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तुलसीदास जयंती 2026: जब हनुमानजी ने 4 बार और प्रभु श्रीराम ने 3 बार दिए थे दर्शन, जानें अद्भुत प्रसंग

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गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती हर वर्ष श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में तुलसीदास जयंती 20 अगस्त 2026 (गुरुवार) को मनाई जाएगी। तुलसीदास जी प्रभु श्रीराम के परम भक्त थे। मान्यता है कि उनकी निश्चल भक्ति से प्रसन्न होकर हनुमान जी और स्वयं प्रभु श्रीराम ने उन्हें दर्शन दिए थे। आइए जानते हैं तुलसीदास जी को मिले इन दिव्य दर्शनों की कथा:
 

1. हनुमान जी का प्रथम दर्शन (चित्रकूट का मार्ग)

तुलसीदास जी के मन में प्रभु श्रीराम के दर्शन की तीव्र लालसा थी। वे काशी के संकट मोचन मंदिर और असी घाट के पास निवास करते हुए श्रीराम की भक्ति में लीन रहते थे।
 
प्रेत द्वारा संकेत: पौराणिक कथा के अनुसार, तुलसीदास जी प्रतिदिन एक वृक्ष की जड़ में जल चढ़ाया करते थे। उस वृक्ष पर रहने वाले एक प्रेत ने उनकी सेवा से प्रसन्न होकर उनसे वरदान मांगने को कहा। तुलसीदास जी ने केवल श्रीराम के दर्शन की इच्छा जताई।
 
वृद्ध का रूप: प्रेत ने बताया कि वह स्वयं भगवान के दर्शन नहीं करा सकता, लेकिन उसने उपाय बताया कि श्रीराम कथा में सबसे पहले आने वाले और सबसे अंत में जाने वाले वृद्ध कोढ़-ग्रस्त व्यक्ति ही हनुमान जी हैं।
 
हनुमान जी के दर्शन: अगले दिन कथा के समय तुलसीदास जी ने उस वृद्ध के चरण पकड़ लिए। हनुमान जी ने अपने असली रूप में प्रकट होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि उन्हें चित्रकूट में भगवान श्रीराम के दर्शन प्राप्त होंगे।
 

2. हनुमान जी का द्वीतीय दर्शन:

इसके बाद एक बार चित्रकूट पर श्रीराम एक बालक के लिए में तुलसीदासजी के समक्ष आए तब तोता बनकर हनुमान जी ने दोहा पढ़ा था: 
'चित्रकूट के घाट पै, भई संतन के भीर।
तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर।।'
 

3. हनुमान जी का तृतीय दर्शन:

श्रीरामचरित मानस लिखने के दौरान तुलसीदासजी ने लिखा-
सिय राम मय सब जग जानी;
करहु प्रणाम जोरी जुग पानी!
अर्थात 'सब में राम हैं और हमें उनको हाथ जोड़कर प्रणाम करना चाहिए।'
 
यह लिखने के उपरांत तुलसीदासजी जब अपने गांव की तरफ जा रहे थे तो किसी बच्चे ने आवाज दी- 'महात्माजी, उधर से मत जाओ। बैल गुस्से में है और आपने लाल वस्त्र भी पहन रखा है।'
तुलसीदासजी ने विचार किया कि हूं, कल का बच्चा हमें उपदेश दे रहा है। अभी तो लिखा था कि सब में राम हैं। मैं उस बैल को प्रणाम करूंगा और चला जाऊंगा।
पर जैसे ही वे आगे बढ़े, बैल ने उन्हें मारा और वे गिर पड़े। किसी तरह से वे वापस वहां जा पहुंचे, जहां श्रीरामचरित मानस लिख रहे थे। सीधे चौपाई पकड़ी और जैसे ही उसे फाड़ने जा रहे थे कि श्री हनुमानजी ने प्रकट होकर कहा- तुलसीदासजी, ये क्या कर रहे हो?
तुलसीदासजी ने क्रोधपूर्वक कहा, यह चौपाई गलत है और उन्होंने सारा वृत्तांत कह सुनाया। 
हनुमानजी ने मुस्कराकर कहा- चौपाई तो एकदम सही है। आपने बैल में तो भगवान को देखा, पर बच्चे में क्यों नहीं? आखिर उसमें भी तो भगवान थे। वे तो आपको रोक रहे थे, पर आप ही नहीं माने।
 

4. हनुमान जी का चतुर्थ दर्शन:

