त्रेता से लेकर कलयुग तक कहानी चरण पादुका की
चरण पादुका खड़ाऊं/चट्टी इन दिनों चर्चा में है। लोग कह रहे हैं। एक था त्रेता युग, जिसमें भरत जी ने अपने बड़े भाई और देश दुनिया के करोड़ों लोगों के आराध्य प्रभु श्रीराम की चरण पादुका को सार्वजनिक रूप से अयोध्या के राजसिंहासन पर सहेज कर रखा था। एक कलियुग है, जिसमें कथित रामभक्तों ने उनकी चांदी की चरण पादुका को ही चंपत कर दिया। इसी बहाने मुझे अपने स्वर्गीय पिताजी की चरण पादुका की कहानी याद आ गई। पेश है अम्मा से सुनी बाबूजी के चरण पादुका की कहानी।
बाबूजी की चरण पादुका की विदाई
इस विदाई की कहानी यूं है। भैया ने कोई बदमाशी की। बाबूजी को गुस्सा आ गया। उन्होंने अपनी चट्टी निकाली और भाई साहब को धुन दिया। उसके बाद वह ऑफिस चले गए। पिताजी शांत स्वभाव के थे। मैंने उनको कभी किसी से तेज आवाज में बात करते और झगड़ते नहीं देखा था। मारना पीटना तो दूर की बात। कभी पिटाई भी की तो मुद्दा पढ़ाई का ही था। वह गांव के पहले ग्रेजुएट थे। तब गोरखपुर में अभी यूनिवर्सिटी की स्थापना नहीं हुई थी। जिस सेंटएंड्रूज कॉलेज से उन्होंने ग्रेजुएशन किया था वह आगरा यूनिवर्सिटी से एफिलिएटेड था।
जिस समय की घटना का मैं जिक्र कर रहा हूं, उस समय पिताजी गोरखपुर के रेल कारखाने में काम कर रहे थे, लेकिन मूल रूप से वह शिक्षक थे। ककरही इंटर कॉलेज के केशभान राय उनके गुरु और आदर्श थे। केशभान राय अपने जमाने के बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे। बाद में वह विधायक और प्रदेश के शिक्षा मंत्री भी बने। उनकी प्रेरणा से पिताजी ने कुछ दिनों तक ककरही में शिक्षण कार्य भी किया। इसलिए वह पढ़ाई लिखाई में कोताही करने पर कभी-कभी गुस्सा करते थे। हालांकि हम भाइयों पर सरस्वती की इतनी कृपा थी कि उनको यह अवसर बहुत ही कम मिलता था।
लौटते हैं चट्टी की ओर। भैया को चट्टी से पिटाई का काफी मलाल था। पिताजी के ऑफिस जाने के बाद उन्होंने अपनी पूरी खीस चट्टी पर निकालने की सोची। कुछ इस तरह कि "न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी"। उन्होंने धीरे से सीढ़ी वाले कमरे से एक हाथ से दोनों चट्टियों को उठाया और दूसरे हाथ से कुल्हाड़ी। गली में ले जाकर चट्टी को चीरा और फेंक दिया।
अम्मा चट्टी से पिटाई और उसकी चिराई की चश्मदीद थीं। उन्हें बाबूजी की चट्टी,चट्टी के हश्र की कहानी और उससे सुनकर बाबूजी के गुस्से और नतीजे की चिंता थी। बाबूजी ऑफिस से आए। हाथ मुंह धुलकर गुड़ की एक डली खाई और लौटे से पानी पीकर तृप्ति की एक लंबी सांस ली। अम्मा फिक्रमंद थीं। कहीं चट्टी के बारे में पूछ लिया तो क्या होगा।
बाबूजी ने अम्मा से कहा...गायत्री, सुनो! मुझे मुन्ना के प्रति अपने सुबह के व्यवहार के प्रति अफसोस है। मैंने संकल्प लिया है कि आज से कभी चट्टी नहीं पहनूंगा। अम्मा की फिक्र दूर हुई। उन्होंने फिर चट्टी के हश्र के बारे में बताया। पिताजी ने निर्विकार भाव से सुना और कहा अब जब उसे पहनना ही नहीं है तो उसके बारे में क्या सोचना।
इस तरह से मेरे घर से चट्टी की विदाई हुई। और धीरे धीरे रबर की चप्पलों की इंट्री हुई। हालांकि बचपन में मैंने भी चट्टी पहनी है। पर कभी उसकी मार नहीं खाई। हां जिस तरह की पकी हुई लकड़ी से चट्टी बनती है। और उसमें जो मजबूती होती है उसे देखकर उससे मार खाने से चोट का अहसास तो किया ही जा सकता है। सर पर अगर कायदे से लग जाए तो उसका फटना तय है। वैसे भी बचपन में बड़े बुजुर्गों को कई बार कहते सुना कि चट्टी से मार-मार कर सीधा कर दूंगा। इससे इसकी मारक क्षमता का अंदाजा लगता है। मुझे तो लगता है कि चट्टी की मार से ही 'छठी के दूध' वाले मुहावरे का जन्म हुआ। तभी तो लोग कहते हैं कि इतना मारूंगा कि छठी के दूध की याद आ जाएगा।
खैर यह शोध की बात है। चट्टी से खड़ाऊ का क्या रिश्ता है? पता नहीं पर दोनों की तली लकड़ी की होती थी। मारक क्षमता इसकी चट्टी से अधिक रही होगी। क्योंकि यह दोनों ओर से बराबर से चोट करने में सक्षम थी। शायद इसी कारण इसे संस्कारों और पवित्रता से जोड़ दिया गया। अमूमन इसे पुजारी या पण्डिजी लोग ही पहनते थे। जनेऊ के समय जिनका जनेऊ होता है वह बटुक भी। खड़ाऊ का पूजन भी होता है। भरत जी ने भगवान श्री राम के खड़ाऊ को पूजते-पूजते अयोध्या का राज काज संभाले रखा। इसलिए खड़ाऊ से हिंसा के उदाहरण कम मिलते हैं।
अलबत्ता बाद में आए जूते, चप्पलें और सैंडिलों के मार का जिक्र कभी कभी जरूर होता रहता है। इनके साथ सुविधा यह है कि इनको हाथ में लेकर भी किसी पर बजा सकते हैं या फेंककर भी मार सकते हैं। जिसको मार रहे हैं उसको लगे या न लगे अगर वह हैसियत वाला है तो मारने वाला साधारण या फटा जूता भी चलाकर भरपूर सुर्ख़ियों में आ जाएगा। हाल के दिनों में एक और चीज चलन में आई है। जिसने जूता मारा उसे भले न पता हो, पर मारने के तुरंत बाद गिनने वाले तुरंत बता देंगे कि इतने सेकंड में इतने जूते मारे। यह अगले की मारक क्षमता का प्रमाण होता है। चट्टी को इस बात का जरूर अफसोस होगा कि काश! मेरे जमाने में भी ऐसा होता।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala
Edited by: Vrijendra Singh Jhala

