Raksha bandhan katha: रक्षा बंधन व्रत की पौराणिक कथा
Raksha Bandhan ki kahani: यद्यपि, रक्षा बन्धन से सम्बन्धित विभिन्न पौराणिक कथायें प्रचलित हैं, किन्तु भविष्य पुराण में वर्णित कथा को सर्वाधिक प्रमाणित माना जाता है। व्रतराज में भी रक्षा बन्धन के अनुष्ठानों के साथ भविष्य पुराण की इस कथा का वर्णन प्राप्त होता है। इसके अलावा दूसरे तरीके से कही गई यही कथा महाभारत से प्राप्त होती है। एक दूसरी कथा भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और राजा बलि से जुड़ी हैं। यह कथा भी सबसे ज्यादा प्रचलित है।
भगवान इन्द्र एवं उनकी धर्मपत्नी शची की कथा
पौराणिक कथा है कि एक बार देव व दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तब दानव हावी होते नजर आने लगे। भगवान इंद्र घबराकर गुरु बृहस्पति के पास गए और अपनी व्यथा सुनाने लगे। देवगुरु बृहस्पति ने इन्द्र को मंत्र सहित रक्षा विधान का सुझाव दिया। श्रावण माह की पूर्णिमा तिथि के दिन देवगुरु बृहस्पति ने विधि विधान से रक्षा विधान अनुष्ठान सम्पन्न कराया
रक्षा विधान में एक रक्षा पोटली को पवित्र मन्त्रों द्वारा अभिमंत्रित किया गया। पूजन के बाद इन्द्र की पत्नी शची ने इन्द्रदेव के दाएं हाथ पर वह रक्षा पोटली बांधी थी। रक्षा पोटली की शक्तियों के प्रभाव से इन्द्रदेव ने दैत्यों को परास्त करके अपना सम्राज्य पुनः प्राप्त कर लिया।
तभी से विश्वास है कि इंद्र को विजय इस रेशमी धागा पहनने से मिली थी। उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन यह धागा बांधने की प्रथा चली आ रही है। यह धागा ऐश्वर्य, धन, शक्ति, प्रसन्नता और विजय देने में पूरी तरह सक्षम माना जाता है।
कथा नंबर 2:
एक बार युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा- 'हे अच्युत! मुझे रक्षाबंधन की वह कथा सुनाइए जिससे मनुष्यों की प्रेतबाधा तथा दुख दूर होता है।' भगवान कृष्ण ने कहा- हे पांडव श्रेष्ठ! एक बार दैत्यों तथा सुरों में युद्ध छिड़ गया और यह युद्ध लगातार बारह वर्षों तक चलता रहा। असुरों ने देवताओं को पराजित करके उनके प्रतिनिधि इंद्र को भी पराजित कर दिया।
ऐसी दशा में देवताओं सहित इंद्र अमरावती चले गए। उधर विजेता दैत्यराज ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया। उसने राजपद से घोषित कर दिया कि इंद्रदेव सभा में न आएँ तथा देवता व मनुष्य यज्ञ-कर्म न करें। सभी लोग मेरी पूजा करें।
दैत्यराज की इस आज्ञा से यज्ञ-वेद, पठन-पाठन तथा उत्सव आदि समाप्त हो गए। धर्म के नाश से देवताओं का बल घटने लगा। यह देख इंद्र अपने गुरु वृहस्पति के पास गए तथा उनके चरणों में गिरकर निवेदन करने लगे- गुरुवर! ऐसी दशा में परिस्थितियाँ कहती हैं कि मुझे यहीं प्राण देने होंगे। न तो मैं भाग ही सकता हूँ और न ही युद्धभूमि में टिक सकता हूँ। कोई उपाय बताइए।
वृहस्पति ने इंद्र की वेदना सुनकर उसे रक्षा विधान करने को कहा। श्रावण पूर्णिमा को प्रातःकाल निम्न मंत्र से रक्षा विधान संपन्न किया गया।
'येन बद्धो बलिर्राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिवध्नामि रक्षे मा चल मा चलः।'
इंद्राणी ने श्रावणी पूर्णिमा के पावन अवसर पर द्विजों से स्वस्तिवाचन करवा कर रक्षा का तंतु लिया और इंद्र की दाहिनी कलाई में बाँधकर युद्धभूमि में लड़ने के लिए भेज दिया। 'रक्षाबंधन' के प्रभाव से दैत्य भाग खड़े हुए और इंद्र की विजय हुई। राखी बाँधने की प्रथा का सूत्रपात यहीं से होता है।