तुलसीदासजी को हनुमानजी ने अकबर की कैद से मुक्ति कराया था। मुक्त होने के लिए तुलसीदासजी ने कैद में ही हनुमान चालीसा का पाठ किया था। कहते हैं कि बाद में हनुमानजी ने तुलसीदाजी के सामने प्रकट होकर कहा कि, तुमने मेरे प्रति जो स्तुति पढ़ी है, वह अद्भुत है। आज के बाद जो भी यह चालीसा बढ़ेगा में उस राम भक्त की रक्षा के लिए उपस्थित हो जाऊंगा। इस चालीसा को हनुमान चालीसा के नाम से जाना जाएगा। 
 
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1. प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण जी के दर्शन

हनुमान जी के निर्देशानुसार तुलसीदास जी चित्रकूट के रामघाट पर रहने लगे। यहाँ उन्हें दो बार प्रभु श्रीराम के दर्शन प्राप्त हुए:
पहला दर्शन (घोड़े पर सवार राजकुमार):
चित्रकूट के वनों में भ्रमण करते समय तुलसीदास जी ने दो सुंदर राजकुमारों को घोड़ों पर सवार होकर धनुष-बाण लिए जाते देखा। वे अत्यंत तेजस्वी थे, लेकिन तुलसीदास जी उन्हें पहचान नहीं पाए। बाद में हनुमान जी ने उन्हें बताया कि वे स्वयं भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी थे। तुलसीदास जी को अपने न पहचान पाने पर बड़ा पश्चाताप हुआ।
 

2. दूसरा दर्शन (चंदन घिसने का प्रसिद्ध प्रसंग):

हनुमान जी ने तुलसीदास जी को सांत्वना दी और पुनः दर्शन का आश्वासन दिया। संवत 1607 की मौनी अमावस्या के दिन तुलसीदास जी रामघाट पर चंदन घिस रहे थे।
तभी बालक रूप में भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी उनके पास आए और बोले- "बाबा! हमें चंदन लगा दो।"
तुलसीदास जी बालक रूपी श्रीराम की अलौकिक छवि को देखकर भाव-विभोर हो गए और फिर से पहचान नहीं पाए। तब तुलसीदास जी को सचेत करने के लिए हनुमान जी ने तोते का रूप धारण किया और यह प्रसिद्ध दोहा पढ़ा:
 
चित्राकूट के घाट पर, भई सन्तन की भीर।
तुलसीदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥
 
यह दोहा सुनते ही तुलसीदास जी समझ गए कि स्वयं प्रभु श्रीराम सामने खड़े हैं। वे प्रभु के चरणों में गिर पड़े। श्रीराम ने तुलसीदास जी के माथे पर तिलक लगाया और स्वयं तुलसीदास जी के हाथ से अपने माथे पर तिलक लगवाया। इस प्रकार तुलसीदास जी को प्रभु श्रीराम के साक्षात दर्शन का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ।
 

3. तीसरी बार तुलसीदासजी ने किए प्रभु श्रीराम के दर्शन:

कुछ लोग जगन्नाथ को विष्णु या कृष्ण के अवतार के रूप में भी देखते हैं। जगन्नाथ जी को भगवान राम का ही एक रूप माना जाता है, विशेषकर 16वीं शताब्दी में तुलसीदास द्वारा, जिन्होंने उन्हें रघुनाथ के रूप में पूजा था।
यह घटना तब की है जबकि तुलसीदाजी जगन्नाथ में प्रभु श्रीराम के दर्शन करने के लिए गए और वहां उन्होंने जगनाथ को देखा और कहा कि ये तो मेरे प्रभु श्रीराम नहीं है। यह मस्तक तो उन्हीं के सामने झुकता है तो धनुष बाण लिए हो।
 
तुलसीदासजी जगन्नाथपुरी यह समझकर गए थे कि वहां प्रभु श्रीराम का मंदिर होगा, परंतु वहां की मूर्तियों को देखकर वे बहुत निराश हुए और उन्होंने उन मूर्तियों के समक्ष झुकना अस्वीवार कर दिया और निराश होकर वे वहां से जाने लगे तब पीछे से प्रभु जगन्नाथ ने उन्हें पुकारा और जब उन्होंने पलटकर देखा तो वे प्रभु श्रीराम थे। श्रीकृष्ण ने तुलसीदासजी को रामरूप में दर्शन दिए तब उनका भ्रम मिटा और पहली बार उन्हें समझ में आया कि श्रीकृष्ण ही मेरे राम हैं।
लेखक के बारे में
अनिरुद्ध जोशी
पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों से साहित्य, धर्म, योग, ज्योतिष, करंट अफेयर्स और अन्य विषयों पर लिख रहे हैं। वर्तमान में विश्‍व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं। दर्शनशास्त्र एवं ज्योतिष: मास्टर डिग्री (Gold Medalist), पत्रकारिता: डिप्लोमा। योग, धर्म और ज्योतिष में विशेषज्ञता।.... और पढ़ें
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