नीम करोली बाबा ने जब खाली LSD की गोलियां, रिचर्ड अल्बर्ट क्यों बुरी तरह घबरा गए?
नेब्रास्का विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के प्रोफेसर रहे रिचर्ड अल्बर्ट और नीम करोली बाबा के बीच एलएसडी (LSD) को लेकर हुआ यह वाकया काफी प्रसिद्ध और दिलचस्प है। यह घटना मुख्य रूप से 1967 की है, जब रिचर्ड अल्बर्ट अपने आध्यात्मिक गुरु की खोज में पहली बार भारत आए थे। वे अपने आनंद के लिए ड्रग्स लेते थे।
1. एलएसडी और अल्बर्ट
भारत आने से पहले रिचर्ड अल्बर्ट और उनके साथी प्रोफेसर तिमोथी लेरी (Timothy Leary) ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में एलएसडी जैसे साइकेडेलिक (चेतना विस्तारक) पदार्थों पर काफी शोध किया था।
अल्बर्ट का मानना था कि एलएसडी के सेवन से इंसान को कुछ समय के लिए समाधि या उच्च चेतना (Higher Consciousness) जैसा अनुभव होता है। हालांकि, उनका एक सवाल था कि क्या कोई ऐसा माध्यम या व्यक्ति है जो बिना किसी दवा के हमेशा के लिए इस उच्च चेतना की स्थिति में रह सके? इसी सवाल का जवाब ढूंढने वे भारत आए थे।
2. नीम करोली बाबा से पहली मुलाकात और घटना
कैंची धाम (नैनीताल, उत्तराखंड) में जब रिचर्ड अल्बर्ट नीम करोली बाबा से मिले, तो वे महाराज जी के प्रति गहराई से आकर्षित हुए। लेकिन उनके मन में वैज्ञानिक शंकाएं भी थीं। एक दिन नीम करोली बाबा ने अचानक अल्बर्ट से पूछा- "क्या तुम्हारे पास वह दवा है?"
रिचर्ड अल्बर्ट चौंक गए कि आखिर बाबा को कैसे पता की उनके बाद कोई गोलियां हैं। अल्बर्ट ने पास उस समय एलएसडी की अत्यधिक शक्तिशाली गोलियां थीं। उन्होंने बाबा जी को एलएसडी की एक खुराक (जो एक सामान्य इंसान के लिए बहुत ज्यादा थी) दिखाई। महाराज जी ने मुस्कुराते हुए उनसे वह गोलियां ले लीं और एक साथ 3 खुराक (लगभग 900 माइक्रोग्राम) अपने मुंह में डाल लीं।
यह देखकर रिचर्ड अल्बर्ट खबरा गए। क्योंकि एक सामान्य व्यक्ति के लिए 100 से 200 माइक्रोग्राम ही अत्यधिक शक्तिशाली और दिमाग को पूरी तरह प्रभावित करने के लिए काफी होता है। 900 माइक्रोग्राम किसी साधारण इंसान को मानसिक रूप से विचलित, बेहद बीमार कर सकता थी या कोमा में ले जा सकती थी।
3. घटना का परिणाम और रामदास का अनुभव
रामदास बेहद घबरा गए। उन्हें लगा कि महाराज जी को कुछ हो जाएगा, अब उनका दिमाग फट जाएगा या उनकी तबीयत बुरी तरह बिगड़ जाएगी। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। लेकिन वे देख रहे थे। वे काफी देर तक नीम करोली बाबा के चेहरे के हाव-भाव और शरीर की हरकतों को ध्यान से देखते रहे। उन्हें लगा कि जब बात बिगड़ेगी तब शायद कुछ करना होगा।
कोई प्रभाव नहीं: पूरा दिन बीत गया, लेकिन नीम करोली बाबा पर उस अत्यधिक शक्तिशाली एलएसडी का कोई असर नहीं हुआ। वे सामान्य रूप से बात करते रहे, हंसते रहे और अपनी दिनचर्या में लगे रहे। उन पर गोलियों का जरा भी असर नहीं हुआ।
बाबा जी का संदेश: बाबा जी ने अल्बर्ड के मनोभावों को समझ लिया और बाद में महाराज जी ने हंसते हुए अल्बर्ट से कहा कि यह दवा इंसान को कुछ समय के लिए तो उस दुनिया की झलक दिखा सकती है, लेकिन यह हमेशा के लिए वहां नहीं रोक सकती। ईश्वर या उच्च चेतना को पाने का असली तरीका प्रेम, भक्ति और ध्यान है, न कि कोई बाहरी रसायन। बाहरी चीजों का कोई महत्व नहीं है। नशा करना हो तो रामनाम का नशा करो।
4. घटना का महत्व और बदलाव
रिचर्ड अल्बर्ट पर इस घटना का ऐसा प्रभाव हुआ कि वह फिर समझ गए कि कोई और भी चीज है तो चेतना के स्तर को परम आनंद में ले जाती है। बस फिर क्या था रिचर्ड अल्बर्ट रामदास बन गए और तब उन्हें अपने सवाल का जवाब मिल गया। उन्हें समझ आ गया कि जिस चेतना को वे दवाओं के जरिए छूने की कोशिश कर रहे थे, नीम करोली बाबा जैसे संत उस अवस्था में स्वाभाविक और स्थायी रूप से रहते थे।
इस वाकये के बाद रामदास ने साइकेडेलिक दवाओं पर अपनी निर्भरता पूरी तरह छोड़ दी और भक्ति योग तथा ध्यान के मार्ग पर चल पड़े। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "Be Here Now" में इस घटना का विस्तार से जिक्र किया है, जिसने 1970 के दशक में पश्चिमी दुनिया के लाखों युवाओं को भारतीय अध्यात्म और नीम करोली बाबा की ओर आकर्षित किया था।
।। श्रीरामदूत हनुमान।।

