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बॉलीवुड फ़िल्में जोड़ रही हैं भारत और लैटिन अमेरिका को

लैटिन अमेरिका में बॉलीवुड का क्रेज
Bollywood in Latin America: अपने आप को हर क्षेत्र में बाकी दुनिया से श्रेष्ठ समझने का गर्व करने वाले यूरोप-अमेरिका के फ़िल्म समीक्षक भारतीय फ़िल्मों को गंभरता से नहीं लेते— बहुत अतिरंजित और छिछली मान कर टाल देते हैं। लेकिन, इधर कुछ समय से देखने में आ रहा है कि मुख्यतः लैटिन अमेरिकी देशों की आम जनता भारतीय फ़िल्मों की रसिक बन रही है।
 
मैक्सिको, ब्राज़ील, कोलंबिया, अर्जेंटीना और चिली जैसे दोशों में— जो वास्तव में स्पेनिश भाषी देश हैं— लाखों लोग स्पेनी सबटाइटल वाली भारतीय, मुख्यतः हिंदी फ़िल्में बड़े चाव से देखने लगे हैं। उन्हें अमेरिकन शो या अपने ही देशों के फ़िल्मी ड्रामों से अधिक बॉलीवुड लुभाने लगा है। भारतीय कथावस्तु (कंटेन्ट) वाली फ़िल्में इन देशों में नेटफ्लिक्स पर कई-कई सप्ताहों तक पहले नंबर पर रहती हैं। लगातार दो साल से यही हो रहा है। ब्राज़ील के साओ पाउलो शहर में कोई लड़की टिकटॉक पर बॉलीवुड डांस करने लगती है, तो कोलंबिया की राजधानी बोगोटा में कोई लड़का हिंदी में "आई लव यू" कहना सीखने लगता है। मेक्सिको सिटी में कोई परिवार किसी बॉलीवुड सीन से इतना भाव-विह्वल हो जाता है कि बार-बार रोने-सिसकने लगता है!

भारत से लैटिन अमेरिका 15,000 किलोमीटर दूर है

प्रश्न यह है कि ज़्यादातर लैटिन अमेरिकी लोगों ने 15,000 किलोमीटर दूर की जिन भारतीय फ़िल्मों को कभी देखा-सुना ही नहीं था, वे फ़िल्में उनके देशों में इतनी लोकप्रिय कैसे हो गईं? मुंबई में रची-बनी कहानी देखकर कोलंबिया में लोग बहुत भावुक क्यों हो जाते हैं? यह कोई सामान्य बात नहीं हो सकती! दुनिया "ग्लोबल कंटेंट" की बात करती है। लैटिन अमेरिका में मुख्यतः हॉलीवुड की, कोरियन ड्रामा की या फिर स्पेनिश फ़िल्में चलती रही हैं।
 
भारत और उसकी फ़िल्में पश्चिमी देशों में चर्चा का विषय कभी होती ही नहीं थीं। लेकिन, 2021 और 2024 के बीच हवा का रुख बदला! हुआ यह है कि भारतीय फ़िल्में लैटिन अमेरिकी देशों में नेटफ्लिक्स के "टॉप 10 चार्ट" पर पहुँचने लगीं। एक या दो बार नहीं, लगातार— हफ़्ते-दर-हफ़्ते! RRR, बाहुबली, बैटमैन सीरीज़, स्कैम 1992 और दिल्ली क्राइम जैसी फ़िल्में लोग सिर्फ़ देख ही नहीं रहे थे, उनके बारे में खूब बातें भी कर रहे थे; अनजान लोगों को इन फ़िल्मों के बारे में ऑनलाइन बता रहे थे। अतः दर्शकों की बढ़ती हुई संख्या को देख कर, नेटफ्लिक्स ने पहले से कहीं अधिक और तेज़ी से भारतीय फ़िल्में दिखाना शुरू कर दिया। स्वाभाविक है कि उसके चार्ट में सबसे अधिक बॉलीवुड की हिंदी फ़िल्में ही हुआ करती हैं।

