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  4. what about house husbands A major question arising from the Supreme Court verdict

घर संभालने वाली महिलाओं को 30 हजार; पर 'हाउस हसबैंड्स' का क्या?

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: गृहिणियां अब 'नेशन बिल्डर्स'

Homemakers
11 जून 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने मोटर वाहन दुर्घटना दावा मामलों में एक क्रांतिकारी फैसला सुनाया है। कोर्ट ने गृहिणियों (Homemakers) को "नेशन बिल्डर्स" (राष्ट्र निर्माता) का दर्जा देते हुए उनके घरेलू योगदान (Loss of Domestic Care) के लिए न्यूनतम 30,000 मासिक की नोशनल इनकम (Notional Income) तय कर दी है। यह सिर्फ एक मुआवजा नहीं, बल्कि एक बड़ा सामाजिक बदलाव है:

10% की बढ़ोतरी: यह तय राशि हर तीन साल में 10% बढ़ेगी।

अतिरिक्त लाभ: अगर कोई महिला कामकाजी (Working Woman) भी है, तो यह राशि उसकी सैलरी के अतिरिक्त जोड़ी जाएगी।

फैसले की इनसाइड स्टोरी: क्यों बदलना पड़ा पुराना नियम?
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने 2001 के एक पुराने मामले पर सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक सिद्धांत स्थापित किया।

कोर्ट की तीखी टिप्पणी: "यह बेहद विडंबनापूर्ण है कि गृहिणी को कमाने वाले सदस्यों पर निर्भर माना जाता है, जबकि हकीकत यह है कि पूरा घर उन्हीं के दम पर चलता है। सच तो यह है कि बाहर कमाने वाले सदस्य खुद गृहिणी पर निर्भर होते हैं।"

पहले अदालतों में गृहिणियों के काम को 'अकुशल श्रम' (Unskilled Labour) मानकर महज 3,000 जैसी मामूली रकम पर मुआवजा आंका जाता था। कोर्ट ने साफ किया कि महिलाएं देश की GDP में 15-17% का अनपेड योगदान देती हैं और पुरुषों से कहीं ज्यादा वक्त घर के कामों में बिताती हैं।

क्या है 'Loss of Domestic Care' का नया फॉर्मूला?
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह 30,000 एक 'बेसिक मिनिमम' (Stand-in) है। अब मुआवजे की गणना में 'घरेलू देखभाल का नुकसान' एक अलग हेड होगा, जिसके तहत निम्नलिखित को शामिल किया जाएगा:

घर का सुचारू संचालन और प्रबंधन।
बच्चों की मातृत्व देखभाल (Maternal Care)।
जीवनसाथी (Spouse) को मानसिक और व्यावहारिक समर्थन।

सकारात्मक पहलू: यह फैसला सदियों से अदृश्य रहे महिलाओं के घरेलू श्रम को आर्थिक मूल्य और सम्मान देता है। ग्रामीण और मध्यम वर्ग के परिवारों को दुर्घटना के वक्त इससे बहुत बड़ी आर्थिक सुरक्षा मिलेगी।

ओपिनियन: 'माई लॉर्ड'... पुरुष गृहस्थों (House Husbands) का ख्याल कौन रखेगा?

फैसले की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि कोर्ट ने माना कि 'Homemaker' शब्द सुनते ही अक्सर महिला की छवि दिमाग में आती है, लेकिन पुरुष भी इस भूमिका में हो सकते हैं—चाहे मर्जी से या मजबूरी से। कोर्ट ने पुरुष होममेकर्स के प्रयासों की सराहना तो की, लेकिन पूरा फैसला पारंपरिक ढांचे (यानी महिला होममेकर) पर ही केंद्रित रहा। 

यहाँ एक बड़ा सवाल उठता है: क्या कानून और मुआवजे का यह सिद्धांत 'जेंडर-न्यूट्रल' नहीं होना चाहिए?

बदलते भारत की हकीकत: आधुनिक भारत में 'रोल रिवर्सल' तेजी से बढ़ रहा है। आज कई पुरुष अपनी पत्नी के करियर को उड़ान देने के लिए खुद पूर्णकालिक (Full-time) घर संभालते हैं—बच्चों की परवरिश, खाना बनाना, सफाई और बजट संभालना। हालांकि सोशल मीडिया पर इस फैसले के बाद सवाल उठाए जा रहे हैं कि शीर्ष अदालत का यह फैसला उन पुरुषों पर भी लागू होना चाहिए, जो होममेकर की भूमिका में कामकाजी पत्नी की अनुपस्थिति में पूरा घर संभालते हैं।  

भेदभाव क्यों?: अगर एक पुरुष गृहस्थ की दुर्घटना में मौत होती है, तो उसे सिर्फ 'आश्रित' (Dependent) मानकर कम मुआवजा देना न्यायसंगत नहीं है। जो योगदान एक महिला का है, वही योगदान उस पुरुष का भी है।

रूढ़िवादिता तोड़ना जरूरी: सुप्रीम कोर्ट ने 2021 और 2024 के फैसलों में भी पत्नी के घरेलू काम को पति के ऑफिस वर्क के बराबर माना था। अब समय आ गया है कि इस समानता को दोनों दिशाओं (महिला और पुरुष) में समान रूप से लागू किया जाए।

चुनौतियां और आगे की राह
चुनौती: इस फैसले को जमीनी स्तर पर लागू करने में एकरूपता (Consistency) लाना सबसे बड़ा काम होगा। इसके लिए मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल्स (MACT) को विशेष ट्रेनिंग और गाइडलाइंस देनी होंगी।

सुझाव: भविष्य में अदालतों को 'हाउस हसबैंड्स' के अधिकारों को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित करना होगा। इसके अलावा, होममेकर्स (चाहे महिला हो या पुरुष) के लिए सिर्फ मौत के बाद मुआवजे तक बात सीमित न रहे, बल्कि उनके लिए सामाजिक सुरक्षा और पेंशन जैसी योजनाएं भी सोची जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का यह कदम बेहद प्रगतिशील और सराहनीय है। यह राष्ट्र निर्माण में घरेलू श्रम की गरिमा को पहचान देता है। लेकिन सच्ची समानता तभी आएगी, जब 'घर संभालने वाले' के जेंडर को दरकिनार कर, उसके काम को समान आर्थिक और सामाजिक मूल्य दिया जाएगा। उम्मीद है कि 'माई लॉर्ड' अगली बार हाउस हसबैंड्स की इस अदृश्य मेहनत पर भी न्याय की मुहर लगाएंगे। कानून का यह सफर तभी पूर्ण होगा! 
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