purushottam maas ki katha: हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक तीसरे वर्ष सूर्य और चंद्रमा के बीच समय के अंतर को पाटने के लिए एक अतिरिक्त माह का जन्म होता है, जिसे 'अधिकमास', 'मलमास' या 'पुरुषोत्तम मास' कहा जाता है। इस माह के अस्तित्व और इसकी महिमा के पीछे दो अत्यंत रोचक कथाएं प्रचलित हैं।
1. हिरण्यकश्यप का वरदान और 13वां महीना
दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने अमर होने की इच्छा से ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की। ब्रह्मा जी के प्रकट होने पर उसने एक ऐसा वरदान मांगा जो उसे लगभग अमर बना दे। उसने कहा:
"हे विधाता! आपकी बनाई किसी भी सृष्टि से मेरी मृत्यु न हो- न मनुष्य से, न पशु से, न देव से और न दैत्य से। मेरी मृत्यु न घर के भीतर हो, न बाहर; न दिन में हो, न रात में। मैं न अस्त्र से मरूँ, न शस्त्र से; न पृथ्वी पर, न आकाश में। और सबसे महत्वपूर्ण, वर्ष के आपके बनाए उन 12 महीनों में मेरी मृत्यु न हो।"
ब्रह्मा जी ने 'तथास्तु' कह दिया। वरदान पाकर हिरण्यकश्यप निरंकुश हो गया और भक्तों पर अत्याचार करने लगा। जब पाप का घड़ा भर गया, तब भगवान विष्णु ने उसकी काट निकाली:
13वां महीना: भगवान ने अपनी माया से 12 महीनों के बीच एक अतिरिक्त माह (अधिकमास) बनाया, ताकि हिरण्यकश्यप का वरदान भी बना रहे और उसका अंत भी हो सके।
नृसिंह अवतार: भगवान ने खंभे से आधा नर और आधा सिंह (नृसिंह) के रूप में अवतार लिया।
वध: गोधूलि बेला (न दिन, न रात) में, देहरी पर बैठकर (न भीतर, न बाहर), अपनी जंघा पर रखकर (न भूमि, न आकाश), अपने नाखूनों से (न अस्त्र, न शस्त्र) उस दैत्य का वध कर दिया।
2. मलमास की व्यथा और श्रीकृष्ण का वरदान
दूसरी कथा के अनुसार, जब इस अतिरिक्त मास का निर्माण हुआ, तो इसे 'मलमास' कहा गया। चूंकि यह चंद्र वर्ष और सौर वर्ष के बीच का 'मल' (अशुद्ध हिस्सा) माना जाता था, इसलिए कोई भी देवता इसका स्वामी बनने को तैयार नहीं हुआ।
निंदा और दुख: स्वामीविहीन होने के कारण मलमास की सर्वत्र निंदा होने लगी। दुखी होकर मलमास भगवान विष्णु के पास गया और अपनी व्यथा सुनाई। दयानिधान विष्णु उसे लेकर गोलोक गए।
भगवान श्रीकृष्ण का आशीर्वाद: गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण ने मलमास की पीड़ा समझी। उन्होंने घोषणा की:
"आज से मैं तुम्हारा स्वामी हूँ। मेरे सभी दिव्य गुण तुममें समाहित होंगे। संसार में मैं 'पुरुषोत्तम' के नाम से विख्यात हूँ, इसलिए आज से तुम भी 'पुरुषोत्तम मास' के नाम से जाने जाओगे।"
भगवान ने वरदान दिया कि जो भी इस माह में श्रद्धापूर्वक स्नान, दान, पूजन और अनुष्ठान करेगा, उसे सामान्य समय से कई गुना अधिक पुण्य फल प्राप्त होगा।
पुरुषोत्तम मास का आध्यात्मिक महत्व
भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से एक उपेक्षित और 'मल' माना जाने वाला महीना वर्ष का सबसे पवित्र महीना बन गया।
दान और पुण्य: इस माह में 33 देवताओं के निमित्त दान देने का विधान है।
धार्मिक कार्य: विवाह जैसे मांगलिक कार्य वर्जित होने के बावजूद, यह समय जप, तप और आत्म-शुद्धि के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
निष्कर्ष: पुरुषोत्तम मास हमें सिखाता है कि ईश्वर की शरण में जाने पर तुच्छ से तुच्छ वस्तु भी अनमोल और पावन हो जाती है।