क्या नेपाल में आई प्रलयंकारी बाढ़ के पीछे जलवायु परिवर्तन की निर्णायक भूमिका रही? रिसर्च में बड़ा खुलासा
Nepal Flash Floods Climate Change Impact: हिमालय की गोद में बसे नेपाल में अचानक आई प्रलयंकारी बाढ़ (फ़्लैश फ़्लड) के कारणों के गहन अध्ययन पर आधारित एक नई रिपोर्ट का कहना है कि इस आपदा में जलवायु परिवर्तन की भूमिका, शुरुआती अनुमान से कहीं ज़्यादा थी। जांच के दौरान पता चला कि एक ऐसी ही बहुत कम जानी-पहचानी घटना यूरोप के आल्प्स पर्वतों में भी हो सकती है।
वैज्ञानिक हफ़्तों तक इस बात को लेकर उलझन में थे कि नेपाल की 7,000 मीटर से ऊंची चोटी "लांगतांग लिरुंग" के उत्तरी हिस्से में चट्टानें गिरने की घटना किस वजह से हुई? भारी मात्रा में बहे उस पानी का स्रोत क्या था, जिसके कारण वहां विनाशकारी बाढ़ आई? नेपाल सरकार ने, मानवीय गतिविधियों के कारण हो रहे जलवायु परिवर्तन को इस आपदा के लिए पहले ही ज़िम्मेदार ठहराया दिया था—हालांकि इसमें जलवायु परिवर्तन की सटीक भूमिका अब तक साफ़ नहीं थी। ALSO READ: भीषण गर्मी और जंगल की आग से झुलसता यूरोप, 40 डिग्री के पार हो सकता है तापमान
कई कारणों का मिलाजुला परिणाम
"वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन" (WWA) नाम के संगठन ने अब इस आपदा के कारणों पर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है। उसका कहना है, "यह हिमालय पर्वत का एक ऐसा हिस्सा था, जो भूवैज्ञानिक रूप से कमज़ोर था और 2015 में आए भूकंप के कारण शायद और भी कमज़ोर हो गया था।"
नीदरलैंड के उटरेश्त विश्वविद्यालय के जलवायुविद वाल्टर इमर्ज़ील, जो इस अध्ययन में शामिल थे, बताते हैं कि ग्लेशियर के पीछे हटने, पर्माफ़्रोस्ट (चिर या स्थायी तुषार-भूमि) के तथा बर्फ़ के पिघलने से बहुत ज़्यादा मात्रा में पानी बनने और साथ ही बाढ़ से ठीक पहले पड़ी भीषण गर्मी की वजह से यह हिस्सा अस्थिर हो गया था।
पर्माफ़्रोस्ट ज़मीन की ऐसी परत को कहते हैं, जो लगातार कम-से-कम दो वर्षों तक पानी के जमने के तापमान (0° सेल्सियस या 32° फ़ारेनहाइट) से कम तापमान पर जमी रहती है। इस स्थिति में मिट्टी, रेत, बजरी और जैविक पदार्थ बर्फ के साथ मिलकर इतने सख़्त हो जाते हैं कि ज़मीन पत्थर या सीमेंट जैसी कठोर बन जाती है। ALSO READ: क्या विनाशकारी सिद्ध होगा इस बार एल नीन्यो?
