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Last Updated : शुक्रवार, 15 मई 2026 (12:22 IST)

Vat Savitri Vrat: वट सावित्री व्रत का अर्थ, पूजा विधि, आरती, चालीसा और कथा

In the image, a Hindu woman is seen worshipping a banyan tree, and the caption reads: 'Vat Savitri Vrat: Worship, Aarti, Chalisa, and Story'.
वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र व्रतों में से एक है, जिसे सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुखद वैवाहिक जीवन और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं। यह व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या (और कुछ क्षेत्रों में पूर्णिमा) को मनाया जाता है। सावित्री और सत्यवान की कथा इस व्रत का आधार है, जो सिखाती है कि यदि श्रद्धा और प्रेम सच्चा हो, तो व्यक्ति नियति को भी बदल सकता है। वर्ष 2026 में यह व्रत 16 मई, शनिवार को मनाया जाएगा।
 

1. वट सावित्री नाम का अर्थ हिंदी में:

वट (बरगद का पेड़): हिंदू धर्म में बरगद के पेड़ को 'अक्षय' (कभी नष्ट न होने वाला) माना जाता है। इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना गया है। इसकी लंबी आयु और विस्तार पति की दीर्घायु का प्रतीक है। बरगद के पेड़ के चारों ओर कच्चा सूत लपेटा जाता है, जो श्रद्धा और सुरक्षा के बंधन का प्रतीक है।
 
सावित्री: यह नाम सती सावित्री का है, जिन्होंने अपने तप और पतिव्रत धर्म के बल पर मृत्यु के देवता यमराज से अपने पति 'सत्यवान' के प्राण वापस ले लिए थे। जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे, तब सावित्री ने बरगद के पेड़ के नीचे ही अपने पति के शरीर को सुरक्षित रखा था।
 
इस व्रत का मुख्य उद्देश्य: अखंड सौभाग्य की कामना: महिलाएं सावित्री के आदर्शों का पालन करते हुए अपने पति की रक्षा और लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं। यह व्रत प्रेम, त्याग और दृढ़ निश्चय का प्रतीक है। जिस तरह सावित्री ने हार नहीं मानी, उसी तरह यह व्रत महिलाओं के मानसिक बल को दर्शाता है। वट सावित्री व्रत का अर्थ केवल उपवास रखना नहीं, बल्कि अपने जीवनसाथी के प्रति अटूट प्रेम, सम्मान और उनके स्वास्थ्य व लंबी आयु के लिए ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है।
 

2. वट सावित्री व्रत की पूजा विधि हिंदी में: 

प्रातः काल की तैयारी
स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र (संभव हो तो लाल या पीले रंग के) धारण करें।
सोलह श्रृंगार: सुहागिन महिलाएं इस दिन पूर्ण श्रृंगार करती हैं, जो सौभाग्य का प्रतीक है।
व्रत का संकल्प: मंदिर में दीप जलाकर अपने पति की लंबी आयु और सुखद भविष्य के लिए व्रत का संकल्प लें।
 
पूजा सामग्री
  • थाली में ये चीजें मुख्य रूप से रखें:
  • कच्चा सूत (सफेद या कलावा)
  • बांस का पंखा (बेना)
  • भीगे हुए चने और गुड़
  • ऋतु फल (जैसे आम, लीची, खरबूजा)
  • धूप, दीप, अक्षत, रोली, कुमकुम और सिंदूर
  • सावित्री-सत्यवान की प्रतिमा या चित्र
 
3. वट वृक्ष (बरगद) की मुख्य पूजा
जल अर्पण: सबसे पहले बरगद के पेड़ की जड़ में जल चढ़ाएं।
टीका और अर्पण: पेड़ को रोली, अक्षत और पुष्प अर्पित करें। सावित्री-सत्यवान की प्रतिमा को पेड़ के पास स्थापित कर उनकी पूजा करें।
बांस का पंखा: बरगद के पेड़ और प्रतिमा को बांस के पंखे से हवा करें। यह एक विशेष परंपरा है।
कच्चा सूत लपेटना (परिक्रमा): पेड़ के चारों ओर कच्चा सूत या मौली लपेटते हुए 7, 11, 21 या 108 बार परिक्रमा करें। परिक्रमा करते समय मन में पति की लंबी उम्र की प्रार्थना करें।
 
निम्न श्लोक से सावित्री को अर्घ्य दें- 
अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते।
पुत्रान्‌ पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तुते।।
 
पूजा समाप्ति पर ब्राह्मणों को वस्त्र तथा फल आदि वस्तुएं बांस के पात्र में रखकर दान करें।
अंत में निम्न संकल्प लेकर उपवास रखें-
मम वैधव्यादिसकलदोषपरिहारार्थं ब्रह्मसावित्रीप्रीत्यर्थं
सत्यवत्सावित्रीप्रीत्यर्थं च वटसावित्रीव्रतमहं करिष्ये।
अब वट वृक्ष के नीचे सावित्री-सत्यवान की कथा को पढ़ें अथवा सुनें। इस तरह पूजन करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
 
