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Last Updated : शुक्रवार, 15 मई 2026 (09:31 IST)

Jyeshtha Amavasya 2026: ज्येष्ठ माह की अमावस्या का क्या है महत्व, जानिए पौराणिक कथा

ज्येष्ठ अमावस्या पर पितृ दोष से मुक्ति हेतु पितरों को समर्पित पूर्वजों के पूजन का फोटो
Jyeshtha Amavasya Importance: ज्येष्ठ माह की अमावस्या हिंदू कैलेंडर के सबसे महत्वपूर्ण दिनों में से एक मानी जाती है। साल 2026 में यह 16 मई, शनिवार को पड़ रही है। इस दिन का धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व बहुत गहरा है, क्योंकि इसी दिन शनि जयंती और वट सावित्री व्रत जैसे प्रमुख पर्व भी मनाए जाते हैं।ALSO READ: Jyeshtha month festivals 2026: ज्येष्ठ माह के व्रत एवं त्योहार की लिस्ट
 
ज्योतिष और पुराणों के अनुसार, अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्रमा की स्थिति विशेष होती है। इस दिन विशेष रूप से पितरों का तर्पण करना, दान करना और धार्मिक कर्म करना अत्यंत शुभ माना गया है। माना जाता है कि इस दिन किए गए दान और व्रत का फल कई गुना बढ़कर मिलता है।
 

ज्येष्ठ अमावस्या का धार्मिक महत्व

ज्येष्ठ मास की अमावस्या के महत्व को इन तीन मुख्य बिंदुओं से समझा जा सकता है:
 
पितृ तर्पण और शांति: अमावस्या तिथि पितरों (पूर्वजों) को समर्पित होती है। ज्येष्ठ अमावस्या पर पवित्र नदियों में स्नान करने और पितरों के निमित्त दान-तर्पण करने से 'पितृ दोष' से मुक्ति मिलती है और पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
 
शनि जयंती: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ज्येष्ठ अमावस्या के दिन ही शनि देव का जन्म हुआ था। इसलिए, शनि की साढ़ेसाती या ढैया से पीड़ित लोगों के लिए यह दिन विशेष फलदायी होता है।
 
वट सावित्री व्रत: सौभाग्यवती स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए इस दिन वट या बरगद वृक्ष की पूजा करती हैं।
 

पौराणिक कथाएं

ज्येष्ठ अमावस्या से दो मुख्य कथाएं जुड़ी हुई हैं:
 

1. सावित्री और सत्यवान की कथा (वट सावित्री)

सबसे प्रचलित कथा माता सावित्री की है। सावित्री ने अपने तप और पतिव्रत धर्म के बल पर यमराज से अपने मृत पति सत्यवान के प्राण वापस मांग लिए थे। यह घटना ज्येष्ठ अमावस्या को हुई थी। यमराज ने सावित्री की बुद्धि और निष्ठा से प्रसन्न होकर वट वृक्ष के नीचे सत्यवान को पुनर्जीवित किया था। तभी से महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा कर धागा लपेटती हैं।
 

2. शनि देव के जन्म की कथा

दूसरी कथा शनि देव के प्राकट्य से जुड़ी है। सूर्य देव की पत्नी संज्ञा सूर्य का तेज सहन नहीं कर पा रही थीं, इसलिए उन्होंने अपनी छाया (स्वर्ण) को वहां छोड़ा और स्वयं तपस्या करने चली गईं। छाया और सूर्य देव के मिलन से ज्येष्ठ अमावस्या के दिन शनि देव का जन्म हुआ।

जब शनि देव का जन्म हुआ, तो उनके श्याम वर्ण को देखकर सूर्य देव ने उन्हें अपना पुत्र मानने से इनकार कर दिया, जिससे शनि देव रुष्ट हो गए। बाद में शिव जी के हस्तक्षेप से पिता-पुत्र का संबंध सुधरा और शनि देव को कर्मों के अनुसार फल देने वाले न्यायाधीश का पद मिला।
 
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