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Written By WD Feature Desk
Last Updated : शुक्रवार, 30 जनवरी 2026 (18:16 IST)

भगवान विश्वकर्मा की पूजा विधि, आरती और लाभ | Vishwakarma Puja Aarti

Lord Vishwakarma
भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्मांड का पहला वास्तुकार और इंजीनियर माना जाता है। उन्होंने ही इंद्रपुरी, द्वारका, हस्तिनापुर और लंका जैसी भव्य नगरियों का निर्माण किया था। भगवान शिव का त्रिशूल, भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र और इंद्र का वज्र भी विश्वकर्मा जी ने ही बनाया था। अधिकतर राज्यों में भगवान विश्वकर्मा की जयंती हर साल कन्या संक्रांति को मनाई जाती है। कुछ विद्वानों और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, विश्वकर्मा जयंती माघ मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में यह तिथि 31 जनवरी 2026 (शनिवार) को है। चलिए जानते हैं उनकी पूजा विधि, आरती और लाभ।
 
 

1. भगवान विश्वकर्मा की पूजा विधि

पूजा: इस दिन कारीगर, शिल्पकार और इंजीनियर अपने औजारों, मशीनों और कारखानों की पूजा करते हैं। यह पूजा मुख्य रूप से कारखानों, दुकानों और कार्यशालाओं में की जाती है। अब तो लैपटॉप/कंप्यूटर, विमानों अन्य उपकरणों की भी पूजा होती है।
सफाई और तैयारी: सबसे पहले अपने कार्यस्थल, मशीनों, औजारों और वाहनों की अच्छी तरह सफाई करें।
कलश स्थापना: एक चौकी पर पीला या लाल कपड़ा बिछाकर भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। पास में ही कलश की स्थापना करें।
औजारों की पूजा: अपने उन सभी उपकरणों (Tools) को चौकी के पास रखें जिनका आप प्रतिदिन उपयोग करते हैं। उन पर तिलक लगाएं और फूल अर्पित करें।
मन्त्र जाप: पूजा के दौरान इस मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है:- "ॐ विश्वकर्मणे नमः"
आरती और भोग: भगवान को फल और मिठाई का भोग लगाएं और धूप-दीप से आरती करें।
कार्य का विराम: इस दिन मशीनों का उपयोग नहीं किया जाता। कारीगर और शिल्पी इस दिन आराम करते हैं और मशीनों को विश्राम देते हैं।
 

2. भगवान विश्वकर्मा की आरती

ॐ जय श्री विश्वकर्मा प्रभु जय श्री विश्वकर्मा।
सकल सृष्टि के कर्ता रक्षक श्रुति धर्मा ॥1॥
 
आदि सृष्टि में विधि को, श्रुति उपदेश दिया।
शिल्प शस्त्र का जग में, ज्ञान विकास किया ॥2॥
 
ऋषि अंगिरा ने तप से, शांति नही पाई।
ध्यान किया जब प्रभु का, सकल सिद्धि आई॥3॥
 
रोग ग्रस्त राजा ने, जब आश्रय लीना।
संकट मोचन बनकर, दूर दुख कीना॥4॥
 
जब रथकार दम्पती, तुमरी टेर करी।
सुनकर दीन प्रार्थना, विपत्ति हरी सगरी॥5॥
 
एकानन चतुरानन, पंचानन राजे।
द्विभुज, चतुर्भुज, दशभुज, सकल रूप साजे॥6॥
 
ध्यान धरे जब पद का, सकल सिद्धि आवे।
मन दुविधा मिट जावे, अटल शांति पावे॥7॥
 
श्री विश्वकर्मा जी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत गजानन स्वामी, सुख सम्पत्ति पावे॥8॥ 
Lord Vishwakarma

3. भगवान विश्वकर्मा की पूजा का लाभ

1. व्यावसायिक उन्नति और समृद्धि
विश्वकर्माजी शिल्प और निर्माण के देवता हैं। उनकी पूजा करने से व्यापार में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और आर्थिक लाभ के नए अवसर खुलते हैं। विशेषकर फैक्ट्री, वर्कशॉप और उद्योगों के स्वामियों के लिए यह अत्यंत शुभ है।
 
