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Last Modified: रविवार, 15 फ़रवरी 2026 (07:01 IST)

गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज है बप्पी लहरी का नाम, जानें क्यों पहनते थे इतना सोना?

Bappi Lahiri Death Anniversary
भारतीय सिनेमा में जब भी 'डिस्को' शब्द का जिक्र होगा, एक चेहरा आंखों के सामने सबसे पहले आएगा—भारी सोने की चेन, काला चश्मा और होंठों पर एक प्यारी सी मुस्कान। हम बात कर रहे हैं बप्पी लहरी की। 15 फरवरी को उनकी पुण्यतिथि है। भले ही बप्पी दा हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके संगीत की धमक आज भी पार्टियों और शादियों की जान बनी हुई है।
 
27 नवंबर 1952 को पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी में जन्मे बप्पी दा का असली नाम अलोकेश लहरी था। उनके माता-पिता खुद संगीत के क्षेत्र के दिग्गज थे। संगीत उनके डीएनए में था, जिसका प्रमाण यह है कि मात्र 3 साल की उम्र में उन्होंने तबला बजाना शुरू कर दिया था। बहुत कम लोग जानते हैं कि महान गायक किशोर कुमार उनके मामा थे।
 
बॉलीवुड को दिया ‘डिस्को थेक’ का जादू
बप्पी लहरी को भारतीय सिनेमा में डिस्को म्यूज़िक का जनक माना जाता है। ताल वाद्ययंत्रों के साथ पश्चिमी संगीत के अनोखे मिश्रण से उन्होंने फिल्मी संगीत में एक नई धारा शुरू की, जिसने 80 के दशक में युवाओं को झूमने पर मजबूर कर दिया।
 
जब गिनीज बुक में दर्ज हुआ नाम
बप्पी लहरी की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 80 के दशक में बॉलीवुड पर राज किया। साल 1986 में उन्होंने एक ऐसा रिकॉर्ड बनाया जो आज भी अटूट है। उन्होंने एक साल में 33 फिल्मों के लिए 180 से ज्यादा गाने रिकॉर्ड किए, जिसके लिए उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया।
 
बप्पी दा भारत के पहले ऐसे संगीतकार थे जिन्हें 'चाइना अवॉर्ड' से सम्मानित किया गया। उनका गाना 'जिम्मी जिम्मी' आज भी चीन में इतना लोकप्रिय है कि हाल के वर्षों में वहां के स्थानीय लोगों ने इसे एक विरोध प्रदर्शन के दौरान 'सांकेतिक भाषा' के रूप में इस्तेमाल कर इसे फिर से ग्लोबल ट्रेंड बना दिया था।
 
असफलता से 'जख्मी' तक का संघर्ष
उनका शुरुआती सफर आसान नहीं था। 1972 की बंगाली फिल्म 'दादू' और 1973 की हिंदी फिल्म 'नन्हा शिकारी' फ्लॉप रहीं। लेकिन 1975 में आई फिल्म 'जख्मी' ने उनकी किस्मत बदल दी। इस फिल्म के गानों जैसे 'आओ तुम्हें चांद पे ले जाएं' ने उन्हें रातों-रात स्टार बना दिया।
 
बप्पी दा का सोने के प्रति लगाव जगजाहिर था। वे अमेरिकी रॉकस्टार एल्विस प्रेस्ली के बहुत बड़े प्रशंसक थे। प्रेस्ली को सोने की चेन पहनते देख बप्पी दा ने तय किया था कि जब वे सफल होंगे, तो अपनी एक अलग पहचान बनाएंगे। वे सोना अपने लिए 'लकी' मानते थे।
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