भारत में हर साल 1500 से ज़्यादा फ़िल्में

वैसे तो, भारत में हमेशा ही फ़िल्में बनती रही हैं— दुनिया के किसी भी देश से अधिक; हिंदी में ही नहीं, तमिल, तेलुगु, मलयालम, बंगला आदि में भी— हर साल 1500 से ज़्यादा फ़िल्में। लेकिन, उनके दर्शक स्वयं भारतवासी और विदेशों में रहने वाले प्रवासी भारतीय ही हुआ करते थे। ये फ़िल्में प्यार-मोहब्बत, जोश-ख़रोश, मार-धाड़, गीत-संगीत, नाच-गाने, रोने-धोने और भावुकता से भरपूर होती हैं। मानवीयता, कर्तव्यबोध, परिवार के प्रति समर्पण और न्याय की विजय जैसे मूल्यों की भी कमी नहीं होती। कहानियाँ ऐसी कि हीरो हर असंभव को संभव बना देता है। विलेन को वही प्रतिफल मिलता है, जिसके वह लायक है। यूरोपीय और अमेरिकी समीक्षक इसे बहुत घिसा-पिटा, पुरातनपंथी और उबाऊ बताते हैं, जबकि स्पेनिश भाषी लैटिन अमेरिकी दर्शक उनमें अपनी ही छवि प्रतिबिंबित होती देखते हैं।
 
भारतीय या बॉलीवुड फ़िल्मों में अब भी कोई मौलिक नवीनता भले न मिले, तब भी उन्हें जिस तरह से गीत-संगीत, नाच-गानों और अंतर्मन झकझोर देने या मन मोह लेने वाले अभिनयों से सजा कर पेश किया जाता है, वह दुनिया में सबसे अलग और अनूठा है। इसीलिए, भारत से बाहर वास्तव में अब तक केवल दो प्रकार के दर्शक ही इन फ़िल्मों को देख रहे थे— विदेश में रहने वाले भारतीय और अफ्रीका तथा मध्य-पूर्व के कुछ ऐसे हिस्सों के लोग, जिनके बीच बॉलीवुड ने 1960 के दशक से अपनी पैठ बना ली थी। लैटिन अमेरिका में लगभग कुछ भी नहीं था। वहां बदलाव आया है नेटफ्लिक्स की बलिहारी से।

नेटफ्लिक्स को हॉलीवुड महंगा पड़ रहा था

नेटफ्लिक्स ने 2016 और 2020 के बीच नए देशों में तेज़ी से अपना विस्तार किया। उसे ऐसे कंटेंट (कथावस्तु) वाली फ़िल्मों की ज़रूरत थी, जो बहुत सस्ती, तेज़ी से सुलभ और ग्लोबल (वैश्विक) रुचि की हों— हॉलीवुड उसे बहुत महंगा पड़ रहा था। हर देश में स्थानीय पसंद को ध्यान में रख कर फ़िल्में बनाने में काफ़ी समय लगता। दूसरी ओर, भारत में ठीक-ठाक बनी हज़ारों तैयार फ़िल्में हर समय उपलब्ध थीं। वे लैटिन अमेरिकी देशों के लोगों के दिलो-दिमाग को छूने की दृष्टि से भी न केवल दिलचस्प थीं, हॉलीवुड फ़िल्मों की लाइसेंसिंग फ़ीस की अपेक्षा बहुत सस्ती भी थीं।
 
अतः नेटफ्लिक्स ने थोक के भाव में भारतीय फ़िल्में ख़रीदना शुरू किया। पहले तो यह एक प्रयोग-भर ही था। कुछ चुनी हुई फ़िल्में ही ख़रीदी गईं। लेकिन, बाद में जो कुछ हुआ, वह पूरी तरह अनपेक्षित था। वे लैटिन अमेरिकी दर्शक, जो देर रात ऑनलाइन नेटफ्लिक्स ब्राउज़ कर रहे थे, उन्होंने स्क्रीन पर भारतीय फ़िल्मों के नाम देखते ही— जिज्ञासा या उत्सुकता-वश— उन पर क्लिक करना शुरू कर दिया। उन्हें कुछ भी पता नहीं था। बस, क्लिक किया और फ़िल्म देखने में खो गए।
 

दर्शकों की संख्या बढ़ती ही गई

समय के साथ, भारतीय फ़िल्मों के लैटिन अमेरिकी दर्शकों की संख्या तेज़ी से बढ़ती ही गई। नेटफ्लिक्स उनकी संख्या और पसंद आदि दर्ज करने लगा। उसका "एल्गोरिदम" लैटिन अमेरिकी यूज़रों को भारतीय फ़िल्में देखने की सलाह देने लगा। हर दिन ढेर सारे क्लिक होने लगे। भारतीय फ़िल्मों से जुड़ने का कारण धाँसू फ़िल्मी "एक्शन" नहीं होते। गीत-संगीत या नाच-गाने भी उतने बड़े कारण नहीं होते, जितने बड़े— भारतीयों के समान ही— लैटिन अमेरिकियों के भी अपने पारंपरिक पारिवारिक रिश्ते होते हैं। वे भी अपने प्रियजनों के लिए सब कुछ करने की उत्कट कामना और दृढ़ निश्चय की प्रबल भावना से ओत-प्रोत होते हैं।
 