कथा और आरती
व्रत कथा: परिक्रमा के बाद एक स्थान पर बैठकर 'सती सावित्री और सत्यवान' की कथा सुनें या पढ़ें। कथा सुनते समय हाथ में भीगे चने रखना शुभ माना जाता है।
आरती: पूजा के अंत में धूप-दीप से आरती करें और अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगें।
पूजा के बाद के नियम
आशीर्वाद: पूजा संपन्न होने के बाद अपने घर के बड़ों और पति के पैर छूकर आशीर्वाद लें।
दान: सुहाग की सामग्री (बिंदी, सिंदूर, चूड़ी आदि) और चने का दान किसी ब्राह्मण या सुहागिन महिला को दें।
पारण (व्रत खोलना): अंत में वट वृक्ष की एक कोपल (नया पत्ता) और चने के 7 दानों को निगलकर अपना व्रत खोलें।
 

3. वट सावित्री व्रत की आरती हिंदी में:

1.
ॐ जय वट सावित्री माता, 
मैया जय वट सावित्री माता।
सत्यवान की कीर्ति, सुख-संपत्ति दाता॥
ॐ जय वट सावित्री माता...
अश्वपति की लाड़ली, सुख-संपत्ति दाता।
दुःख दरिद्र हरती, शक्ति सुखदाता॥
ॐ जय वट सावित्री माता...
तुम हो अखंड सुहागिन, तुम हो पतिव्रता।
सत्यवान की रक्षा, कीन्ही प्रियव्रता॥
ॐ जय वट सावित्री माता...
यम को हरा, पति को, प्राण लौटाया।
सावित्री मैया तुम, सबको सुख पाया॥
ॐ जय वट सावित्री माता...
वट सावित्री आरती, जो कोई गावे।
सुख-संपत्ति, सुहाग, मनवांछित फल पावे॥
ॐ जय वट सावित्री माता...
ॐ जय वट सावित्री माता, मैया जय वट सावित्री माता।
सत्यवान की कीर्ति, सुख-संपत्ति दाता॥
ॐ जय वट सावित्री माता...
(पहली आरती समाप्त) 
 
2.
वट सावित्री व्रत की आरती
नमो नमो सती सावित्री, पतिव्रता जग में है विख्यात।
सत्यवान की प्राण प्रिया तुम, महिमा तुम्हारी कही न जात॥
अश्वपति की तुम दुलारी, बुद्धि-विवेक में तुम हो भारी।
नारद ने जब बात बताई, सत्यवान की आयु है थोडी॥
पर न डगमग हुआ संकल्प तुम्हारा, सत्यवान को वर वरा।
वन में जाकर कुटिया बनाई, सेवा में मन खूब रमा॥
जब आया वह काल का क्षण, यमराज आए लेने प्राण।
पीछे-पीछे तुम भी चल दी, तज कर अपना सुख-आराम॥
यमराज ने जब देखा साहस, मांगे तीन वरदान तुम्हें।
सास-ससुर की ज्योति मांगी, खोया राज्य दिलाया उन्हें॥
तीजे वर में पुत्र मांगा, धर्मराज भी चकित हुए।
पाश मुक्त किया सत्यवान को, वचनबद्ध वे स्वयं हुए॥
वट वृक्ष की शीतल छाया, जहां मिला जीवन आधार।
इसीलिए हम पूजें वट को, सुख-समृद्धि मिले अपार॥
जो कोई गावे आरती तुम्हारी, मिटे क्लेश और विपदा भारी।
अखंड सौभाग्य का वर दो माता, हम आए हैं शरण तुम्हारी॥
(दूसरी आरती समाप्त) 
 

4. श्री वट सावित्री माता व्रत चालीसा हिंदी में:

॥ दोहा ॥
जय जय सावित्री माता, तुम हो सत की आधार।
पतिव्रत धर्म निभाकर, किया पति का उद्धार॥
सावित्री माँ तुम हो, यमराज को नमाया।
सत्यवान के प्राण, तुमने ही बचाया॥
 
॥ चौपाई ॥
जय जय जय सावित्री भवानी। 
तुम हो पतिव्रता की रानी॥
अश्वपति के घर जनमी प्यारी।
तेजपुंज मुख मंडल भारी॥
नारद जी ने गुण गाए। 
सत्यवान से ब्याह रचाए॥
नारद ने कह दीन्हि सुताई।
एक वर्ष में प्राण गँवाई॥
सुनकर भी तुम न हिचकिचाई।
सत्यवान से प्रीति बढ़ाई॥
साधु संग में रहा निवासा।
सत्यवान ही तव आशा॥
दिन बीता जब एक बरस का।
समय हुआ अब अंत विवश का॥
वट वृक्ष नीचे प्राण तजे जब।
मराज आए लेने तब॥
पीछे-पीछे तुम चलीं सावित्री।
यमराज को दी बहुत सी नीति॥
ज्ञान, धर्म की कथा सुनाई।
यम ने कहा माँ मांग बड़ाई॥
पति का प्राण वापस देओ।
सत्यवान का जीवन लेओ॥
तुमने ऐसा वर माँगा।
यमराज को पड़ा था भागना॥
सत्यवान फिर जी उठे जब।
घर में आई खुशहाली तब॥
वट वृक्ष की पूजा जो करते।
संकट सभी वो घर से हरते॥
सुहाग अखंड हमेशा रहे।
वट सावित्री जो व्रत रहे॥
संतान सुख वो पाता है।
मनवांछित फल पाता है॥
प्रेम सहित जो कथा सुनावे।
सावित्री माँ कृपा बरसावे॥
 
