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वट सावित्री व्रत के बहाने बात भारतीय नारी के चरित्र की

शुक्रवार,जून 5, 2020
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वट सावित्री पूर्णिमा का पर्व खासकर पश्चिम भारत के गुजरात और महाराष्ट्र राज्य में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। स्कंद एवं भविष्य पुराण के अनुसार वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को किया जाता है।
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प्रचलित वट सावित्री व्रत कथा के अनुसार सावित्री के पति अल्पायु थे, उसी समय देव ऋषि नारद आए और सावित्री से कहने लगे की तुम्हारा पति अल्पायु है।
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इस वर्ष वट पूर्णिमा व्रत 5 जून 2020 को मनाया जा रहा है। हिन्दू धर्म में वट वृक्ष का खास महत्व है। वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूरे भारत में पूजा की जाती है।
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हमारे देश की संस्कृति, सभ्यता और धर्म से वट का गहरा नाता है। वट वृक्ष एक ओर शिव का रूप माना गया है तो दूसरी ओर पद्म पुराण में इसे भगवान विष्णु का अवतार कहा गया है
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वर्ष में दो बार वट सावित्री का व्रत रखा जाता है। पहला ज्येष्ठ माह की अमावस्या को और दूसरा ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा को। लेकिन सवाल यह है कि यह व्रत दो बार क्यों रखा जाता है?
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भारतीय संस्कृति में 'वट सावित्री अमावस्या एवं पूर्णिमा' का व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक बन चुका है। वट पूजा से जुड़े धार्मिक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक पहलू में 'वट' और 'सावित्री' दोनों का विशिष्ट महत्व माना गया है।
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शुक्रवार, 22 मई को वट सावित्री पर्व मनाया जा रहा है। हर साल यह त्योहार ज्येष्ठ मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है। हिन्दू धर्म में वट वृक्ष का खास महत्व माना गया है।
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हिन्दू धर्म में वट सावित्री अमावस्या सौभाग्यवती स्त्रियों का महत्वपूर्ण पर्व है। इस व्रत को ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या तक तथा ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी से पूर्णिमा तक करने का विधान है।
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सुहागिन महिलाओं द्वारा हर साल ज्येष्ठ मास की अमावस्या को वट सावित्री व्रत रखा जाता है। वट वृक्ष का पूजन और सावित्री-सत्यवान की कथा का स्मरण करने के विधान के कारण ही यह व्रत वट सावित्री के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
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22 मई को अमावस्या है। इस दिन वट सावित्री अमावस्या तथा शनि जयंती मनाई जाएगी। इस दिन शनि दोषों से मुक्ति के लिए शनिदेव की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
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सावित्री के पति अल्पायु थे, उसी समय देव ऋषि नारद आए और सावित्री से कहने लगे, तुम्हारा पति अल्पायु है।
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भारतीय धार्मिक परंपरा के अनुसार वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को मनाया जाता है। वट सावित्री अमावस्या व्रत करने के पीछे ऐसी मान्यता है कि ज्येष्ठ अमावस्या के दिन वटवृक्ष की परिक्रमा
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पौराणिक वट सावित्री व्रत कथा के अनुसार सावित्री के पति अल्पायु थे, उसी समय देव ऋषि नारद आए और सावित्री से कहने लगे की तुम्हारा पति अल्पायु है।
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वट सावित्री अमावस्या के दिन सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा की थी। हिन्दू धर्म में वट सावित्री अमावस्या सौभाग्यवती स्त्रियों का महत्वपूर्ण पर्व है।
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वैसे तो वेदों में किसी मूर्त, जड़, वृक्ष, समाधी आदि की पूजा का विधान नहीं है। हां, जड़ प्रकृति की प्रार्थना का जरूर उल्लेख मिलता है। पुराणों में वृक्ष पूजा और परिक्रमा का बड़ा महत्व बताया गया है। हिन्दू धर्मानुसार वृक्ष में भी आत्मा होती है। वृक्ष ...
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वट अमावस्या के दिन महिलाएं व्रत रखकर वटवृक्ष के पास पहुंचकर धूप-दीप नैवेद्य से वटवृक्ष की पूजा करती हैं तथा रोली और अक्षत चढ़ाकर वटवृक्ष पर कलावा बांधती हैं। साथ ही हाथ जोड़कर वृक्ष की परिक्रमा लेती हैं जिससे पति के जीवन में आने वाली अदृश्य बाधाएं ...
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