इस रुझान पर शोध करने वालों ने पाया कि भारतीय फ़िल्मों के लैटिन अमेरिकी दर्शकों की टिप्पणियों में जो एक बात-बार-बार मिलती है, वह है 50 लाख की जनसंख्या वाले मेक्सिको के गुआदालाख़ारा शहर की एक महिला का यह कहना कि "भारतीय पारिवारिवाक ड्रामा देखना स्क्रीन पर अपने ही परिवार को देखने जैसा लगा।" ब्राज़ील के शहर रियो दे जनेइरो के एक आदमी ने बताया कि एक हिंदी फ़िल्म में माँ की भूमिका उसे अपनी माँ की इतनी याद दिलाने लगी, कि फ़िल्म ख़त्म होते ही उसने अपनी माँ को फ़ोन किया। कोई फ़िल्म— वह भी बहुत दूर के देश भारत की कोई फिल्म ऐसा भी जुड़ाव प्रेरित कर सकती है— मनोरंजन की दुनिया में किसी ने कभी इसकी कल्पना ही नहीं की होगी। यह तो दो सर्वथा पृथक संस्कृतियों के सदियों बाद मिलन जैसा है। 

भारतीय फ़िल्मों का भावुकता पक्ष

भारतीय सिनेमा सदा से बहुत भावप्रवण रहा है। एक-दूसरे के सामने रोना-धोना, जब शब्द काफी न लगें तो गाने लगना और परिवार के भले के लिए जान देना उसकी पहचान रहा है। हॉलीवुड में इसे पुरातन, अतिरंजित और भावुकता-भरा माना जाता है। लेकिन, लैटिन अमेरिका में भावुकता-भरी कहानी सुनाना-सुनाना दुर्बलता नहीं है। लैटिन अमेरिकन सोप ऑपेरा, जो दशकों से टेलीविज़न पर छाए हुए हैं, ठीक इसी ढर्रे पर बने होते हैं— परम प्रेम, परम धोखा, परम त्याग— और अंत में सब- कुछ भुला कर पुनर्मिलन! लैटिन अमेरिकी दर्शकों ने जब पहली बार भारतीय फ़िल्में देखीं, तो उनमें घुली भावुकता उन्हें पूरी तरह से स्वाभाविक लगी। ऐसी कहानियों के वे आदी थे।
 
अधिकतर हॉलीवुड फ़िल्मों और सीरीज़ों में परिवार बहुत जटिलता-भरे होते हैं — माता है तो पिता नहीं, पिता है तो माता नहीं। भाई-बहन हैं तो उनमें पटती नहीं। हीरो घर से भाग जाता है। आदमी से ज्यादा कुत्ते-बिल्ली की पूछताछ है। भारतीय सिनेमा में परिवार ही हर चीज़ का केंद्र है। हीरो घर से भागता नहीं, घर बचाने के लिए लड़ता है। मां को पवित्र माना जाता है, पिता का आदर-सम्मना किया जाता है— भले ही माता-पिता किसी मामले में ग़लत ही क्यों न हों। भाई एक-दूसरे के लिए जान की बाज़ी लगा देते हैं। बहनों की हर क़ीमत पर रक्षा की जाती है। 

परिवार के प्रति समर्पण बार-बार खींचता है

यही सब लैटिन अमेरिकी संस्कृति का भी अंग है। परिवार के प्रति निष्ठा वहां भी सबसे मूल्यवान सामाजिक गुणों में से एक है। मेक्सिको सिटी में एक मीडिया रिसर्च ग्रुप के 2023 के अध्ययन में पाया गया कि लैटिन अमेरिकी दर्शकों ने, खासकर परिवार के प्रति समर्पण को वह मुख्य कारण बताया, जिससे प्रभावित होकर वे भारतीय फ़िल्मों के पास बार-बार वापस आते हैं।
 
लैटिन अमेरिकी फ़िल्म प्रेमियों को यह बात भी बहुत सुहाती है कि भारतीय फ़िल्मों में दीन-हीन और अभागे, या छोटे-मोटे गांवों के ग़रीब लड़के भी अपने कामों से कई बार कथा-कहानी बन जाते हैं। कोई लड़की अपने समाज को चुनौती देती है और जीत जाती है। कोई ईमानदार आदमी भ्रष्ट व्यवस्था से अकेले ही लड़ बैठता है और एक उदाहरण बन जाता है। दूसरी ओर, लैटिन अमेरिका में सामाजिक असामानता कहीं ज़्यादा और सरकारी विभागों पर लोगों का विश्वास उतना ही कम है।
 
