गोगा पंचमी 2026: भाई भिन्ना का पर्व क्यों मनाया जाता है, महत्व और पौराणिक कथा
हिन्दू धार्मिक शास्त्रों के अनुसार 'गोपा पंचमी' जिसे कुछ स्थानों पर 'भाई-भिन्ना' या 'गोगा पंचमी' भी कहा जाता है, यह पर्व भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि पर मनाया जाता है, जिसे विशेष तौर पर गोगा देव और नागदेवता के रूप में पूजा जाता है। इस वर्ष गोपा पंचमी की तिथि 13 अगस्त 2025, दिन बुधवार को पड़ रही है। आइए यहां जानते हैं इस पर्व के मुहूर्त और अन्य जानकारी..
गोगा पंचमी महत्व:
गोगा/गोपा पंचमी और भाई-भिन्ना पर्व प्रतिवर्ष भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि पर मनाया जाता है। कई स्थानों पर इसे भाई भिन्ना व्रत भी कहा जाता है तथा इस दिन विशेष तौर पर गोगा देव यानी जाहरवीर गोगाजी की पूजा की जाती है। इस दिन बहनें खास तौर अपने भाइयों की लंबी आयु और उनकी सुरक्षा के लिए पूजन तथा उपहार की परंपरा भी निभाती हैं।
जनमानस में प्रचलित मान्यता के अनुसार इस दिन गोगा देव और नाग देवता की पूजा विशेष तौर पर की जाती है। यह व्रत नि:संतान महिलाओं की सूनी गोद जल्द ही संतान सुख से भर देते हैं। यह व्रत पति और संतान को लंबी उम्र और अच्छा स्वास्थ्य देने वाला माना जाता है, तथा गोगा पंचमी के दिन बहन अपने भाई के माथे पर टीका लगाकर उन्हें मिठाई खिलाकर स्वयं चना और चावल का बना हुआ बासी भोजन ग्रहण करती है, जो कि एक दिन पहले ही बनाया होता है। फिर भाई अपने बहनों को क्षमतानुसार रुपए या गिफ्ट भेंट स्वरूप देते हैं।
गोगा पंचमी और गोगा नवमी की कथा:
गोगा पंचमी और गोगा नवमी (भाद्रपद माह) के दिन लोकदेवता गोगाजी (जाहरवीर) और नाग देवता की पूजा की जाती है। यह कथा मुख्य रूप से गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद और गोगाजी के अवतार से जुड़ी है।
माता बाछल की तपस्या और छल
राजस्थान के ददरेवा (चुरू) के चौहान वंश के राजा जेवरसिंह की पत्नी रानी बाछल निःसंतान थीं। संतान प्राप्ति की इच्छा से उन्होंने महायोगी गुरु गोरखनाथ जी की शरण ली, जो उस समय तपस्या कर रहे थे। गुरु गोरखनाथ ने प्रसन्न होकर उन्हें पुत्र प्राप्ति के लिए सुबह आने को कहा। रानी बाछल की जुड़वां बहन 'काछल' को जब यह पता चला, तो उसने छल से बाछल के वस्त्र पहन लिए और गोरखनाथ जी से आशीर्वाद और प्रसाद प्राप्त कर लिया।
गुग्गल प्रसाद और गोगाजी का जन्म:
जब रानी बाछल गुरु गोरखनाथ के पास पहुँचीं, तो गोरखनाथ जी ने कहा कि वे तो आशीर्वाद दे चुके हैं। पूरी बात समझ आने पर गुरु गोरखनाथ ने बाछल की सच्ची भक्ति देखकर उन्हें प्रसाद के रूप में अभिमंत्रित 'गुग्गल' (एक विशेष फल या धूप-सामग्री) दिया। गुरुजी ने निर्देश दिया कि इस प्रसाद को स्वयं ग्रहण करें और इसका थोड़ा भाग अपनी नीली घोड़ी और दासी को भी खिला दें। गुग्गल के प्रभाव से रानी बाछल गर्भवती हुईं और भाद्रपद में वीर गोगाजी का जन्म हुआ। गुग्गल के नाम पर ही उनका नाम गोगाजी पड़ा।
नागों के देवता और जाहरवीर:
गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से जन्मे गोगाजी के पास सर्प दंश को ठीक करने और नागों पर नियंत्रण रखने की अलौकिक शक्तियाँ थीं। उन्होंने जनकल्याण के लिए कई चमत्कार दिखाए और सत्य व गो-रक्षा के लिए युद्ध लड़ा। इसी कारण उन्हें 'जाहेरपीर' और नागों के देवता के रूप में पूजा जाने लगा।
पूजा का महत्व:
सर्प भय से मुक्ति: माना जाता है कि गोगा पंचमी के दिन गोगा देव और नाग देवता की कथा सुनने व पूजा करने से सर्पदंश का भय समाप्त होता है।
संतान सुख: निःसंतान महिलाएँ संतान प्राप्ति की मनोकामना के लिए इस दिन व्रत रखती हैं और गोगाजी का पूजन करती हैं।
गोगा पंचमी पूजा विधि:
* गोपा/गोगा पंचमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करके साफ-स्वच्छ वस्त्र पहनें।
* इसके बाद सूर्य भगवान को जल से अर्घ्य दें और पीपल व तुलसी में जल चढ़ाएं।
* अब दीवार को साफ-सुथरी करके गेरू से पुताई करें।
* अब कच्चे दूध में कोयला मिलाकर पुती दीवार पर चौकोर नुमा आकृति बना दें।
* उसके ऊपर गेरू, रोली तथा कोयला मिक्स करके 5 सर्प या सांप बनाएं।
* उसके बाद सर्प की जो आकृतियां आपने बनाई है, उस पर कच्चे दूध, पानी से अभिषेक करें और रोली व चावल अर्पित करें।
* फिर बाजरा, आटा, घी और शकर मिलाकर प्रसाद चढ़ाएं।
* पूजन के बाद मंत्र- 'ॐ नम: शिवाय' का जाप जरूर करें। कम से कम एक माला जाप करें।
* ब्राह्मण को दान-दक्षिणा दें।
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