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Last Updated : सोमवार, 20 अप्रैल 2026 (10:28 IST)

लिंगायत समाज के संस्थापक बसवेश्वर महाराज के बारे में 6 रोचक बातें

Saint Basaveshwara
Basaveshwara jayanti 2026: कर्नाटक में जातिवाद, भेदभाव, अंधविश्‍वास और कुरीतियों के खिलाफ संत बसवेश्वर जी ने एक आंदोलन चलाया और लोगों को सच्चे धर्म के प्रति जागृत किया। बाद में उनके सामाजिक कार्यों के संगठन को लिंगायत संप्रदाय कहा जाने लगा। भगवान बसवेश्वर की जयंती, जिसे 'बसव जयंती' (Basava Jayanthi) कहा जाता है, मुख्य रूप से वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। यानी अक्षय तृतीया पर उनकी जयंती रहती है। आज 20 अप्रैल को उनकी जयंती मनाई जा रही है। 
 

1. परिचय और जन्म

नाम: संत बसवेश्वर (भगवान बासवेश्वरा, बासवन्ना, भक्ति भंडारी)।
जन्म: 1131 ईसवी।
स्थान: बागेवाडी, संयुक्त बीजापुर जिला, कर्नाटक।
पृष्ठभूमि: एक ब्राह्मण परिवार में जन्में, लेकिन 8 वर्ष की आयु में उपनयन संस्कार के बाद जनेऊ त्यागकर वे शैव परंपरा के प्रचारक बन गए।
 

2. सामाजिक सुधार और दर्शन

जातिवाद का विरोध: उन्होंने जाति आधारित व्यवस्था के बजाय कर्म आधारित समाज पर बल दिया।
महिला सशक्तिकरण: नारी प्रताड़ना के खिलाफ लड़ाई लड़ी और लिंग भेद मिटाने का प्रयास किया।
समानता: लिंग, जाति या सामाजिक स्थिति के भेदभाव के बिना सभी को समान अवसर देने की वकालत की।
धार्मिक सुधार: मठों-मंदिरों की कुरीतियों, अंधविश्वासों और अमीरों के प्रभुत्व को चुनौती दी।
 

3. लिंगायत संप्रदाय और आध्यात्मिक विचारधारा

स्थापना: कुरीतियों को दूर करने के लिए 'लिंगायत' संप्रदाय की नींव रखी।
ईश्वर का स्वरूप: वे निराकार भगवान (निराकार शिवलिंग) की अवधारणा के समर्थक थे।
इष्टलिंग: लिंगायत अपने शरीर पर 'इष्टलिंग' धारण करते हैं, जिसे अब आंतरिक चेतना का प्रतीक माना जाता है।
मान्यताएं: इनका वैदिक क्रियाकांडों में विश्वास नहीं है।
 

4. वीरशैव और लिंगायत: संबंध एवं भिन्नता

ऐतिहासिक जुड़ाव: लिंगायत कभी वीरशैव संप्रदाय का हिस्सा थे, जो स्वयं शैव संप्रदाय का एक उप-संप्रदाय है।
विवाद: वीरशैवों का अस्तित्व बासवन्ना से पहले का माना जाता है और वे शिव की पूजा करते हैं। लिंगायतों का एक वर्ग अब खुद को एक स्वतंत्र संप्रदाय मानता है।
विचारधारा: जहाँ कुछ लोग इन्हें एक मानते हैं (जैसे भीमन्ना खांद्रे), वहीं अन्य इन्हें अलग पहचान के रूप में देखते हैं।
 

5. ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भ

शैव संप्रदाय: वामन पुराण के अनुसार शैव संप्रदाय के चार रूप हैं— पाशुपत, काल्पलिक, कालमुख और लिंगायत।
कश्मीरी शैव दर्शन: 9वीं शताब्दी में वसुगुप्त ने इसकी नींव रखी थी।
बसव पुराण: इसमें लिंगायत समुदाय के प्रवर्तक उल्लभ प्रभु और उनके शिष्य बासव को बताया गया है।
 

6. वर्तमान स्थिति और जनसांख्यिकी

जनसंख्या: कर्नाटक की कुल आबादी का लगभग 18% हिस्सा लिंगायत हैं।
विस्तार: कर्नाटक के अलावा महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में भी इनकी महत्वपूर्ण उपस्थिति है।
जातिगत संरचना: मूलतः समानता पर आधारित होने के बावजूद, वर्तमान में लिंगायतों के भीतर लगभग 99 उप-जातियां हैं, जिनमें पिछड़ी और दलित जातियां भी शामिल हैं। हालांकि, इन्हें कर्नाटक के अगड़ी जातियों में गिना जाता है।
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वेबदुनिया धर्म-ज्योतिष टीम
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