How to Avoid Overthinking: आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में 'ओवरथिंकिंग' (ज्यादा सोचना) एक ऐसी बीमारी बन चुकी है, जो अच्छे-भले इंसान का सुकून छीन लेती है। दिमाग में विचारों का ऐसा तूफान चलता है कि रात की नींद उड़ जाती है और शरीर हर वक्त थका हुआ महसूस करता है। अगर आपके साथ भी ऐसा हो रहा है, तो आपको किसी महंगे थेरेपिस्ट के पास जाने की ज़रूरत नहीं है। आज से 5000 साल पहले, कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन भी इसी तरह के मानसिक तनाव और डिप्रेशन से गुज़र रहे थे। तब भगवान कृष्ण ने उन्हें गीता के जो उपदेश दिए, वो आज के समय के सबसे बेस्ट 'लाइफ हैक्स' हैं। आइए जानते हैं गीता के वो 3 लाइफ हैक्स जो आपके दिमाग को तुरंत शांत करेंगे:
1. 'कर्म' पर फोकस, 'रिज़ल्ट' से दूरी (कर्मण्येवाधिकारस्ते...)
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।" (गीता, 2.47)
अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं।"
भावार्थ: इसका अर्थ है कि हमें अपने कर्तव्यों को निष्ठा से करना चाहिए, बिना किसी परिणाम की चिंता किए। हमारा 90% मानसिक तनाव इस बात का होता है कि "आगे क्या होगा? अगर रिज़ल्ट खराब आया तो क्या होगा?" श्रीकृष्ण कहते हैं कि भविष्य तुम्हारे हाथ में नहीं है, तुम्हारे हाथ में सिर्फ आज का कर्म है।
लाइफ हैक: जब भी दिमाग भविष्य की चिंता में डूबने लगे, तो खुद से कहें- "मेरा काम सिर्फ कोशिश करना है, नतीजा जो भी हो, मैं उसे संभाल लूंगा।" रिज़ल्ट की चिंता छोड़ते ही दिमाग का आधा बोझ तुरंत कम हो जाएगा।
2. खुद को 'तीसरे इंसान' की नज़र से देखें (साक्षी भाव)
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥- अध्याय 14, श्लोक 23
अर्थ: जो (गुणातीत पुरुष) उदासीन (अनमने या साक्षी) की भाँति स्थित रहता है, जो प्रकृति के गुणों (सुख-दुःख, लाभ-हानि आदि) से विचलित नहीं होता और यह समझकर कि 'केवल गुण ही गुणों में बरत रहे हैं' (कर्म कर रहे हैं), अपनी स्थिति से कभी विचलित या विचलित नहीं होता।
भावार्थ: इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को दृष्टा (साक्षी) बनने का निर्देश दे रहे हैं। इसका अर्थ है कि आप जो कुछ भी अनुभव कर रहे हैं, उसे अपना न मानकर केवल एक 'दर्शक' की तरह देखें। कर्म शरीर और मन द्वारा किए जाते हैं (जो प्रकृति के गुण हैं), लेकिन आपका वास्तविक स्वरूप आत्मा इनसे परे और अछूता है। ओवरथिंकिंग में हम विचारों के दलदल में इतना फंस जाते हैं कि सही-गलत का फर्क भूल जाते हैं। गीता हमें 'साक्षी भाव' सिखाती है, यानी अपने ही विचारों को एक दूरी से देखना।
लाइफ हैक: जब दिमाग में विचारों का ओवरलोड हो, तो आंखें बंद करें और ऐसा सोचें कि आप अपने दिमाग को बाहर से देख रहे हैं। विचारों से लड़िए मत, उन्हें सिर्फ आते-जाते देखिए जैसे आसमान में बादल तैरते हैं। आप पाएंगे कि थोड़ी देर में विचार खुद-ब-खुद शांत हो गए हैं।
3. मन को जबरदस्ती नहीं, अभ्यास से वश में करें (अभ्यासेन तु कौन्तेय...)
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ (गीता, 8.36)
अर्थ: जिसका मन वश में किया हुआ नहीं है, ऐसे पुरुष द्वारा योग दुष्प्राप्य है और वश में किए हुए मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा साधन से उसका प्राप्त होना सहज है- यह मेरा मत है॥36॥
भावार्थ: जब अर्जुन ने कृष्ण से कहा कि "प्रभु! यह मन तो हवा की तरह चंचल है, इसे रोकना नामुमकिन है।" तब कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा कि मन चंचल ज़रूर है, लेकिन इसे 'अभ्यास' (Practice) और 'वैराग्य' (Detachment) से वश में किया जा सकता है।
लाइफ हैक: मन को एकदम से शांत करने की ज़िद न करें। जब भी मन भटके, उसे प्यार से वापस वर्तमान में लाएं। रोज़ 10 मिनट ध्यान (Meditation) या गहरी सांस लेने का अभ्यास करें। यह आपके दिमाग के लिए जिम जाने जैसा है, धीरे-धीरे दिमाग शांत रहने का आदी हो जाएगा।
बॉटम लाइन: तनाव और ओवरथिंकिंग सिर्फ इस बात का सबूत हैं कि आप उस चीज़ को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहे हैं जो आपके हाथ में नहीं है। आज से ही इन 3 हैक्स को अपनी लाइफ में उतारें और अपने दिमाग को एक 'शांत समंदर' बनते देखें।
विशेष टिप्स: रोज गीता का सार पढ़ते रहने से भी ओवरथिंकिंग दूर होती है।
गीता सार | Geeta saar:
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क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? कौन तुम्हें मार सकता है? आत्मा न पैदा होती है, न मरती है।
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जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्य की चिंता न करो। वर्तमान चल रहा है।
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तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर आए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर दिया। जो लिया, इसी (भगवान) से लिया। जो दिया, इसी को दिया।
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खाली हाथ आए और खाली हाथ चले। जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझकर मग्न हो रहे हो। बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दु:खों का कारण है।
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परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।
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न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जाएगा, परंतु आत्मा स्थिर है- फिर तुम क्या हो?
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तुम अपने आपको भगवान को अर्पित करो। यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है, वह भय, चिंता व शोक से सर्वदा मुक्त है।
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जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान को अर्पण करता चल। ऐसा करने से सदा जीवनमुक्त का आनंद अनुभव करेगा।