वी व्यक्तित्वों पर राजनीतिक लाभ के लिए कीचड़ उछालना, उनकी जीवनभर की तपस्या का अपमान करना है।
दूसरी ओर, विरोधी दलों का रवैया हमेशा की तरह निराशाजनक और सनातन विरोधी ही है। इतिहास गवाह है कि यह वही विपक्ष है जिसने सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर के अस्तित्व को नकारने के लिए वकीलों की भारी-भरकम फौज खड़ी कर दी थी, रामभक्तों पर गोलियां चलवाई थीं, कदम-कदम पर रोड़े अटकाए और राम जी का निमंत्रण सिरे से खारिज किया था। आज वही लोग अचानक दान की पारदर्शिता के सबसे बड़े पैरोकार बनने का ढोंग कर रहे हैं।
वास्तव में, विपक्ष को इस संवेदनशील मामले में कोई जनहित या आस्था की चिंता नहीं है; उन्हें तो बस आगामी चुनावों में भुनाने के लिए एक राजनीतिक मुद्दा मिल गया है। इनका असली एजेंडा सनातनी समाज की उस अटूट एकता को भंग करना है, जो मंदिर निर्माण के बाद अभूर्व रूप से सुदृढ़ हुई है। वे भ्रामक आंकड़े फैलाकर और श्रद्धालुओं के मन में संशय के बीज बोकर इस सांस्कृतिक पुनर्जागरण को कमजोर करना चाहते हैं। देश की जनता को यह समझना होगा कि जो दल कभी सनातन को मिटाने की बात करने वालों के साथ खड़े होते हैं, उनकी सहानुभूति केवल एक छलावा और नया चुनावी पैंतरा मात्र है।
स्मरण रखना होगा कि आज का दौर केवल जमीनी राजनीति का नहीं, बल्कि सूचना युद्ध (इन्फॉर्मेशन वॉर) का भी है। ऐसे समय में प्रत्येक सनातनी का यह परम कर्तव्य है कि वह सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही अफवाहों से पहले विवेक का उपयोग करे। किसी भी अपुष्ट या सनसनीखेज खबर को बिना जांचे आगे फॉरवर्ड न करें, क्योंकि यह श्री राम मंदिर की वैश्विक छवि को धूमिल करने का एक सोचा-समझा प्रयास भी हो सकता है। हमें केवल श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट और सरकारी जांच एजेंसियों के आधिकारिक बयानों व तथ्यों पर ही विश्वास करना चाहिए। यहां कहने का अर्थ यह नहीं कि चढ़ावे में हुई किसी गड़बड़ी पर हम आंखें मूंद लें, बल्कि हमारी डिजिटल सतर्कता ही विरोधियों के दुष्प्रचार को ध्वस्त करेगी।
उत्तर प्रदेश सरकार ने दोषियों को पकड़कर अपना काम पूरी निष्पक्षता से किया है, लेकिन भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए प्रशासनिक और तकनीकी स्तर पर कुछ कड़े कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। मंदिर को मिलने वाले हर छोटे-बड़े दान का ब्लॉकचेन या अत्याधुनिक रीयल-टाइम डिजिटल ऑडिट होना चाहिए, ताकि संपूर्ण वित्तीय लेखा-जोखा एक पारदर्शी और सुरक्षित प्रणाली के तहत रहे।
इसके साथ ही, मंदिर परिसर और सुरक्षा घेरे में अत्याधुनिक सीसीटीवी कैमरे, बायोमेट्रिक एक्सेस और एआई-संचालित सुरक्षा उपकरणों का प्रयोग अनिवार्य किया जाए, जिससे किसी भी मानवीय चूक की गुंजाइश शेष न बचे। ट्रस्ट के दैनिक कार्यों और वित्तीय लेन-देन की समय-समय पर समीक्षा के लिए तिरुपति, सांवरिया सेठ या वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की तर्ज पर देश के शीर्ष व ईमानदार प्रशासनिक अधिकारियों या सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की एक उच्च स्तरीय निगरानी समिति भी बनाई जा सकती है, जो इस व्यवस्था को अधिक सुदृढ़ करे।
प्रभु श्री राम का मंदिर भारत की आत्मा और हमारी राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है। इसकी नींव हमारे पुरखों के सदियों के संघर्ष और करोड़ों भक्तों के अटूट विश्वास पर टिकी है। योगी सरकार की कड़ी और पारदर्शी कार्रवाई ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि न्याय होकर रहेगा। अब यह प्रत्येक सनातनी का कर्तव्य है कि वह राजनीतिक गिद्धों की अफवाहों पर ध्यान न देकर व्यवस्था पर भरोसा रखे। हमारी एकजुटता ही उन ताकतों को सबसे करारा जवाब होगी जो आस्था के बहाने सनातनियों को बांटना चाहती हैं; क्योंकि सत्य परेशान हो सकता है, पर पराजित नहीं।
(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)ALSO READ: त्रेता से लेकर कलयुग तक कहानी चरण पादुका की