चट्टान-स्खलन से पहले असामान्य अधिक तापमान
पृथ्वी पर हमारी रहन-सहन से, विशेषकर औद्योगीकरण शुरू होने के बाद से, हिमालयी ऊँचाइयों पर तापमान औसतन लगभग 1.5 डिग्री बढ़ गया है। WWA की रिपोर्ट के अनुसार, इसके कारण पहाड़ों पर की वह ऊँचाई, जहाँ तापमान पहले शून्य से भी कहीं नीचे, यानी ऋणात्मक (— माइनस) डिग्री तक गिर जाता था — वह ऊँचाई अब मानसून और मानसून के बाद के मौसमों के हर दशक में 100 मीटर और ऊपर उठती गई है। दूसरे शब्दों में, उदाहरण के लिए आज से 10 साल पहले हिमालय पर्वत पर जमी बर्फ, दूर से देखने पर यदि 700 मीटर की ऊँचाई पर ही दिखाई पड़ने लगती थी, तो जलवायु परिवतर्न के कारण अब वह शायद 800 या 900 मीटर की ऊँचाई के बाद ही शुरू होती लगती है।
घटती बर्फ वाला यह बदलाव अब हिमालय के उन और अधिक ऊपरी हिस्सों तक जा कर फैलता गया है, जहाँ कभी हमेशा "चिरकालिक बर्फ़" (eternal ice) हुआ करती थी, जिसमें ग्लेशियर और जमी हुई पर्माफ़्रोस्ट मिट्टी भी शामिल है। ग्लेशियर, सघन बर्फ का एक ऐसा बहुत बड़ा भंडार होता है जो साल-दर-साल बर्फ के जमने और उसके संपीड़ित, यानी ठोस होने से बनता है।
ग्लेशियरों का सरकना-फिसलना असामान्य गर्मी का परिणाम अपने भारी वजन और गुरुत्वाकर्षण बल के कारण बर्फ का यह विशाल ढेर पर्वतीय ढालानों या घाटियों से नीचे की ओर बहुत धीमी गति से सरकता या फिसलता है। हिमालयी चट्टानों के टूटने और घाटियों की तरफ लुढ़कने का जो रंगढंग इस साल दिखा, वह पहले कभी की अपेक्षा असामान्य गर्मी का परिणाम था। उससे ठीक पहले के दो महीने इस इलाके में अब तक के सबसे गर्म महीने दर्ज किए गए थे।
"वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन" के वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन ने इस सारे घटनाक्रम में एक बड़ी भूमिका निभाई है। जर्मनी में बवेरियन विज्ञान अकादमी के ग्लेशियर-विद, क्रिस्टोफ़ मायर WWA रिपोर्ट के नतीजों का सारांश यह बताते हैं कि "इस बात के प्रबल संकेत हैं कि जलवायु परिवर्तन वास्तव में एक अहम भूमिका निभा रहा है। हम एक ऐसे ऊँचाई वाले इलाके की बात कर रहे हैं, जहाँ जलवायु के कारण पर्माफ़्रोस्ट पिघल रहा है और ग्लेशियर का पिघलना कम या मध्यम स्तर से बढ़कर तेज़ी से पिघलने में बदल रहा है।" इसका यही अर्थ है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण, गर्मियों के गर्म महीनों में वहाँ पहले कभी की तुलना में अब कहीं अधिक पानी जमा होता है।
चट्टानों से भी पानी निकला
हिमालयी ऊँचाई पर भी बढ़ते तापमान के कारण, बर्फ़ जमने के बदले अब अधिकतर बरसात होने लगी है। बर्फ़ के तौर पर ग्लेशियर पर जमने और दशकों या सदियों बाद बर्फ़ में बदलने के बजाय, पानी अब बर्फ़ के नीचे मौजूद चट्टानों की दरारों में रिस जाता है और वहाँ जमा होने लगता है।
पिघलती हुई पर्माफ्रॉस्ट से निकला पानी भी चट्टानों के अंदर जमा होता जाता है, जिससे उन पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। WWA के अध्ययन के अनुसार, इन सब चीज़ों ने मिलकर पहाड़ के कई हिस्सों को अस्थिर कर दिया, जिससे अंतत: प्रलय जैसा हाहाकार मच गया।
यह एक नई खोज है कि चट्टानों के भीतर ही काफ़ी मात्रा में पिघला हुआ बर्फीला पानी जमा हो सकता है; इसका असर यूरोप की आल्प्स पर्वतमाला में निहित खतरों की निगरानी के तरीके पर भी पड़ सकता है। आल्प्स पर्वतमाला यूरोप के 8 देशों ऑस्ट्रिया, जर्मनी, फ्रांस, मोनाको, इटली, स्विट्ज़रलैंड, लीश्तेनस्टाइन और स्लोवेनिया तक फैली हुई है। जर्मनी के क्रिस्टोफ़ मायर बताते हैं, "हमें अब इसे निश्चित रूप से और अधिक बारीकी से देखने की ज़रूरत है; हालाँकि पानी के असर के बारे में पहले से पता था, लेकिन नेपाल में इस विभीषिका का जो स्तर देखा गया, वह अभूतपूर्व था।"
WWA रिपोर्ट साफ़ तौर पर दिखाती है कि यदि हिमालय की ऊँचाइयों पर भी तापमान बढ़ने की रुझान न होती, तो यह आपदा इतनी तेज़ी से नहीं आती— या शायद इतने बड़े पैमाने पर नहीं होती। साथ ही, नेपाल में आई आपदा इस बात पर भी बल देती है कि ऊँचे पहाड़ों वाले नाज़ुक इलाकों में मनुष्यों की वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को अभी भी पूरी तरह से समझा नहीं गया है। इस कारण भविष्य में हमें इस तरह की और अधिक बढ़ती हुई आपदाएं झेलनी पड़ सकती हैं।