॥ दोहा ॥
वट वृक्ष के वास को, ब्रह्मा-विष्णु-महेश।
सावित्री माता की, हरें सभी क्लेश॥
जय माँ सावित्री की, जय हो जय जयकार।
सत्यवान के संग, कीनो मंगलचार॥
(समाप्त) 

5. वट सावित्री व्रत की पौराणिक कथा हिंदी में:

भाग 1: सावित्री का अटूट संकल्प
मद्र देश के राजा अश्वपति की कन्या सावित्री ने अपना वर स्वयं चुना—राजकुमार सत्यवान। यद्यपि देवर्षि नारद ने सावित्री को चेतावनी दी थी कि सत्यवान अल्पायु हैं और एक वर्ष के भीतर उनकी मृत्यु निश्चित है, फिर भी सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रहीं। उन्होंने कहा:
 
"मैं एक हिंदू नारी हूँ, पति का चुनाव जीवन में केवल एक ही बार करती हूँ।"
 
भाग 2: यमराज का आगमन और पीछा
विवाह के बाद सावित्री अपने पति और अंधे सास-ससुर के साथ वन में रहने लगीं। जब वह नियत दिन आया, तो सत्यवान लकड़ी काटने जंगल गए। अचानक उनके सिर में तीव्र पीड़ा हुई। सावित्री ने उन्हें एक वट वृक्ष (बरगद) के नीचे अपनी गोद में लिटा दिया।
 
तभी साक्षात यमराज वहां प्रकट हुए और सत्यवान के प्राण लेकर दक्षिण दिशा की ओर जाने लगे। सावित्री बिना डरे यमराज के पीछे-पीछे चल दीं।
 
भाग 3: यमराज और सावित्री का संवाद
जब यमराज ने सावित्री को पीछे आते देखा, तो उन्होंने कहा- "हे नारी! पृथ्वी तक ही पत्नी अपने पति का साथ देती है, अब तुम लौट जाओ।"
सावित्री ने अत्यंत विनम्रता किंतु दृढ़ता से उत्तर दिया- "जहाँ मेरे पति रहेंगे, मेरा स्थान भी वहीँ है। यही मेरा धर्म है।" उनकी विद्वत्ता और पतिभक्ति देख यमराज प्रसन्न हुए और उन्हें तीन वरदान मांगने को कहा।
 
भाग 4: बुद्धिमानी से मांगे गए तीन वरदान
सावित्री ने सांसारिक सुख के बजाय परिवार के कल्याण को चुना:
प्रथम वर: अपने अंधे सास-ससुर के लिए 'नेत्र ज्योति' मांगी।
द्वितीय वर: ससुर का छीना हुआ 'राज्य' वापस मांगा।
तृतीय वर: स्वयं के लिए 'सत्यवान के सौ पुत्रों की माता' बनने का सौभाग्य मांगा।
 
यमराज ने बिना सोचे "तथास्तु" कह दिया। तभी उन्हें आभास हुआ कि सावित्री ने अपनी बुद्धिमानी से पति के प्राण वापस मांग लिए हैं, क्योंकि बिना पति के वह माता नहीं बन सकती थीं। वचनबद्ध यमराज को सत्यवान के प्राण मुक्त करने पड़े।
 
भाग 5: चमत्कार और फलश्रुति
सावित्री पुन: उसी वट वृक्ष के पास लौटीं। उनके स्पर्श से सत्यवान के मृत शरीर में चेतना लौट आई। उधर उनके सास-ससुर की आंखों की रोशनी भी वापस आ गई और उन्हें अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त हुआ।
 
कथा का दिव्य सार
अखंड सौभाग्य: जो सुहागिन स्त्रियाँ श्रद्धापूर्वक वट वृक्ष का पूजन करती हैं, उनका सौभाग्य अखंड रहता है।
संकल्प की शक्ति: यह कथा सिखाती है कि दृढ़ निश्चय और बुद्धिमानी से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।
समर्पण: जिस प्रकार सावित्री ने पति को ही अपना गुरु और सर्वस्व माना, वैसी ही निष्ठा वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाती है।
 
।। जय सती सावित्री माता ।।
 
लेखक के बारे में
वेबदुनिया धर्म-ज्योतिष टीम
पौराणिक कथा, इतिहास, धर्म और दर्शन के जानकार, अनुभवी ज्योतिष, लेखक और विषय-विशेषज्ञों द्वारा लिखे गए आलेखों का प्रकाशन किया जाता है।.... और पढ़ें