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Sheetala saptami ki katha| रांधण छठ शीतला सातम व्रत का महत्व और पौराणिक कथा

sheetala saptami ki katha
रांधण छठ, गुजराती कैलेंडर में श्रावण कृष्ण पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है। यह शीतला सातम (सप्तमी) से ठीक एक दिन पहले आता है। क्योंकि शीतला सातम के दिन चूल्हा जलाना और भोजन पकाना वर्जित होता है, इसलिए सभी गुजराती परिवार अगले दिन के लिए पूरा भोजन रांधण छठ के दिन ही पकाकर रख लेते हैं। 'रांधण' का शाब्दिक अर्थ ही "भोजन पकाना" होता है, इसलिए इसे रांधण छठ कहा जाता है। चलिए जानते हैं महत्व और पौराणिक कथा। रांधण छठ इसे ललही छठ और हलछठ व्रत भी कहते हैं. इसके अलावा इसे हलषष्ठी, हरछठ व्रत, चंदन छठ, तिनछठी, तिन्नी छठ, कमर छठ या खमर छठ भी कहते हैं। शास्त्रों में मान्यता है कि इस दिन भगवान बलराम की पूजा करने से संतान की रक्षा होती है।
 

रांधण छठ- रंधन छठ व्रत कथा

1. ग्वालिन की कथा:

एक गर्भवती ग्वालिन प्रसव पीड़ा के बावजूद दूध-दही बेचने निकल पड़ी। मार्ग में उसने एक रसभरी (झरबेरी) के पेड़ की ओट में एक बच्चे को जन्म दिया और उसे वहीं छोड़कर दूध बेचने चली गई। संयोग से उस दिन हल षष्ठी थी। ग्वालिन ने गाय और भैंस का मिलावटी दूध 'केवल भैंस का' बताकर बेच दिया। उधर, खेत में चल रहे हल की धार से उसका नवजात बालक घायल होकर मर गया। किसान ने साहस दिखाकर बालक के घावों को कांटों से सिल दिया।
 
ग्वालिन ने जब अपने बच्चे की यह दशा देखी, तो उसे समझ आ गया कि यह उसके असत्य बोलने और मिलावटी दूध बेचने का दंड है। उसने तुरंत गांव जाकर अपना अपराध स्वीकार किया और प्रायश्चित किया। स्त्रियों के क्षमा-आशीर्वाद के बाद जब वह लौटी, तो उसका पुत्र पुनः जीवित मिला। तभी से सत्य आचरण और संतान की दीर्घायु के लिए यह व्रत रखा जाता है।
 

2. शीतला माता कथा:

रांधण छठ की रात एक दयालु बहू थककर सो गई और चूल्हे के अंगारे बुझाना भूल गई। रात में जब शीतला माता घर आईं, तो चूल्हे की गर्मी से उनका शरीर जल गया। क्रोधित होकर उन्होंने बहू के पुत्र को जलकर मरने का श्राप दे दिया। सुबह मृत बेटे को देख बहू पश्चाताप के लिए शीतला मां की खोज में निकल पड़ी।
 
मार्ग में उसे श्रापित जल वाली दो झीलें और गले में सिलबट्टा बांधकर आपस में लड़ते दो बैल मिले, जिन्होंने अपनी समस्या के समाधान के लिए माता से पूछने का आग्रह किया। आगे बढ़ने पर बहू ने एक बूढ़ी महिला (शीतला मां) के सिर की जूं निकाली और सेवा की। प्रसन्न होकर माता ने बहू के पुत्र को पुनर्जीवित कर दिया।
 
माता ने बताया कि पिछले जन्म में छल-कपट करने के कारण झीलें और बैल श्रापित थे। बहू ने माता के बताए उपाय से झीलों का जल छिड़ककर उनका पानी शुद्ध किया और बैलों का पत्थर हटाकर उन्हें श्रापमुक्त किया। अंततः वह अपने जीवित पुत्र के साथ आनंदपूर्वक घर लौट आई।
 
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