2. कौशल और सृजनात्मकता में वृद्धि 
कलाकार, शिल्पकार, इंजीनियर, आर्किटेक्ट और तकनीकी क्षेत्र से जुड़े लोगों को उनकी पूजा से नई प्रेरणा और रचनात्मक विचार मिलते हैं। इससे कार्यक्षमता और हुनर में निखार आता है।
 
3. मशीनों और औजारों की सुरक्षा
विश्वकर्मा पूजा के दिन औजारों और मशीनों की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इससे मशीनें समय पर धोखा नहीं देतीं, दुर्घटनाएं कम होती हैं और वे सुचारू रूप से कार्य करती हैं।
 
4. गृह निर्माण और वास्तु दोष का निवारण
चूंकि उन्होंने ही इंद्रपुरी, द्वारका और लंका जैसे नगरों का निर्माण किया था, इसलिए नए घर के निर्माण या भूमि पूजन के समय उनकी आराधना से वास्तु दोष दूर होते हैं और घर में सुख-शांति का वास होता है।
 
5. मानसिक एकाग्रता और सफलता
विश्वकर्माजी धैर्य और पूर्णता (Perfection) के प्रतीक हैं। उनकी पूजा करने से व्यक्ति के भीतर अपने काम के प्रति एकाग्रता बढ़ती है, जिससे करियर में सफलता सुनिश्चित होती है।
 

4. किन लोगों के लिए विशेष फलदायी है?

  • इंजीनियर्स और टेक्नीशियंस
  • मूर्तिकार और चित्रकार
  • बढ़ई (Carpenter) और मिस्त्री
  • लुहार और सुनार
  • आईटी प्रोफेशनल्स (कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर कर्मी)
  • वाहन चालक और मैकेनिक

5. भगवान विश्‍वकर्मा के संबंध में पूछा जाने वाले प्रश्न- FAQs

1. भगवान विश्वकर्मा कौन हैं?
भगवान विश्वकर्मा को "देवशिल्पी" कहा जाता है। वे ब्रह्मांड के मुख्य वास्तुकार, इंजीनियर और सभी देवताओं के शिल्पी हैं। ऋग्वेद में उन्हें 'वाचस्पति' और सृष्टि का कर्ता माना गया है।
 
2. विश्वकर्मा जी ने किन प्रसिद्ध नगरों का निर्माण किया?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, उन्होंने कई दिव्य नगरों की रचना की:
सत्ययुग में: स्वर्ग लोक का निर्माण।
त्रेतायुग में: सोने की लंका का निर्माण।
द्वापरयुग में: द्वारका नगरी और हस्तिनापुर (इंद्रप्रस्थ) का निर्माण।
जगन्नाथ पुरी: उड़ीसा के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियों का निर्माण भी उन्हीं के द्वारा माना जाता है।
 
3. उनके पास कौन से दिव्य अस्त्र-शस्त्र थे?
विश्वकर्मा जी ने ही देवताओं के लिए शक्तिशाली अस्त्र बनाए थे:
भगवान शिव का त्रिशूल।
भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र।
इंद्र का वज्र।
यमराज का कालदंड।
 
4. क्या विश्वकर्मा जी के पाँच मुखों का कोई विशेष अर्थ है?
हाँ, उनके पाँच मुख पाँच महान ऋषियों के प्रतीक माने जाते हैं, जिन्होंने अलग-अलग शिल्पकलाओं को जन्म दिया:
मनु: लोहे का काम करने वाले।
मय: लकड़ी का काम (बढ़ई) करने वाले।
त्वष्टा: कांसे और तांबे का काम करने वाले।
शिल्पी: ईंट और पत्थर का काम (मूर्तिकार) करने वाले।
विश्वज्ञ: सोने-चांदी का काम (सुनार) करने वाले।