हिंदी फिल्मों का हीरो जब एक भ्रष्ट राजनेता से कहता है कि वह उसे आगे बढ़ने से रोक नहीं सकता, तब कोलंबिया और मेक्सिको में यह सीन देख रहे लगों को लगता है कि वे वास्तव में कुछ ऐसा देख रहे हैं, जिसे वे अपने देशों में भी वास्विकता बनते देखना चाहते हैं।

भारतीय सभ्यता-संस्कृति का भी प्रचार हो रहा है

नेटफ्लिक्स, लैटिन अमेरिकी देशों में भारतीय फ़िल्में दिखा कर निश्चित रूप से खूब कमाई कर रहा है। पर, उसकी कमाई के बहाने से इन देशों में पहली बार भारत की सभ्यता और संस्कृति का प्रचार भी हो रहा है। वहां के दर्शकों की पसंद को जानने के लिए नेटफ्लिक्स ने जो "एल्गोरिदम" बनाया है, वह उन्हें बताया करता है कि किस फ़िल्म के दर्शक को आगे क्या पसंद आ सकता है। अगली बार, स्क्रीन पर उसी प्रकार की फ़िल्मों के नाम और नमूने, नए सुझाव के तौर पर दिखाई पड़ते हैं। दर्शक को बस केवल चुनना होता है।
 
उदाहरण के लिए, चिली की राजधानी सांतियागो में यदि किसी ने अभी-अभी एक मैक्सिकन ड्रामा देखा था, तो उसे अगली सुबह अपनी प्रथम पसंद के तौर पर नेटफ्लिक्स की किसी भारतीय फिल्म का नाम मिल सकता है। उसने न तो उस फ़िल्म को कभी खोजा था और न कभी उसका नाम सुना था, लेकिन उसने तब भी क्लिक किया और फ़िल्म चालू हो गई। नेटफ्लिक्स के एल्गोरिदम ने ही दर्शकों को भारतीय सिनेमा तक पहुंचाया और उससे परिचित कराया। इन नव-परिचितों ने टिकटॉक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया के माध्य से अपने मित्रों-परिचितों को अपना अनुभव बताया। इस तरह, एक के बाद एक, अनेक लैटिन अमेरिकी भारतीय फ़िल्मों के रसिया बनते गए।

भाषा कोई बाधा नहीं

सबसे बड़ा कमाल तो यह है कि भारतीय फ़िल्मों की लोकप्रियता में भाषा कोई बाधा नहीं बनी। लैटिन अमेरिकी दर्शक स्पेनिश सबटाइटल के साथ भारतीय, विशेषकर हिंदी फ़िल्में घंटों देखने के आदी हो गए लगते हैं। उनकी जो पीढ़ी सबटाइटल के साथ विदेशी फ़िल्में देखकर बड़ी हुई है, उसके लिए यदि कहानी अच्छी है, तो भाषा मायने नहीं रखती। मायने रखती है दर्शक की अपनी संवेदनशीलता।
 
नेटफ्लिक्स ने भारतीय फ़िल्मों को अब "फ़िलर" (खाली जगह भरने की युक्ति) मानना छोड़ दिया है। एक रणनिति के तौर पर अब उसने— विशेषकर लैटिन अमेरिकी दर्शकों को ध्यान में रखकर—मौलिक किस्म की फ़िल्मों की सीरीज़ दिखाना शुरू किया है। ऐसी कहानियों वाली फिल्मों को चुना जाने लगा है, जो भारतीय और लैटिन अमेरिकी संस्कृतियों को जोड़ती हों। घिसी-पिटी परंपराओं को नकारती हों। फ़िल्मों की स्पेनी सबटाइटलों की गुणवत्ता को और अधिक सुधारने के लिए ऐसे अनुवादकों पर ख़र्च किया जा रहा है, जो न केवल स्पेन की स्पेनिश समझते हैं, अपितु मेक्सिकन, कोलंबियन और ब्राज़ीलियन लहज़े वाली स्पेनिश की विशेषताओं से भी सुपरिचित हैं।

नेटफ्लिक्स ने प्रयोग किया, परिदृश्य तेज़ी से बदला

भारतीय फिल्म निर्माताओं ने दशकों तक पश्चिमी देशों में— विशेषकर अमेरिका और ब्रिटेन में— पैर जमाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें बहुत थोड़ी ही सफलता मिली। लैटिन अमेरिका उनके ध्यान में नहीं था। लेकिन, जब नेटफ्लिक्स ने यही प्रयोग किया, तो परिदृश्य तेज़ी से बदल गया। भारतीय फ़िल्मी सितारों ने स्पेनिश भाषा में इंटरव्यू तक देना शुरू कर दिया। नेटफ्लिक्स ने इसके लिए पहले लैटिन अमेरिकी सोशल मीडिया प्रेमियों के बीच अपनी पहुँच बनाई। उदाहरण के लिए, लैटिन अमेरिकी दर्शकों के लिए RRR के अभिनेता राम चरण की स्पेनी भाषा में एक छोटी-सी "वीडियो ग्रीटिंग" पोस्ट की। उस पर कुछ ही घंटों में लाखों लोगों की प्रतिक्रिय मिली।
 
नेटफ्लिक्स की इस अनोखी सफलता से पता चलता है कि भारतीय सिनेमा के लैटिन अमेरिकी रसिया निष्क्रिय उपभोक्ता नहीं हैं। वे यूट्यूब (YouTube) चैनलों पर बॉलीवुड फिल्मों की समीक्षा तक करने लगे हैं। हिंदी फिल्मों पर चर्चा करने वाली लाखों "फैन कम्युनिटीज़" बन गई हैं, जिन में लैटिन अमेरिका के हर देश के सदस्य हैं। अर्जेंटीना में एक महिला ने अपने शहर में "बॉलीवुड डांस क्लास" शुरू की है। वह सोच रही थी कि बहुत हुआ तो शायद 10-20 लोग सीखने आयेंगे, लेकिन पहले महीने में ही 200 से ज़्यादा लोगों ने आवेदन किया। ब्राज़ील में कुछ विश्वविद्यालयों के छात्र हिंदी सीख रहे हैं, क्योंकि वे हिंदी फ़िल्में को बिना सबटाइटल के हिंदी में ही देखना चाहते हैं।

भारतीय रेस्त्रां वालों का धंधा भी बढ़ा

लैटिन अमेरिकी देशों के बड़े शहरों में भारतीय रेस्त्रां भी पहली बार ग्राहकों की संख्या में अच्छी- खासी बढ़ोतरी देख रहे हैं। नए ग्राहक, नेटफ्लिक्स पर की किसी भारतीय फ़िल्म में दिखाई पड़े व्यंजनों को जानने और आज़माने के लिए आते रहते हैं। कहा जा सकता है कि नेटफ्लिक्स द्वारा लैटिन अमेरिका में दिखाई जा रही भारतीय फ़िल्मों के माध्यम से वहाँ के समाजों में एक नया सांस्कृतिक बदलाव आ रहा है।
 
मार्च 2023 में, तेलुगु फ़िल्म RRR के गाने "नाटु—नाटु" को ऑस्कर पुरस्कार मिलना लैटिन अमेरिका में लाखों लोगों ने लाइव देखा; इसलिए कि वे इस फ़िल्म और गाने को पहले से ही देख-सुन और शेयर कर चुके थे, खूब नाच-गा चुके थे। ऐसा लगता था, मानो कथा-कहानियों की रसिक दुनिया की दो महान संस्कृतियां एक-दूसरे को ढूँढ रही थीं, और अब उनका मिलन हो रहा है।
 
जानकार कहते हैं कि भारत से हज़ारों किलोमीटर दूर, स्पेनिश भाषी लैटिन अमेरिकी देशों में भारतीय — बल्कि मुख्यतः हिंदी सिनेमा देखने की लहर— इसलिए नहीं पैदा हो गई कि भारतीय फिल्में हर दृष्टि से परिपूर्ण या असाधारण होती हैं। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि दो संसकृतियों ने एक-दूसरे की कथा-कहानियों को देखा-सुना, जाना-पहचाना और पाया कि उनके बीच कई समानताएँ हैं। एक बार जब ऐसी जान-पहचान जड़ पकड़ लेती है, तो कोई एल्गोरिदम इसे रोक नहीं सकता। हो सकता है कि लैटिन अमेरिका पर बॉलीवुड का जादू अभी लंबे समय तक चले।
लेखक के बारे में
राम यादव
राम यादव डायचे वेले हिन्दी (जर्मनी) के पूर्व प्रमुख हैं। देश-विदेश की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक घटनाक्रम पर इनकी अच्छी पकड़ है। आधी सदी से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता एवं लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। .... और पढ़ें
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